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परिकरमा - प्रकरण ३० | Parikarmaa prakaran 30

तीनों सरूपों की पेहेचान बल अर्स की तरफ का

पेहेले किया बरनन अर्स का, रूह अल्ला का केहेल । अब चितवन सें केहेत हों, जो देत साहेदी अकल ॥१॥

जब जानों करूं बरनन, तब ऐसा आवत दिल । जब रूह साहेदी देत यों, इत ऐसा ही चाहिए मिसल ॥२॥

इन विध हआ है अव्वल, दई रूह साहेदी तेहेकीक । जो कही बानी जोस में, सो साहेब दई तौफीक ॥३॥

हकें दई किताबें मेहेर कर, जो जिस बखत दिल चाहे । सोई आयत आवत गई, जो रूह देत गुहाए ॥४॥

सब्द जो सारे इन विध, कही आगे से आखिरत । बिना फुरमान देखें कहे, ना हादिएँ कही हकीकत ॥५॥

कहें सब्द रूह साहेदी, पर दिल देत कछू सक । मुसाफ देखे भागी सक, सब आयतें इसी माफक ॥६॥

और फुरमान में ऐसा लिख्या, ओ केहेसी मेरे माफक । आवसी मेरी उमत में, करने कायम दीन हक ॥७॥

सोई सुध दई फुरमानें, सोई ईसे दई खबर । मेरे मुख सोई आइया, तीनों एक भए यों कर ॥८॥

रूहअल्ला ने मेहेर कर, दिया खुदाई इलम । सब सुध भई अर्स की, रूहें बड़ी रूह खसम ॥९॥

सब काम भए उमत के, देखें हक फुरमान । सोई इलम दिया रूहअल्ला, मैं लई नसीहत तीनों पेहेचान ॥१०॥

अब जो केहेती हों अर्स की, सो दिल में यों आवत । बिना देखे केहेत हों, जित रूह जो चाहत ॥११॥

अर्स के बरनन की, कही हादियों इसारत । सो दोऊ साहेदी लेयके, जाहेर करूं सिफत ॥१२॥

मेरी बानी जुदी तो पड़े, जो वतन दूसरा होए । कहे हादी बल माफक, उरे सिफत सब कोए ॥१३॥

बेसुमार बुजरकी अर्स की, नेक कहूं अकल माफक । ए रूहें नीके जानत हैं, जो अपार अर्स है हक ॥१४॥

ए सुख न आवे जुबां मिने, तो भी केहेना अर्स बन सुख । रूहें बैठत उठत सुख सनेह सो, कई गिरो को देत श्रीमुख ॥१५॥

धनिएँ आगूं अर्स के, कहे तीन चबूतर । दाहिनी तरफ तले तीसरा, हरा दरखत तिन पर ॥१६॥

चौथी तरफ नाहीं कहया, सो मेरी परीछा लेन । जाने मेरे इलम से रूह आपै, केहेसी आप मुख बैन ॥१७॥

ना तो ए लड़का सो भी जानहीं, जो कछू कर देखे सहूर । एक तरफ क्यों होवहीं, आगूं अर्स तजल्ला नूर ॥१८॥

खूब देखाई क्यों देवहीं, चबूतरा एक तरफ । जाने केहेसी आपे दूसरा, मेरे इलम के सरफ ॥१९॥

तले चौथा चाहिए, आगूं अर्स द्वार । दरखत दोऊ चबूतरों, सोभा लेत अपार ॥२०॥

आगूं इन चबूतरों, खेलावत जानवर । नए नए रूप रंग ल्यावहीं, अनेक विध हुनर ॥२१॥

आगूं इन दरबार के, दायम विलास है बन । कई विध खेल करें जानवर, हक हँसावें रूहन ॥२२॥

इन चौक खुली जो चांदनी, आगूं बड़े दरबार । उज्जल रेती झलकत, जोत को नाहीं पार ॥२३॥

जोत लगी जाए आसमान, थंभ बंध्यो चौखून । आकास जिमी बीच जोत को, इनको नहीं निमून ॥२४॥

और जोत जो बिरिख की, सो भी बीच आकास और बन । पार नहीं इन जोत की, पर एह रंग और रोसन ॥२५॥

जेता कोई रंग बन में, तिन रंग रंग हर हार । इन विध आगूं अर्स के, बन पोहोंच्या जोए किनार ॥२६॥

कहूं हारें कहूं चौक गुल, कहूं नकस कटाव । जाए न कही इन जुबां, ज्यों चंद्रवा जुगत जड़ाव ॥२७॥

ए देखे ही बनत है, केहेनी में आवत नाहें । अकल में न आवत, तो क्यों आवे बानी माहें ॥२८॥

चारों तरफों बन में, कई जिनसें कई जुगत । नई नई भांत ज्यों चंद्रवा, बन में केती कहूं विगत ॥२९॥

चारों तरफों अर्स के, कई बैठक चौक चबूतर । जुदे जुदे कई विध के, ए नेक कहूं दिल धर ॥३०॥

सात घाट आगूं अर्स के, ए है बड़ो विस्तार । नेक कहूं हिंडोले चौकियां, फेर कहूं आगूं अर्स द्वार ॥३१॥

बट पीपल चारों चौकियां, ऊपर छातें भी चार । अंबराए बिरिख अनेक बन, निहायत रोसन झलकार ॥३२॥

चल्या गया चौथी तरफ लों, अतंत खूबी विस्तार । तले चेहेबच्चे नेहेरें चलें, जुबां केहे न सके सुमार ॥३३॥

याही बन के चबूतरे, याही बन की मोहोलात । ए खूबी इन बन की, इन जुबां कही न जात ॥३४॥

एक एक चौकी देखिए, रूहें बैठत बारे हजार । बीच बीच सिंघासन हक का, ए सोभा अति अपार ॥३५॥

ए बन हांस पचास लो, सेत हरे पीले लाल । ए बन खूबी देख के, मेरी रूह होत खुसाल ॥३६॥

जित बन जैसा चाहिए, तहां तैसा ही तिन ठौर । नकस बेल फूल बन के, एक जरा न घट बढ़ और ॥३७॥

एह बन देखे पीछे, उपज्यो सुख अनंत । ए ठौर रूह से न छूटहीं, जानों कहां देखूं मैं अंत ॥३८॥

तले जिमी अति रोसनी, और रोसन चारों छात । चारों चौक देखे आगूं चल के, ए सुख रूहें जाने बात ॥३९॥

तले बन निकुन्ज जो, तिन पर ए मोहोलात । मिल गए मोहोल अर्स के, रूहें दौड़त आवत जात ॥४०॥

ज्यों ऊपर हिंडोले अर्स के, भोम सातमी आठमी जे । जब इन बन हिंडोलों बैठिए, देखिए बड़ी खुसाली ए ॥४१॥

जैसे हिंडोले अर्स के, ऐसे ही हिंडोले बन । रूहें बारे हजार बैठत, ए समया अति रोसन ॥४२॥

इन बन में जो हिंडोले, छप्पर-खटों की जिनस । सांकरें जंजीरां झनझनें, जानों सबथें एह सरस ॥४३॥

इत घाट नारंगी पोहोंचिया, दोऊ तरफों इत । बट घाट निकुन्‍ज ले, इन हद से आगूं चलत ॥४४॥

तरफ बांईं सोभा ताल की, बीच चांदनी चारों घाट । जल बन मोहोल पाल की, अति सोभित ए ठाट ॥४५॥

कई मोहोल मानिक बन पहाड़ के, कई नेहेरें मोहोल बन । मोहोल पहाड़ कई सागरों, फेर आए दूब बन अंन ॥४६॥

अतंत सोभा इन बन की, ए जो आए मिल्या फूलबाग । फूलबाग हिंडोले ए बन, तूं देख खूबी कछू जाग ॥४७॥

चौकी हांस पचास लो, फूलबाग हद जित । और पचास हांस फूलबाग, बड़े चेहेबच्चे पोहोंचत ॥४८॥

ए बड़ा चेहेबच्चा बाहे, एक हांस को लगत । बड़ी कारंज पानी पूरन, कई नेहेरें चलत ॥४९॥

ए फूलबाग चौड़ा चबूतरा, निपट बड़ा निहायत । फूलबाग बगीचे चेहेबच्चे, विस्तार बड़ो है इत ॥५०॥

मोहोल झरोखे अर्स के, फूलबाग के ऊपर । जोत झरोखे अर्स के, ए नूर कहूं क्यों कर ॥५१॥

जहां लग हद फूलबाग की, ए जिमी जोत अपार । ए जोत रोसनी जुबां तो कहे, जो आवे माहें सुमार ॥५२॥

इत दिवाल तले दस खिड़कियां, जित रूहें आवें जांए । ए खूबी आवे तो नजरों, जो विचार कीजे रूह माहें ॥५३॥

इन आगूं लाल चबूतरा, ले चल्या अर्स दिवाल । खूबी देख बन छाया, ए बैठक बड़ी विसाल ॥५४॥

ए जो भोम चबूतरा, बन आगूं बिराजत । इत केतेक जिमी में जानवर, रूहें हक हादी खेलावत ॥५५॥

ऊपर लाल चबूतरे, सब दरवाजे मेहेराब । एही झरोखे इन भोम के, खूबी आवे न माहें हिसाब ॥५६॥

बड़ी बैठक इन चबूतरे, अति खूबी तिन पर । इत खूबी खुसाली होत है, जब खेलें बड़े जानवर ॥५७॥

एही झरोखे एही चबूतरा, दोऊ तरफ चेहेबच्चे दोए । एक पीछल जो छोड़िया, आगूं दूजी भोम का सोए ॥५८॥

जो बन आया चेहेबच्चे, सोभा अति रोसन । छाया करी जल ऊपर, तीनों तरफों तिन ॥५९॥

ऊपर झरोखे मोहोल के, जल पर बने जो आए । इन चेहेबच्चे की सिफत, या मुख कही न जाए ॥६०॥

कई बन हैं इत ताड़ के, कई खजूरी नारियल । और नाम केते लेऊं, बट पीपल सर ऊमर ॥६१॥

इत केतेक बन में हिंडोले, ए जो रूहें लेत इत सुख । लिबोई घाट इत आए मिल्या, सो सोभा क्यों कहूं या मुख ॥६२॥

हिंडोले इन बन के, ए बन बड़ा विस्तार । इन आगूं घाट केल का, और बड़ा बन तिन पार ॥६३॥

अब जो बन है केल का, सो आगूं पोहोंच्या जाए । तिन परे बन पहाड़ का, सब दोरी बंध सोभाए ॥६४॥

बन बड़ा पुखराज का, कई मोहोल बड़े अतंत । तिन परे बड़े बन की, जुबां कहा करसी सिफत ॥६५॥

जाए मिल्या बन नूर के, नूर परे कहूं क्यों कर । जित ए न्यामत देखिए, सो सब सुमार बिगर ॥६६॥

अब कहूं आगूं अर्स के, और जोए किनार । बन मोहोल नूर मकान, सोहे जोए के पार ॥६७॥

दोए पुल जोए ऊपर, ए अति खूबी मोहोलात । पांच पांच भोमें मोहोल की, ऊपर छठी चांदनी छात ॥६८॥

ए जोत धरत हैं झरोखे, करें साम सामी जंग । जोत कही न जाए एक तिनका, ए तो मोहोल अर्स के नंग ॥६९॥

तले चलता पानी जोए का, दस घड़नाले जल । नेहेरें चली जात दोरी बंध, ए जल अति उज्जल ॥७०॥

चार चौकी बन माफक, छात पांचमी ऊपर किनार । ए जुगत बनी जोए मोहोल की, सोभित अति अपार ॥७१॥

जोए ऊपर बन झरोखे, सो निपट सोभा है ए । फल फूल पात जल ऊपर, ए बने तोरन नंग जे ॥७२॥

साम सामी दोऊ किनारे, तरफ दोऊ बराबर । दो बन की दो जवेर की, मोहोल चारों अति सुन्दर ॥७३॥

इन पुल दोऊ के बीच में, बीच बने सातों घाट । तीन बाएं तीन दाहिने, बीच बनी चांदनी पाट ॥७४॥

ए तुम सुनियो बेवरा, सात घाटों का इत । ए नेक नेक केहेत हों, सोभा अति अर्स सिफत ॥७५॥

बन के मोहोल से चलिया, जानों तले ऊपर एक छात । छात दूजी घर पंखियों, बन ऊपर बन मोहोलात ॥७६॥

ए जो पसु पंखी नजीकी, हक हादी खेलौने अतंत । बोल खेल सोभा सुंदर, सो इन मोहोलों बसत ॥७७॥

रात दिन गूंजे अर्स में, हक की करें जिकर । क्यों कहूं इनों चित्रामन, सोभा अति सुन्दर ॥७८॥

बानी सुनें तें सुख उपजे, और देखें सुख अपार । या पसु या जानवर, सोभा न आवे माहें सुमार ॥७९॥

तीन घाट आगूं अर्स के, जांबू अमृत अनार । सो अनार पोहोंच्या अर्स को, दो दोऊ भर किनार ॥८०॥

घाट तीन हांस पचास लों, बीच बड़े दरबार । दो घाट लगे दोऊ हिंडोलों, दो घाट हिंडोलों पार ॥८१॥

ए जो पाट घाट अमृत का, सो आया आगूं चबूतर । चौक चौड़ा हिस्से तीसरे, इत दीदार होत जानवर ॥८२॥

ता बीच चौड़े दो चबूतरे, ऊपर हरा लाल दरखत । छाया बराबर चबूतरे, ए निपट सोभा है इत ॥८३॥

लंबा चौड़ा चारों हांसों, बराबर दोरी बंध । अनेक रंग बन इतका, सोभित अनेक सनंध ॥८४॥

बन गिरदवाए अर्स के, देख आए आगूं द्वार । केहे ना सकों हिस्सा कोटमा, अर्स बन कहया अपार ॥८५॥

बन में फिर के देखिया, अर्स अजीम के गिरदवाए । एकल छाया बन की, तले जिमी जोत कही न जाए ॥८६॥

बन छाया दीवाल लग, झूमत झरोखों पर । ठाढ़े होए के देखिए, आवत चांदनी लो नजर ॥८७॥

फिरती गिरदवाए चांदनी, नवों भोम झरोखे । गिरदवाए विचारी गिनती, छे हजार हर हार के ॥८८॥

एही आतम को पूछ के, नवों भोम करो विचार । ले भोम से लग चांदनी, ए भी हारें छे हजार ॥८९॥

हर हार चढ़ती नव नव, छे हजार फिरती हर हार । जमा भए नव भोम के, अर्ध लाख चार हजार ॥९०॥

झरोखे कई विध के, गिनती होए क्यों कर । कहूं जुदे जुदे कहूं सामिल, ए लीजो दिल धर ॥९१॥

ए जो एक एक लीजे दिल में, तो हर हांसे तीस तीस । कहूं एक झरोखा तीस का, कहूं दस कहूं बीस ॥९२॥

गिरदवाए कठेड़ा चांदनी, क्यों कहूं खूबी जुबांन । अर्स एकै जवेर का, एकै बिध रंग रस जान ॥९३॥

कई विध की इत बैठकें, जुदे जुदे कई ठौर । चारों तरफों अर्स के, देखी एक पे एक और ॥९४॥

हर खांचों साठ गुमटियां, सोभित फिरती हार । ए झरोखे कंगूरे, बैठक बारे हजार ॥९५॥

दो सौ खांचों ऊपर, सोभें नगीने सौ दोए । बुजरक बीच गुमटियां, खूबी केहे न सके कोए ॥९६॥

ए जो दो सै एक नगीने, कलस बने इन पर । इन विध की ए रोसनी, ए जुबां कहे क्यों कर ॥९७॥

और कलस ऊपर गुमटियों, ए जो कहे कंगूरे बारे हजार । ए जोत जुबां ना केहे सके, झलकारों झलकार ॥९८॥

कलसों पर जो बेरखे, सो क्यों कहूं रोसन नूर । ए जो बनी बराबर गिरदवाए, हुओ बीच आसमान जहूर ॥९९॥

केहे केहे मुख जेता कहे, सो सब हिसाब के माहें । और हक हुकम यों केहेत है, ए सिफत पोहोंचत नाहें ॥१००॥

महामत कहे ए मोमिनों, ए छोड़िए नहीं एक दम । अब कहूं अंदर अर्स की, जो दिए निसान खसम ॥१०१॥

॥ प्रकरण ॥३०॥ चौपाई ॥१५३८॥

इसी सन्दर्भ में देखें-