परिकरमा - प्रकरण २९ | Parikarmaa prakaran 29
पसु पंखियों की अस्वारी
अस्वारी पसु पंखियन पर, धनी करत हैं जब । जो जहां बसत हैं, सो आए मिलत हैं सब ॥१॥
अस्वारी को रूहन को, जिन पर हुआ दिल । तिन आगूं ही जानिया, सो आए खड़े सब मिल ॥२॥
केसरी बाघ चीते हाथी, और जातें कई अनेक । कह्या जीन बने अंग उत्तम, सो कहां लों कहूं विवेक ॥३॥
कई बिध अस्वारी होत है, बुजरक जो जानवर । जीन जुगत क्यों केहे सकों, जो असल बने इन पर ॥४॥
घोड़े पर राखत हैं, आकास में उड़त । कमी करें ना कूदते, सुख अस्वारी के अतंत ॥५॥
कई बिध खेल रूहन के, मन वेगी जानवर । तिन पर अस्वारी करके, चढ़त आसमान पर ॥६॥
सोभा लेत बन में रूहें, अस्वार होत मिल कर । पसु पंखी दौड़ें मन ज्यों, जित जिमी बन बिगर ॥७॥
जब अस्वारी साहेब करें, होवें बड़ी रूह रूहें अस्वार । पसु पंखी सबे मिले, हर जातें फौजें न पार ॥८॥
कई जातें पसुअन में, हर जातें गिनती अपार । यों जातें जानवरों में, हर जातें नहीं सुमार ॥९॥
पसु पंखी जो बन में, सब आवें करने दीदार । राज स्यामाजी रूहें, जब कबूं होवें अस्वार ॥१०॥
हर फौजों बाजे बजें, हर फौजों निसान । भांत भांत रंग राखत हैं, आप अपनी पेहेचान ॥११॥
एह जुबां केती कहूं, अलेखे विस्तार । एक जात की फौज ना गिन सकों, तिन हर फौजों कई सिरदार ॥१२॥
कई फौजें तिन सिरदार की, हर फौजों कई जमातदार । गिनती तिन जमात की, होवे नहीं सुमार ॥१३॥
यों जुदी जुदी जातें चलते, दाएं बाएं मिसल । इंतमाम सबों में अति बड़ा, या आगूं या पीछल ॥१४॥
आगे पीछे फौज के, चोपदार बड़े बांदर । दाएं बाएं मिसल अपनी, फौज रखें बराबर ॥१५॥
कई फौजें पसुअन की, और कई फौजें जानवर । सुआ मैना नकीब तिनमें, फौज रखें मिसल पर ॥१६॥
कई जातें देखे जवेर, अर्स के भूखन । जंग करें जानवरों, जो परों पर चित्रामन ॥१७॥
पर जो पसुअन के, सो अतंत सोभा लेत । कहा करें ए भूखन, पसु ऐसी सोभा देत ॥१८॥
इनो रोम की जो रोसनी, सो उठत माहें आसमान । जंग करें जवेरों सों, कोई सके न काहू भान ॥१९॥
एक रोम जोत आसमान में, रही रोसनी भराए । तो जो एते पसु पंखी, सो जोत क्यों कही जाए ॥२०॥
ए दिल जाने रूहसों, मुख जुबां पोहोंचे नाहें । ए मोमिन होए सो विचारसी, अपने हिरदे माहें ॥२१॥
सो भूखन जो अर्स के, सब पेहेरे मन चाहे । सिनगार किया सब लसकरें, ए देखो मन ल्याए ॥२२॥
एक जरे जिमी की रोसनी, सो ढांपे कई कोट सूर । तो जिमी पहाड़ मोहोलन को, सब कैसा होसी नूर ॥२३॥
बन जंगल या जिमी, एक दूजे से प्रकास । विचार देखो ए मोमिनों, नूर कैसा भया आकास ॥२४॥
ए नूर जिमी बन लसकर, कहा कहूं रूहों रोसन । और तखत जो हक का, तुम विचार देखो मोमिन ॥२५॥
अब नूर बिलंद जो हक का, ले उठ्या सबका नूर । बन जिमी आकास सब, ए देखो एक जहूर ॥२६॥
आगूं केसरी कोतल, अति खूबी ले खेलत । बाघ चीते घोड़े हाथी, नट ज्यों नाचत ॥२७॥
अव्वल हार केसरिन की, दूजी हार बाघन । हार तीसरी सियाहगोस की, चौथी हार चीतन ॥२८॥
दीप सुअर रोझ रीछड़े, बैल साम्हर मृग मेढ़े । हरन अरन बकर कूकर, फील गिमल घोड़े गैंड़े ॥२९॥
केसरी कूवत ज्यादा कही, निपट अति बलवान । ए ख्वाब देखाया तिन वास्ते, करने अर्स पेहेचान ॥३०॥
केसरी कूवत कूदते, गरजत बिना हिसाब । बिन मन आवे आसमान में, ऐसी उठक सिताब ॥३१॥
ए गिनती बेसुमार है, और बोलत मिलकर जब । गरजत अर्स अंबर जिमी, बल देत देखाई तब ॥३२॥
सब्द केसरी जब काढ़हीं, अंबर जिमी रहे गाज । पड़घा उठे पृथ्वी पर्वतों, उठे उनथें अधिक आवाज ॥३३॥
क्यों कहूं बल बाघन को, ए जो ख्वाब में ऐसे जोर । देह छोटी बड़ी कूवत, देत फीलों मद तोर ॥३४॥
बोलत बाघ विस्तार के, सब मिल एकै सोर । गरजे सेती जानिए, इनों अंगों का जोर ॥३५॥
छंछेक देखे छैल चीते, जुगत जलदी जोर । काहिली ना अंग कबहूं, होत नहीं मन मोर ॥३६॥
अस्व आगूं अति बड़े, अस्वारी के सिरदार । सिर ऊंचे गरदन थांभत, थंभक थंभक थेई कार ॥३७॥
जब बोलत बदन विकास के, होत सबे हेहंकार । दसों दिसा सब गरजत, पड़त सबे पुकार ॥३८॥
सब्द फील जब उठहीं, गरजत गंज गंभीर । जिमी पहाड़ सब गाजत, और सैन्या सोहे सूर धीर ॥३९॥
यों कई जातें पसुअन की, कई खूबी बल कहूं केता । अपार बल खूबी अर्स की, नाहीं जुबां माफक है एता ॥४०॥
कई जातें हैं जानवर, चलते आगूं उड़त । कई लेवें गुलाटियां, अनेक खेल खेलत ॥४१॥
छोटे छोटा या बड़े बड़ा, खेल देखावें सब । सब सुख तबहीं पावहीं, धनी को रिझावें जब ॥४२॥
कई मुख बानी उचरें, तान मान गुन गान । आठों जाम करत हैं, सुन्दर ध्यान बयान ॥४३॥
नैन नीके चोंच सोभित, मीठी जुबां मुख बान । खुसबोए गूंजें कई भमरे, कई तिमर अलापें तान ॥४४॥
आसमान छाया पंखियों, सब खूबी देखावत । आप अपनी साधना, सब खेल की साधत ॥४५॥
बिना हिसाबें बाजंत्र, पड़े एक ताली घोर । जिमी अंबर सब गाजत, ए जुगत सोभा जोर ॥४६॥
बाजे सब बजावहीं, बंदे बांदर बलवंत । ओतो आपे बाजहीं पर, ए सेवा न छोड़त ॥४७॥
बाजे आपे चलहीं, पर पसु सेवा को उठाए । इन बखत खूबी कहा कहूं, ए केहे न सके जुबांए ॥४८॥
आगूं पीछूं सैन्या चले, खूबी देत बराबर । जो दाएं बाएं मिसलें, कोई छोड़े ना क्यों ए कर ॥४९॥
अस्वारी सबे सोभावत, मिसल आपनी जान । हर जातें फौज अपनी बांधके, चले सब समान ॥५०॥
ऐसे बड़े हाथी अर्स के, और बड़े कई पसुअन । जेता पसु पंखी अर्स का, तिन सबों अस्वारी मन ॥५१॥
देखो दिल विचार के, ए पसुओं का चलन । उड़त हैं आसमान में, ए चारों तरफों सब धरन ॥५२॥
ऐसे सबे लसकर, सुमार नाहीं बल । चिन्हार इस्क सबों को, बंदे कायम कदम तल ॥५३॥
एक देखी जात फीलन की, तिन फीलों जात अनेक । कई रंगो कई रूप हैं, सो कहां लों कहूं विवेक ॥५४॥
कई फौजें कई जिनस रंग, हर फौजें कई सिरदार । तिन सिरदार तले कई फौजें, तिन एक फौज को नाहीं सुमार ॥५५॥
अब फौज गिनों दिल अपने, पीछे गिनो सिरदार । सो सिरदार कई एक फौज में, तिन फौज करो निरवार ॥५६॥
यों गिनती न होए एक जात की, जो कहे फील रंग अपार । रंग रंग जातें कई कहीं, सो क्योंए न होए सुमार ॥५७॥
गिनती न होए एक जात की, तो क्यों कहूं इनों को बल । एक चिड़िया उड़ावे कोट ब्रह्मांड, तो कौन बल फीलों मिसल ॥५८॥
इन सब फीलों को पाखरे, और सिरिए जड़ाव रतन । सो जवेर हैं अर्स के, और अर्सै का कुंदन ॥५९॥
और सबन की क्यों कहूं, ए एक कही मैं जात । ए कैसी सोभा लेत हैं, दे दिल देखो साख्यात ॥६०॥
अब और जात की क्यों कहूं, जो है फीलों से बुजरक । ए बुजरक साहेबी देखाई रूहों, पावने पटंतर हक ॥६१॥
लेत सोभा अर्स जिमिएँ, जब साहेब होत अस्वार । ए जिन देख्या सो जानहीं, औरों पोहोंचे नहीं विचार ॥६२॥
कहा कहूं जात लसकर, एक जात को नाहीं पार । तिन जात में अनेक फौजें, एक फौज को नाहीं सुमार ॥६३॥
तिन हर फौजों कई साहेबियां, करें पातसाहियां अनेक । तिन पातसाहियों की क्यों कहूं, लवाजमें विवेक ॥६४॥
जब चले सैर जिमीय की, जो बन बिगर थोड़ी रेत । साफ जिमी अति दूर लों, तरफ पछिम की सुपेत ॥६५॥
इत दूर लों बन है नहीं, बोहोत बड़ो मैदान । अस्वारी होए इसही तरफ, जब कबूं करें सुभान ॥६६॥
मैदान अति दूर लो, दूर दूर अति दूर । सूर आकास रोसनी, और उज्जल जिमी सब नूर ॥६७॥
आगे सैर विध विध की, जब करें ऊपर सागर । कई विध के रस पूरन, सब पैरत हैं जानवर ॥६८॥
जल किनारे बन हैं, कई विध की बैठक । कई जल टापू पहाड़ में, कई मोहोलों माहें छूटक ॥६९॥
चलत पैरत कूदत, उड़ना याको काम । मन की अस्वारी सबको, मन चाहया करें विश्राम ॥७०॥
जो दिल चाहे तखतरवा, हजार बारे ले बैठत । राज स्यामाजी बीच में, आकास में उड़त ॥७१॥
कबूं सैर इन खेल को, ऊपर चढ़े आसमान । दिल चाहे सुख सबन को, देत रूहें प्यारी जान ॥७२॥
मन ऊपर चलत हैं, या जिमी जल बन । या चढ़े आसमान में, ठौर फिरवले सबन ॥७३॥
पार नहीं आसमान को, जहांलो जानें तहांलो जाएं । खेल कर पीछे फिरें, देखें पर्वत आए ॥७४॥
दिल चाहया रूहन को, हक दें हमेसा सुख । पहाड़ बन मोहोल आकास जिमी, जित रूहों का होवे रूख ॥७५॥
जो रूख होवे जल पर, या जोए या ताल । या सुख मोहोलन में, देवें दायम नूरजमाल ॥७६॥
ए खूबी इन बखत की, हकें दई देखाए । ए ख्वाब में प्यारी लगी, अर्स की ठकुराए ॥७७॥
मैं तुमें कहूं मोमिनों, देखो दिल लगाए । ऐसी साहेबी खसम की, जो रूह देख सुख पाए ॥७८॥
इस वास्ते निमूना, ए जो करी कुदरत । साहेबी अपनी जान के, करी बकसीस ऊपर उमत ॥७९॥
तो क्या निमूना झूठ का, पर लेसी रूहों लज्जत । ख्वाब बड़ाई देख के, विचारसी निसबत ॥८०॥
ए साहेबियां देखाइयां, ख्वाब में उमत । और देखाई साहेबी अपनी, सुख देने को इत ॥८१॥
तफावत ए झूठ की, क्यों आवे बराबर सांच के । पर रूहें सुख पावत हैं, देख अपनी साहेबी ए ॥८२॥
कहा कहूं ठकुराई की, और क्यों कहूं बुध बल । क्यों कहूं इस्क पेहेचान की, और क्यों कहूं सुख नेहेचल ॥८३॥
क्यों कहूं मोहोल अर्स के, क्यों कहूं जिमी बन । क्यों कहूं इन लसकर की, मिने पातसाहियां पूरन ॥८४॥
ए बात हैं विचार की, कई जातें जानवर । कई जातें पसुअन की, याको बल कहूं क्यों कर ॥८५॥
एक जात बाघन की, कहूं केते रंग तिन माहें । इन रंग सुमार ना आवहीं, क्यों होवे हिसाब जुबांए ॥८६॥
अब कैसा बल समूह का, पसु और जानवर । देखो साहेबी अर्स की, ले ब्रह्मांड बल नजर ॥८७॥
ए निमूना इन वास्ते, देखलाया रूहन । झूठ कौन आगूं सांच के, पर बल न पाइए या बिन ॥८८॥
इन सुपन जिमी में बैठ के, क्यों कहूं ठकुराई अर्स । ए गिरो विचारें सुख पावसी, जो होसी अरस-परस ॥८९॥
ए विचार विचार विचारिए, तो पाइए लसकर बल । सुमार तो भी न पाइए, जिमी अपार नेहेचल ॥९०॥
क्यों कहूं जिमी अपार की, क्यों कर कहूं मोहोलात । क्यों कहूं जोए हौज की, क्यों कहूं नूर जात ॥९१॥
क्यों कहूं अर्स जिमी की, क्यों कहूं हक सूरत । क्यों कहूं खासी रूह की, क्यों कहूं रूहें उमत ॥९२॥
क्यों कहूं इन सुख की, क्यों कहूं इन विलास । क्यों कहूं इस्क आराम की, क्यों कहूं रमूजें हाँस ॥९३॥
इन अर्स का खावंद, सो धनी अपना हक । ए देखो साहेबी अर्स की, ए मोमिनों बुजरक ॥९४॥
देखो साहेबी अपनी, मेरा खसम नूरजमाल । जब देखत हों दिल ल्याए के, मेरी रूह होत खुसाल ॥९५॥
क्यों न होए खुसालियां, देख अपनी ठकुराए । और नाहीं कोई कहूं, ए मैं देख्या चित्त ल्याए ॥९६॥
मेरे खसम का नूर है, नूर अंग नूरजलाल । सो आवत दायम दीदार को, मेरा खसम नूरजमाल ॥९७॥
सांची साहेबी खसम की, जो कायम सुख कामिल । ऐसा आराम अपने हकसों, इत नाहीं चल विचल ॥९८॥
बड़ी बड़ाई बड़ी साहेबी, बुजरक सदा बेसक । और सब याकें खेलौने, सब पर एकै हक ॥९९॥
महामत साहेबी हककी, मैं खसम अंग का नूर । अंग रूहें मेरा नूर हैं, सब मिल एक जहूर ॥१००॥
॥ प्रकरण ॥२९॥ चौपाई ॥१४३७॥
