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परिकरमा - प्रकरण २३

नेहेरें मोहोलों में

सुख नेहेरों का अलेखे, सबों ऊपर मोहोलात । कई मिली कई जुदियां, तरफ चारों चली जात ॥१॥

चार तरफ चार नेहेरें, ऊपर सब ढांपेल । कहूं चार आठ सोले मिली, कई विध मोहोलों खेल ॥२॥

चारों खूटों मोहोल ढांपिल, जानूं के रचिया सेहेर । इन विध बराबर गलियां, आड़ी ऊंची गली बीच नेहेर ॥३॥

कई कोट अलेखे पदमों, सेहेर बसे पसुअन । कई सेहेर हैं जानवर, सबों इस्क अकल चेतन ॥४॥

यों कई नेहेरें बीच सेहेरन के, इन सेहेरों कई मोहोलात । हर मोहोलों कई बैठकें, ए सोभा कही न जात ॥५॥

अब नेहेरें बरनन तो करुं, जो कछू होए हिसाब । मोहोल मोहोल बीच कई कुंड बने, कई कारंजे छूटे ऊंचे आब ॥६॥

कई जल मोहोलों चढ़े, कई मोहोलों से उपरा ऊपर । कई लाखों हजारों बैठकें, सुख इत के कहूं क्यों कर ॥७॥

कई मोहोल ऊंचे अति बड़े, जैसे हक दिल चाहे । हर मोहोलों बीच नेहेरें चलें, ए सुख बैठक कही न जाए ॥८॥

हर जातों मोहोल जुदे जुदे, जुदी जुगतें पानी चलत । जुदी जुदी जुगतें कारंजे, क्यों कर कहूं एह सिफत ॥९॥

इन बड़े मोहोल सुख नेहेरों के, हमें कब देओगे खसम । मांगे मंगाए जो देओ, सब हुआ हाथ हुकम ॥१०॥

सागर से नेहेरें आवत, पानी जुदा जुदा फैलात । कई विध मोहोलों होए के, फेर सागरों में समात ॥११॥

कई चलत चक्राव ज्यों, कई आड़ी ऊंची चलत । कई चलत मोहोलों पर, कई मोहोलों से उतरत ॥१२॥

एक नेहेर से कई नेहेरें, जुदी जुदी फिरत । कई जुदी जुदी नेहेरें होए के, कई एक में अनेक मिलत ॥१३॥

कई नेहेरें मोहोलों मिने, चारों तरफों फिरत । कई मोहोल नेहेरें कई, कई विध विध सों विचरत ॥१४॥

कहूं चार नेहेरें मिली चली, कहूं चार से सोले निकसत । कई नेहेरें सुख इन मोहोलों, धनी कब करसी प्राप्त ॥१५॥

कहूं नेहेरें जाहेर चली, कई पहाड़ों के माहें । नेहेरें पहाड़ों या सागरों, सोभा क्यों कहूं इन जुबांए ॥१६॥

॥ प्रकरण ॥२३॥ चौपाई ॥११४१॥

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