परिकरमा - प्रकरण २६
पुखराज से पाट घाट ताँईं
सुख क्यों कहूं पहाड़ पुखराज के, और कहा कहूं मोहोल तले । ऊपर चौड़े मोहोल चढ़ते, मोहोल तीसरे तिन उपले ॥१॥
आठ पहाड़ तले मोहोल के, ऊपर ताल पुखराज । कई मोहोलातें आठों पर, ऊंचे रहे मोहोल बिराज ॥२॥
ताल ऊपर मोहोलात जो, आठ पहाड़ तले जो इन । मोहोल उपले आकास लों, किया निपट नूर रोसन ॥३॥
निपट बड़े मोहोल पहाड़ के, निपट बड़े दरबार । कब सुख लेसी इनके, ए धनी तुमहीं देवनहार ॥४॥
इत बड़े जानवर खेलत, आगूं बड़े दरबार । ए सुख कब हम लेयसी, मोमिन इत इंतजार ॥५॥
कई रंगों कई विध खेलत, पहाड़ से सेत फील । दम न रहें मासूक बिना, धनी क्यों डारी बीच ढील ॥६॥
कहां गए सुख आपके, हम कहां पुकारें जाए । तुम बिना नहीं कोई कितहूं, मोमिन बेसक किए बनाए ॥७॥
और सुख पहाड़ ताल के, तीनों तरफों मोहोलात । पहाड़ सुख मोहोल अंदर, जो कई नेहेरें चली जात ॥८॥
गुरज दोऊ के बीच में, गिरत चादरें चार । चार चार हर एक में, उतरत सोले धार ॥९॥
सो परत बीचले कुंड में, इत चारों तरफ देहेलान । ए सुख कब हम लेयसी, इन मेले साथ मेहेरबान ॥१०॥
कब सुख लेसी बंगलों, जित नेहेरें चलें चक्राव । बीच बीच बगीचे चेहेबच्चे, कई जल उतरे तले तलाव ॥११॥
इन मोहोलों इन बंगलों, इन चेहेबच्चों बगीचों । ए सुख छाया बन की, कब देओगे हमकों ॥१२॥
कई सुख बीच बंगलों, कई सुख खूब खुसाली खास । सो दिल कब हम देखसी, हकसों विविध विलास ॥१३॥
एक सब्द सखी बोलते, कई ठौरों उठें जी जी कार । मन सरूप कई सोहागनी, कई एक पाँउं खड़ियां हजार ॥१४॥
सखी कछुक मन में चाहत, सो आगूं खड़ी ले आए । यों चित चाहे सुख धाम के, कब लेसी हम जाए ॥१५॥
जोए जितथें हुई जाहेर, कहां सुख इन चबूतर । आगूं कुंड जल चलकत, बड़ा बन सोभा ऊपर ॥१६॥
ए बन गिरद पुखराज के, बड़ा बन खूबी लेत । ए फेर मिल्या बन जोए के, नूर आकास भरयो जिमी सेत ॥१७॥
इत अनेक वनस्पति, कई पसु पंखी करें जिकर । हम इत सुख लेती हक सों, जानों बैठक एही खूबतर ॥१८॥
ए बन मोहोल कई विध के, बड़े बड़े कई बड़े रे । मोहोल मंदिरों हिसाब नहीं, चौड़े चौड़े कई चौड़े रे ॥१९॥
जब पीछल चले पुखराज के, अति चौड़ो बड़ो विस्तार । ए बन खूबी क्यों कहूं, आवत नहीं सुमार ॥२०॥
एक एक पेड़ पर कई भोमें, भोम भोम कई जुगत । पसु पंखी एक बिरिख पर, कई जुगतें बास बसत ॥२१॥
कई तेज जोत प्रकास में, अवकास भरयो ताके नूर । जिमी मोहोल बन पसु पंखी, ए कब देखें अर्स जहूर ॥२२॥
ए बन जाए बड़े बन मिल्या, चल गया पुखराज पार । अर्स बन सोभा क्यों कहूं, और बन दोऊ किनार ॥२३॥
कुंड आगे ढांपी चली, अदभुत ऊपर मोहोलात । अंदर बैठकें क्यों कहूं, दोऊ किनार लिए चली जात ॥२४॥
किनारे कठेड़ा बैठक, अति सुन्दर थंभ सोभात । दोऊ तरफों चबूतरे, खूबी इन मुख कही न जात ॥२५॥
जाए आगूं भई जोए जाहेर, ढांपिल दोऊ किनार । ऊपर कलस दोऊ कांगरी, और थंभ सोभे हार चार ॥२६॥
जड़ित किनारें दोऊ जल पर, दोऊ कठेड़े गिरदवाए । ए सुख लेती मासूक संग, इत अचरज बनराए ॥२७॥
इतथें चली तरफ ताल के, एक मोहोल एक चबूतर । दोऊ किनारे कुसादी होए चली, इत सोभा लेत यों कर ॥२८॥
आगूं पुल इत आइया, ऊपर बड़ी मोहोलात । कई देहेलान झरोखे जल पर, जल चल्या घड़नाले जात ॥२९॥
पुल पांच भोम छठी चांदनी, चारों तरफों बराबर । ए कहां गए सुख रूहन के, ए हम क्यों गए ठौर बिसर ॥३०॥
सात घाट बने बीच में, पुल दूृजा तिनके पार । दोऊ मोहोल झरोखे बराबर, इत हिंडोले ठंढ़ी बयार ॥३१॥
पुल से आगे घाट केल का, ले चल्या जमुना जोए । केल किनारे मिल्या मधुबन, पुखराज अर्स बीच दोए ॥३२॥
लटक रही केलां जोए पर, अति खूबी खूबतर । ए सुख कब लेसी इन घाट के, खेलें विध विध जानवर ॥३३॥
इन आगूं घाट लिबोई का, लग्या हिंडोलों जाए । क्यों कहूं छब छत्रियन की, ए घाट अति सोभाए ॥३४॥
इत सुख लेवें सब मिलके, रूहें बड़ी रूह हकसों । सों फेर सुख कब हम देखसी, लेसी बैठके हिंडोलों ॥३५॥
इन आगूं घाट सोभित, अति बिराजे जोए किनार । काहूं काहूं बीच मोहोल है, बन सोभे हार अनार ॥३६॥
जाए मिल्या अर्स दिवालों, सोले गुरज झरोखे बीस । हर गुरज बीच बीच में, मोहोल सोभे झरोखे तीस ॥३७॥
इन घाट के ऊपर, रोसन पाँच सै झरोखे । इन बन मोहोलों मासूक संग, सुख कब लेसी हम ए ॥३८॥
ए झरोखे एक भोम के, यों भोम झरोखे नवों ठौर । तिन ऊपर चाँदनी कांगरी, तापर बैठक विध और ॥३९॥
आगूं पाट घाट मोहोल सुन्दर, जल पर अति सोभाए । तले घड़नाले तिनमें, बीच तीन नेहेरें चली जाए ॥४०॥
थंभ बारे पाट चांदनी, जल हिस्से तीसरे जोए । चारों खूंटों थंभ नीलवी, थंभ आठ चार रंग सोए ॥४१॥
लग कठेड़े रूहें बैठत, कई रंग जवेरों जोत । बीच बैठे मासूक आसिक, जल बन आकास उद्दोत ॥४२॥
इत सोभित बन अमृत, और कई बिध बन अनेक । ए जाए मिल्या लग चांदनी, अर्स आगूं बन विवेक ॥४३॥
द्वार अर्स अजीम का, और नूर द्वार जोए पार । ए सुख कब हम देखसी, इन दोऊ दरबार ॥४४॥
नूर पार भी एह बन, और पहाड़ पुखराज । इन आगूं बड़ा बन चल्या, रहया सागरों लग बिराज ॥४५॥
नजर फिरी मेरी दूर लग, देख्या बन विस्तार । नीला पीला स्याम सेत कई, कहों कहाँ लग कहूं न सुमार ॥४६॥
जिमी सब बराबर, बन पोहोंच्या सागर जित । या बन या मोहोलों मिने, नेहेरें चली गैयां अतंत ॥४७॥
पार ना पहाड़ों हिंडोलों, नहीं मोहोलों नेहेरों पार । पार ना बन नेहेरें जिमी का, क्यों पसु पंखी होए निरवार ॥४८॥
पार न आवे सागरों, और पार किनारों नाहें । पार ना मोहोलों किनारों, कई नेहेरें आवें जाएं ॥४९॥
मोहोल जिमी बन कहत हों, और पहाड़ नेहेरें बनराए । ए कैसे होसी अर्स के, ए देखो रूह जगाए ॥५०॥
कई फौजे पसुअन की, कई फौजें जानवर । जिमी खाली कहूं न पाइए, बसत अर्स लसकर ॥५१॥
जिमी बन ए लसकर, जिमी बस्ती न कहूं वीरान । सब आए मुजरा करत हैं, आगूं अर्स सुभान ॥५२॥
ए पातसाही अर्स की, केहेनी में आवत नाहें । ए कहया वास्ते मोमिन के, जानों दिल दौड़ावें तांहें ॥५३॥
एक पात न गिरे बन का, ना खिरे पंखी का पर । एक जरा जाया न होवहीं, ए अर्स जिमी यों कर ॥५४॥
सब जिमी मोहोल हक के, और सब ठौरों दीदार । सब अलेखे अखंड, कहे महामत अर्स अपार ॥५५॥
॥ प्रकरण ॥२६॥ चौपाई ॥१२२१॥
