परिकरमा - प्रकरण २२
हौज कौसर
अब ताल पाल की क्यों कहूं, बन पांच हार गिरदवाए । फिरती दयोहरी चबूतरे, सोभा इन मुख कही न जाए ॥१॥
बड़े घाट ताल के चार हैं, चारों सनमुख बराबर । दोऊ तरफ उतरती दयोहरी, तले आगूं चबूतर ॥२॥
पाल ऊपर जो दयोहरियां, आगूं हर दयोहरी चबूतर । तिन दोऊ तरफों सीढ़ियां, जित होत चढ़ उतर ॥३॥
सीढ़ी मुकाबिल सीढ़ियां, आए मिलत हैं जित । दो दो बीच द्वार नें, सबों सोभित परकोटे इत ॥४॥
खिड़की मुकाबिल खिड़कियां, अन्दर बाहेर जे । जो सुख हैं मोहोलन के, कब लेसी हम ए ॥५॥
ऊपर परकोटे कांगरी, ऊपर हर द्वार नों । कांगरी पाल किनार पर, सिफत आवे ना जुबां मों ॥६॥
दोऊ द्वार बीच मेहेराब जो, ए सोभा कहूं क्यों कर । पड़साल आगूं सबन के, गिरदवाए सोभा जल पर ॥७॥
अब जल की सोभा क्यों कहूं, हम करती इत झीलन । चित्त चाहे करें सिनगार, ए सुख कब लेसीं मोमिन ॥८॥
मासूक संग सुख मिल के, इत हिंडोले पाल पर । सो सुख याद क्यों न आवहीं, जो हम लेती मिलकर ॥९॥
सब एक हीरे की पाल है, टापू मोहोल याही के । अनेक रंगों कई जुगते, किन विध कहूं मुख ए ॥१०॥
चांदनी झरोखे बैठ के, किन विध लेती सुख । सो याद देत धनी इन जिमी, काल क्यों काटूं माहें दुख ॥११॥
हकें सुख अर्स देखाइया, इलम दे करी बेसक । हम क्यों रहें इन मासूक बिना, जो कछुए होए इस्क ॥१२॥
इन मोहोल सुख रूहों के, और सुख घाटों चार । हाए हाए क्यों जाए हमें रात दिन, ए सुख बैठी रूहें हार ॥१३॥
याद देत हक ए सुख, हाए हाए तो भी न लगे घाए । ऐसी बेसकी ले क्यों रहे, जो होए अर्स अरवाए ॥१४॥
हक हुकम ऐसा करत है, ना तो तेहेकीक ना रहे तन । अब हक इत रूहों राखत, कोई अचरज हाँसी कारन ॥१५॥
याद करों सुख हाँसीय के, के याद करों सुखपाल । के याद करों तले मोहोल के, हाए हाए अजूं ना बदलत हाल ॥१६॥
॥ प्रकरण ॥२२॥ चौपाई ॥११२५॥
