परिकरमा - प्रकरण २१ | Parikarmaa prakaran 21
सात घाट पुल हौज
और सुख सातों घाट के, और सुख दोऊ पुल । ए सुख सब अर्स के, कब लेसी हम मिल ॥१॥
घाट जांबू अति सोभित, जिमी जड़ाव किनारे जोए । कई मोहोल किनारे जवेरों, बन सोभित किनारे सोए ॥२॥
ए बन जड़ाव जानों चंद्रवा, कई रंग बने इन हाल । जाए पोहोंच्या लग झरोखों, अर्स की हद दिवाल ॥३॥
देखो बन ए नारंगी, जानो उनथें एह अधिक । सुख लेती रूहें इन घाट के, कब देसी हमें हक ॥४॥
घाट नारंगी अति भला, जानों कोई न इन समान । सो कब पावें सुख झीलना, जो हम लेतीं संग सुभान ॥५॥
कई रंग बन छत्रियां, सुन्दर अति सोभाए । करत अंबर में रोसनी, पोहोंची अर्स हिंडोलों जाए ॥६॥
सोभा बट घाट क्यों कहूं, तरफ चारों चार दिवाल । जरी किनारे दोऊ सोभित, क्यों देऊं इन मिसाल ॥७॥
ऊपर बिराजत हिंडोले, तरफ चारों सोभित । ऊपर जल पुल लगते, ए सुख कहां गए अतंत ॥८॥
क्यों कहूं रेती इन भोम की, जानो उज्जल मोती सेत । ए सुख हमारे कहां गए, जो इन भोम में लेत ॥९॥
अचरज बन इन घाट का, सोभित ज्यों मंदिर । बेल पात फूल फल छांहें, ए सोभित अति सुन्दर ॥१०॥
कहां सुख सातों घाट के, कहां सुख पुल मोहोलात । कहां सुख झरोखे जल पर, जो तले नेहेरें चली जात ॥११॥
जोए बट थें कुंज बन चल्या, बोहोत रेती बीच ताए । ताल हिंडोलों बीच होए, आगूं निकस्या जाए ॥१२॥
किन विध लेवें सुख बन के, क्यों हिंडोलों हींचत । किन विध रूहें अर्स में, माहों-माहें खेल करत ॥१३॥
मोहोल बने बेलियन के, सेज हिंडोले सिंघासन । चेहेबच्चे फुहारे कई सुख, कब होसी रूहन ॥१४॥
इन मंदिरों सेज्या सिंघासन, छोटे चेहेबच्चे हिंडोले । कई फुहारें नेहेरें चलें, धनी हमें कब सुख देओगे ए ॥१५॥
कहां सुख गलियां अर्स की, माहों-माहें बांध के होड़ । रूहें रेती में ठेकतियां, दौड़तियां कर जोड़ ॥१६॥
इन घाट आगूं पुल जोए पर, जाए पार पोहोंच्या पुल । ए भी तिन बराबर, जो पेहेले कहया अव्वल ॥१७॥
बन जो दोऊ किनारों, साम सामी सोभात । हारें चौकी पांच हार की, पोहोंची पुल पर छात ॥१८॥
पुल तले नेहेरें चलें, दोऊ पुल मुकाबिल । दोऊ बीच सोभा देय के, जाए ताल पोहोंच्या जल ॥१९॥
कहां गए सुख जोए के, जमुना जरी किनार । कहां सुख जल कहां झीलना, कहां नित नए सिनगार ॥२०॥
दोऊ किनारे जोए के, एक मोहोल एक चबूतर । कहूं हेम रंग कहूं जवेर, अति सोभित बन ऊपर ॥२१॥
जमुना दोऊ किनार के, मोहोल ढांपिल दोऊ ओर । तलाव तरफ जोए आए के, जाए माहें मिली मरोर ॥२२॥
॥ प्रकरण ॥२१॥ चौपाई ॥११०९॥
