परिकरमा - प्रकरण २८
पसु पंखियों का इस्क सनेह
खावंद इनों में खेलहीं, धंन धंन इनों के भाग । अर्स के जानवरों को, कायम है सोहाग ॥१॥
सब जिमी में बसत हैं, करत हैं कलोल । रात दिन जिकर हक की, करें मीठे मुख बोल ॥२॥
जस नया जुबां जुदी जुदी, रात दिन रटन । याही अंग इस्क में, छोड़त नाहीं खिन ॥३॥
खावंद के दीदार को, पसु और जानवर । आवत हैं गुन गावते, अपने समें पर ॥४॥
किस्सा इनों के इस्क का, किन मुख कह्यो न जाए । दीदार न होवे बखत पर, तो जानों अरवा देवें उड़ाए ॥५॥
अरवा इनों की ना छूटे, पर ऊपर होए बेहोस । अंग अरवा क्यों छूटहीं, अन्दर धनी को जोस ॥६॥
एक रोम न गिरे इनों का, हक नजर सींचेल । आठों पोहोर अंग में, करत धनी सो केलि ॥७॥
धनी इनों के कारने, सरूप धरें कई करोर । लें दिल चाह्या दरसन, ऐसे आसिक हक के जोर ॥८॥
सो मैं कह्यो न जावहीं, जो इस्क इनों के अंग । रोम रोम इनों के कायम, क्यों कहूं इस्क तरंग ॥९॥
एक इस्क धनी बिना, और कछू जानत नाहें । खेलें बोलें गाएं लरे, सो सब इस्क माहें ॥१०॥
क्यों कहूं पसु पंखियन की, इनके इस्क को बल । एक जरे को न पोहोंचहीं, इन अंग की अकल ॥११॥
मैं देख्या अर्स के लोकों को, कोई अंग न बिना इस्क । क्यों न होए गंज इस्क के, जित जरा नाहीं सक ॥१२॥
कहयो क्यों ए न जावहीं, इन अंगों के इस्क । कई कोट जुबां ले कहूं, तो कह्यो न जाए रंचक ॥१३॥
जेता बल जिन अंग में, तेता इस्क हक का जान । सक जरा ना मिले, पिउ सों पूरी पेहेचान ॥१४॥
पिउ की पेहेचान बिना, कछुए न जाने कोए । जरा सक तो उपजे, जो कोई दूसरा होए ॥१५॥
इस्क पूरा इनों अंगों, और पेहेचान पूरन । सब वजूदों एही रोसनी, कछू जानें ना हक बिन ॥१६॥
कछू कहयो तो जावहीं, जो कछू जरा कहावे कित । ब्रह्मांड तो खेल कबूतर, एक जरा न पाइए इत ॥१७॥
ताथें अंबार इस्क के, इन जिमी सब जान । हक का कायम वतन, सब अंग इस्क पेहेचान ॥१८॥
एक जरा जो इन जिमी का, सो सब इस्क की सूरत । आसमान जिमी जड़ चेतन, पेहेचान इस्क दोऊ इत ॥१९॥
पार नहीं जिमीन को, और पार नहीं आसमान । पार नहीं जड़ चेतन, पार ना इस्क रेहेमान ॥२०॥
छोटा बड़ा अर्स का, सो सब हैं चेतन । पेहेचान इस्क अंग में, इन विध बका वतन ॥२१॥
जल में जीव बसत हैं, सो सुन्दर सोभा अमान । फौज बांध आगूं धनी, खेल करें कई तान ॥२२॥
मच्छ कच्छ मुरग मेंडक, कई रंग करें अपार । जुदी जुदी बानी बोलत, स्वर राखत एक समार ॥२३॥
कई रंगों गुन गावते, सब स्वर बांधे रसाल । जस धनी को गावहीं, जिकर करें माहें हाल ॥२४॥
जीव छोटे बड़े कई जल के, अपने अपने ख्याल । खेलें बोलें दौड़ें कूदें, खावंद को करें खुसाल ॥२५॥
अनेक जानवर जल के, सो केते लेऊं नाम । जल किनारे रटत हैं, पिउ जस आठों जाम ॥२६॥
ए देखो नेक नीके कर, इनमें जरा सक नाहें । क्यों न होए इस्क के अंबार, तुम विचार देखो दिल माहें ॥२७॥
जो जरा इन जिमी का, तिन सब में इस्क । ए चेतन इन भांत के, कछू जानें न बिना हक ॥२८॥
पसु पंखी बन जिमिएं, तले ऊपर हैं जित । क्या जाने मूढ़ मुसाफ की, रमूजें इसारत ॥२९॥
देखो अंबार इस्क के, या जड़ या चेतन । जो कछू नजरों श्रवनों, सो इस्कै को वतन ॥३०॥
दरखत करत हैं सिजदा, छोटा बड़ा घास पात । पहाड़ जिमी जल सिजदे, इस्क न इनों समात ॥३१॥
यों अर्स सारा इस्क में, एक जरा न जुदा होए । खावंद सबों पिलावहीं, क्यों कहिए इस्क बिना कोए ॥३२॥
आसिक सबे इस्क में, या चांद या सूर । या तारा या आकास, सब इस्कै का जहूर ॥३३॥
जो सरूप इन जिमी के, सो सब रूह जिनस । मन अस्वारी सबन को, आए पिएं प्रेम रस ॥३४॥
सो भी रूह मन अर्स के, ए तूं नीके जान । बल देख झूठे मन को, अर्स मन बल पेहेचान ॥३५॥
ए झूठ हक को न पोहोंचहीं, तो क्यों देऊं निमूना ए । कछुक तो कह्या चाहिए, गिरो समझावने के ॥३६॥
चारों तरफों अर्स जिमिएं, जो कोई हैं सूरत । बखत पर दीदार को, मन वेगी पोहोंचत ॥३७॥
कोई दूर बसत हैं, सो दूर दूर से दूर । सो भी जान कदमों तले, इन मन बल ऐसा जहूर ॥३८॥
इन जिमी की क्यों कहूं, जिनको नाहीं पार । उत पार जो बसत हैं, इन मन बल को नहीं सुमार ॥३९॥
जो कोई जहां बसत हैं, सो तहां से आवत । समें-सिर दीदार को, कोई नाहीं चूकत ॥४०॥
ज्यों मन एक निमख में, पोहोंचत पार के पार । तो क्यों न पोहोंचे बका जिमी को, जिन मन बल नहीं सुमार ॥४१॥
दसों दिस बसत हैं, सब में खावंद बल । रोम रोम अंग इस्क के, इन हक इस्कै के सींचल ॥४२॥
कोई न निमूना पाइए, या इस्क या बल । एह खिलौने तिनके, जो खावंद अर्स असल ॥४३॥
एक जरा कह्या जुबां माफक, इत अलेखे विवेक । रूहें अर्स का बल अर्स के, जो हक जात हैं एक ॥४४॥
ख्वाब बैठ इन अर्स में, हकें देखाया तुमको । महामत कहे ए मोमिनों, पेहेचान लीजो दिलमों ॥४५॥
॥ प्रकरण ॥२८॥ चौपाई ॥१३३७॥
