परिकरमा - प्रकरण २४ | Parikarmaa prakaran 24
मानिक पहाड़ के हिंडोले
पहाड़ मानिक मोहोल कई, यों पहाड़ मोहोल अनेक । सब अपार अलेखे इन जिमी, कहां लो कहूं विवेक ॥१॥
बड़े पहाड़ जो हिंडोले, बारे हजार बैठत । एकै छप्पर खटके, हक हादी साथ हींचत ॥२॥
अनेक पहाड़ कई हिंडोले, जुदी जुदी कई जुगत । जो सुख हिंडोले पहाड़ के, जुबां कर ना सके सिफत ॥३॥
कई हिंडोले पहाड़ में, ऊपर से ढांपेल । सुख लेवें कई विध के, रूहें करें कई खेल ॥४॥
कई सुख लें मीठे पहाड़ के, कई विध हींचे हिंडोले । कई सुख हिंडोले बाहेर, बीच पहाड़ के खुले ॥५॥
एक जरा इन जिमी का, जोत न माए आसमान । जोत जवेरों पहाड़ों की, इत कहा कहे जुबान ॥६॥
कोई पहाड़ गिरदवाए का, कोई बराबर खूंटों चार । जो सोभा पहाड़न की, सो न आवे माहें सुमार ॥७॥
जिमी गिरदवाए पहाड़ों की, सब देखत बराबर । पहाड़ भी सीधे सब तरफों, जानों हकें किए दिल धर ॥८॥
कई मोहोल पहाड़ों मिने, कई मोहोल पहाड़ों ऊपर । जो बन पहाड़ या जिमिएं, सो इन जुबां कहूं क्यों कर ॥९॥
ना सुख कहे जाएं जिमी के, ना सुख कहे जाएं बन । ना सुख कहे जाएं मोहोलों के, ना सुख कहे जाएं पहाड़न ॥१०॥
कई पहाड़ झिरने झिरें, कई ऊपर नेहेरें चली जाएं । कई उतरें ऊपर से चादरें, कई तालों बीच आए समाए ॥११॥
नेहेरें बन में होए चलीं, सो नेहेरें कई मिलत । आगूं आए मोहोल बन के, इत चली कई जुगत ॥१२॥
ए सुख हमारे कहां गए, ए जो खेल होत दिन रात । हक के साथ हम सब रूहें, हँस हँस करती बात ॥१३॥
॥ प्रकरण ॥२४॥ चौपाई ॥११५४॥
