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परिकरमा - प्रकरण २७

पसु पंखियों की पातसाही

एह निमूना ख्वाब का, किया कारन उमत । कायम अर्स ख्वाब में, देखाया लेने लज्जत ॥१॥

ब्रह्मसृष्ट कही वेद ने, अहेल-अल्ला कहे फुरमान । निसबत सुख ख्वाब में, कर दई हक पेहेचान ॥२॥

एक साहेबी अर्स की, और कोई काहूं नाहें । आराम देने उमत को, देखाया ख्वाब के माहें ॥३॥

ख्वाब देखाई साहेबी, और अर्स की हैयात । ए दोऊ तफावत देख के, अंग में सुख न समात ॥४॥

अब कहूं अर्स अजीम की, और बन का विस्तार । नहीं इंतहाए जिमी जंगल का, ना पसु पंखी सुमार ॥५॥

इन रेत रंचक की रोसनी, आकास न मावे नूर । तो रोसनी सब बन की, क्यों कर कहूं जहूर ॥६॥

तेज ऐसो इन डार को, और पात को प्रकास । सो रोसनी ऐसी देखत, मावत नहीं आकास ॥७॥

ए जुबां ना केहे सकत है, एक पात की रोसन । तो इन डार की क्यों कहूं, जो प्रफुलित सब बन ॥८॥

डार पात सब नूर में, फल फूल बेलों जोत । केहे केहे मुख कहा कहे, सब आकास में उद्दोत ॥९॥

बन गिरदवाए अर्स के, और एही गिरदवाए ताल । एही गिरदवाए जोए के, जुबां कहा कहे खूबी जमाल ॥१०॥

कहया ऐसा ही बन नूर का, रेत ऐसे ही रोसन । तो नूर मोहोल की क्यों कहूँ, जाको नामै नूर वतन ॥११॥

तो अर्स मोहोल की रोसनी, और अर्स मोहोल हौज जोए जे । नूर मोहोल ना केहे सकों, तो क्या कहे जुबां नूर ए ॥१२॥

सिरदार सब बन में, पसु पंखी जात जेती । खूबी बल हिकमत की, जुबां क्या कहेगी केती ॥१३॥

जिमी अर्स की देखियो, हिसाब न काहूं सुमार । देख देख के देखिए, अनेक अलेखे अपार ॥१४॥

तिन सब जिमी में बस्ती, कहूं पाइए नहीं वीरान । पातसाही पसुअन की, और जानवरों की जान ॥१५॥

ए जो जिमी अर्स हक की, सो वीरान क्यों कर होए । अबादान हमेसगी, आराम बिना नहीं कोए ॥१६॥

अखंड आराम सब में, चल विचल इत नाहें । सब सुख हैं अर्स में, रहें याद हक के माहें ॥१७॥

अरस-परस हैं हक सों, आसिक हक के जोर । आवें दीदार को दरिया लेहेर ज्यों, कई पदमों लाख करोर ॥१८॥

कई लेहेरें आवत हैं, जो नाहीं जिमी को पार । पीछे आवें दरिया पसुअन के, तिन दरियाव नहीं सुमार ॥१९॥

दौड़ इनों के मन की, क्यों कर कहूं छंछेक । पोहोंचें सब कदमों तले, जित खावंद सबों का एक ॥२०॥

जो ठौर चित्त में चितवें, हम जाए पोहोंचें इत । खिन एक बेर न होवहीं, जानों आगे खड़े हैं तित ॥२१॥

एक हक अर्स के नजीक हैं, कोई दूर दूर से दूर । आवत सब दीदार को, जानो आगे खड़े हजूर ॥२२॥

हिकमत बल इनों के, क्यों कर कहे जुबान । दीदार पावें अर्स हक का, सो देखो दिल आन ॥२३॥

क्यों न होए बल इनको, जाको अमृत हक सींचत । ए पाले-पोसे खावंद के, अर्स तले आवत ॥२४॥

विचार किए पाइयत हैं, इनों बल हिकमत । ए किया निमूना पावने, इन कादर की कुदरत ॥२५॥

हकें देखाई इन वास्ते, अपनी जो कुदरत । अर्स बड़ाई पाइए, ए देखें तफावत ॥२६॥

करत सबे साहेबियां, जिमी जुगत भरपूर । दोऊ बखत आवत हैं, देखन हक का नूर ॥२७॥

पातसाही पसु पंखियन की, करत बिना हिसाब । अखंड अलेखे अति बड़े, पिएं नूर हैयाती आब ॥२८॥

हिसाब नहीं पसुअन को, हिसाब नहीं पंखियन । नाहीं हिसाब बन जिमी को, जो बीच कायम वतन ॥२९॥

बसत सबे अर्स तले, कई पदमों लाख करोर । करत पूरी पातसाहियां, पसु पंखी दोऊ जोर ॥३०॥

जो कोई दूर बसत हैं, सो जानों आगे हजूर । बोहोत बल हिकमत, सब अंगों निज नूर ॥३१॥

जित मन में चितवें, तित पोहोंचें तिन बखत । ऐसा बल रखें हक का, कायम जिमी में बसत ॥३२॥

पसु पंखी इन बन में, जो जिमी बन सोभित । और सोभा पर नकस की, क्यों कर करूं सिफत ॥३३॥

पसु सुन्दर अति सोहनें, मीठी बान बोलत । इनों सिफत जुबां क्यों कहे, जो खावंद को रिझावत ॥३४॥

कई भांतें कई खेलौने, कई खेल खुसाली करत । कई विधों निरत नाच के, मासूक को हँसावत ॥३५॥

अनेक बानी मुख बोलहीं, अनेक अलापें गाए । ऐसे बचन कई बोलहीं, किसी आवे न औरों जुबाएं ॥३६॥

छोटे बड़े पसु पंखी, सब रिझावें साहेब । लड़ें खेलें बोलें बानी, विद्या कई विध साधें सब ॥३७॥

कई जुदी जुदी विद्या जानवर, कई चढ़ें ऊंचे कूदें फांदें । टेढ़े आड़े सीधे उलटे, कई विध गत साधें ॥३८॥

कई विध करें लड़ाइयां, कई विध नाचें मोर । कई विध हँसावें धनी को, खेल करें अति जोर ॥३९॥

निरमल नेत्र अति सुन्दर, परों पर चित्रामन । मीठी बानी खूबी खेल की, कहां लो कहूं रोसन ॥४०॥

और गत पसुअन की, खेल बोल इनों और । क्यों कहूं सिफत इनों की, जो बसत सबे इन ठौर ॥४१॥

कई लड़ के देखावहीं, कई उड़ देखावें कूद । क्यों कहूं सिफत कायम की, इन जुबां जो नाबूद ॥४२॥

कई देत गुलाटियां, कई अनेक करें फैल हाल । सौ सौ गत देखावहीं, ज्यों हक हादी रूहें होत खुसाल ॥४३॥

कई हंस गरूड़ केसरी, कई बाघ चीते घोड़े । ए ऐसे कहे जानवर, उड़ आकास में दौड़ें ॥४४॥

हाथी इत कई रंग के, अस्वारी के सिरदार । कबूं कबूं राजस्यामाजी रूहें, बड़े बन करत विहार ॥४५॥

कबूं कबूं राज रूहन सों, मनवेगी सुखपाल । बड़े बन मोहोलन में, करत खेल खुसाल ॥४६॥

इत और बिरिख कई बड़े, निपट बड़े हैं बन । बन पर बन अति विस्तरे, कहां लग करूं रोसन ॥४७॥

एक पेड़ लम्बी डारियां, तिन डारों पर पेड़ अपार । पेड़ डारों कई भोम रची, जुबां कहा कहे ए विस्तार ॥४८॥

इन भोम भोम कई मंदिर, पेड़ डारी कई दिवाल । छाया बनी पात फूल की, कई बन मंदिर इन हाल ॥४९॥

विस्तार बड़ा एक पेड़ पर, कहां लग कहूं जुबान । देखो विध एक बिरिख की, ए मंदिर न होए बयान ॥५०॥

एक बिरिख को बरनन, ऐसे कई बिरिख तिन बन माहें । तिन पर विस्तार अति बड़ो, सेहेर बसत जानों ताहें ॥५१॥

एक पेड़ दरखत का, कई दरखत तिन पर । तिन पर कई मंदिर रचे, कई रेहेत अंदर जानवर ॥५२॥

किनके पेड़ जिमी पर, कई पेड़ पेड़ ऊपर । यों पेड़ पर पेड़ आसमान लों, कई सोभा देत सुन्दर ॥५३॥

इन बिध बन विस्तार है, उपरा ऊपर अतंत । सोभा अमान पसु पंखी, इन मंदिरों में बसत ॥५४॥

बोहोत दूर लों ए बन, आगूं आगूं बड़े देखाए । चढ़ते चढ़ते चढ़ते, लग्या आसमानों जाए ॥५५॥

एक पंखी जिमी पर, एक बसत इन मोहोलन । एक बसत बल परन के, आकास में आसन ॥५६॥

ए बड़े खेल की खुसाली, बड़े बन कबूं करत । अस्वारी पसु पंखियन पर, कई कूदत उड़ावत ॥५७॥

हाथी ऊंचे पहाड़ से, मुख सुन्दर दंत सुढाल । मन वेगी कबूं न काहिली, तेज तीखी चलें चाल ॥५८॥

बाघ गूंजें अति बली, कूवत ले कूदत । देखे आवत दूर से, जानों आसमान से उतरत ॥५९॥

चीते अतंत सुन्दर, ऐसे ही बलवान । कमी काहू में नहीं, सोभित जोड़ समान ॥६०॥

जरे जानवर के वाओ सों, ब्रह्मांड उड़ावे कोट । तो अर्स जिमी के फील की, कहूं सो किन पर चोट ॥६१॥

ब्रह्मांड बड़ा इन दुनी में, कोई नाहीं दूसरा ठौर । तो अर्स बाघ के बल को, कहूं न निमूना और ॥६२॥

बोहोत बातें हैं इनकी, सो केती कहूं जुबान । ए नेक इसारत करत हों, है बेसुमार बयान ॥६३॥

अलेखे बल अकल, अलेखे हिकमत । अलेखे पेहेचान है, इस्क अलेखे इत ॥६४॥

ख्वाब बल पसुअन का, देखलाया तुम को । कैसा बल अर्स पसुअन का, विचार देखो दिल मों ॥६५॥

झूठ देखे सांच पाइए, इस्क बल हिकमत । ए तीनों तौल देखो दोऊ ठौर के, अंदर अपने चित्त ॥६६॥

ए झूठा अंग झूठी जिमी में, झूठी इन अकल । पूछ देखो याही झूठ को, कोई अर्स की है मिसल ॥६७॥

अर्स मिसाल कोई है नहीं, तौल देखो तुम इत । ए झूठा पसु बल देख के, तौलो जिमी बल सत ॥६८॥

सांच झूठ पटंतरो, कबहूं नाहीं कित । तो धनिएँ देखाई कुदरत, लेने अर्स लज्जत ॥६९॥

विचार किए इत पाइए, अर्स बुजरकी इत । धनी बुजरकी पाइए, और बुजरकी उमत ॥७०॥

महामत कहे ए मोमिनों, एही उमत पेहेचान । बिध बिध बान जो बेधहीं, हक बका अर्स बान ॥७१॥

॥ प्रकरण ॥२७॥ चौपाई ॥१२९२॥

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