परिकरमा - प्रकरण २५ | Parikarmaa prakaran 25
बन के मोहोल नेहेरें
बन छाया है मोहोल जो, इत मोहोल बने बन के । जानो सोभा सब से अतंत है, सब सुख लेती रूहें ए ॥१॥
नेहेरें सागर से खुली चलीं, सो भी भई बन माहें । ए बन सोभा नेहेरों की, खूबी क्यों केहेसी जुबांएं ॥२॥
सागर किनारे जो बन, ए बन नेहेरें विवेक । मोहोल बन जो देखिए, जानों सोई नेक से नेक ॥३॥
कई मोहोल ढिग सागरों, और कई मोहोल बनराए । तिनों में नेहेरें चलें, हम सुख लेतीं इत आए ॥४॥
ए बन नेहेरें दूर लों, जहां लो नजर फिरत । ए सुख संग सुभान के, हम कई विध लेतीं इत ॥५॥
इन बन की और मोहोल की, और पहाड़ हिंडोले जे । जिमी सब बराबर, अर्स लग देखिए ए ॥६॥
बन बिगर की जो जिमी, जानों जरी दुलीचे बिछाए । ए दूब जोत आसमान लों, रहया नूरै नूर भराए ॥७॥
ए नेहेरें अति दूर लग, अति दूर देखे सागर । सागर नेहेरें मोहोल जो, अति बड़े देखे सुन्दर ॥८॥
सागर किनारे मोहोल जो, सो जाए लगे आसमान । ए मोहोल जुदी जुदी जिनसों, इत सुख चाहिए सागर समान ॥९॥
कई मोहोल बराबर सागरों, मोहोल ऊंचे चढ़े अनेक । कई जुगतें सोभा सुन्दर, ए क्यों कहे जुबां विवेक ॥१०॥
कई मोहोल सुख सागरों, कई सुख टापू मोहोल । ए सुख अपार अलेखे, सो क्यों कहूं इनकी तौल ॥११॥
महामत कहे सुनो मोमिनों, बीच टापू जल गिरदवाए । ए अति ऊंचे मोहोल सुन्दर, देखो अपनी रूह जगाए ॥१२॥
॥ प्रकरण ॥२५॥ चौपाई ॥११६६॥
