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परिकरमा - प्रकरण ३१

दसों भोम बरनन - भोम पेहेली

बड़ा चौक सोभा लेत है, बड़े दरवाजे अंदर । बड़ी बैठक इत गिरोह की, आगूं रसोई के मन्दिर ॥१॥

दस स्याम सेत के लगते, दस मंदिर सामी हार । इन चौक की रोसनी, मावत नहीं झलकार ॥२॥

कई नकस कई कटाव, इन भोम में देखत । दिन पंद्रा खेलें बन में, पंद्रा आरोगें इत ॥३॥

इन चौक में साथजी, बोहोत बेर बैठत । आवत जात बनथें, बैठत इत अलबत ॥४॥

लाड़बाई के जुत्थ की, इत बोहोत खेल करत । बाहेर अंदर चौक में, बन मोहोलों सुख लेवत ॥५॥

बन मोहोल विलास को, सुख गिनती में आवत नाहें । ए न कछू जुबां केहे सके, चुभ रहत चित माहें ॥६॥

राज ‍स्यामाजी बैठत, बनथें फिरती बखत । इन ठौर आरोग के, चौथी भोम निरत ॥७॥

जैसा चौक तले का, तैसा ही ऊपर । आगूं झरोखे दूजी भोम के, इत चौक बीस मंदिर ॥८॥

इसी भांत भोम तीसरी, ऊपर चढ़ती चढ़ती जे । खूबी लेत अति अधिक, चौक ऊपर चौक ए ॥९॥

नवों भोम इन विध की, आगूं उपरा ऊपर बड़े द्वार । आगे चौक सबन के, सबों फिरते थंभ हार ॥१०॥

और विध केती कहूं, भोम भोम ठौर अनेक । ए कोट जुबां ना केहे सके, तो कहा कहे रसना एक ॥११॥

भोम दूसरी

स्याम सेत के बीच में, सीढ़ियां सुन्दर सोभित । बोहोत साथ इत आए के, चढ़ उतर करत ॥१२॥

इतथें चले खेलन को, आगूं मंदिर जहां भुलवन । जब जात चेहेबच्चे झीलने, तब खेलें ठौर इन ॥१३॥

खेल करें इत भुलवनी, मंदिर एक सौ दस की हार । सो हर तरफों गिनिए, एही गिनती तरफ चार ॥१४॥

ए भुलवनी ऐसी भई, देखी चारों किनार । द्वार सबों बराबर, भए मंदिर बारे हजार ॥१५॥

मंदिर जुदे कर गिनिए, हर मंदिर दरवाजे चार । यों गिनती बारे हजार की, भए अड़तालीस सहस्त्र द्वार ॥१६॥

सो ए भई इत भुलवनी, भए द्वार चौबीस हजार । एक दूजे में गिनात है, खेलें हँसें रूहें अपार ॥१७॥

रूहें द्वार एक दौड़ के, चौथे जाए निकसत । प्रतिबिंब उठें कई तरफों, कोई काहूं ना पकरत ॥१८॥

भागत एक मंदिर से, प्रतिबिंब उठें अपार । पकड़न कोई न पावहीं, निकस जाएं कई द्वार ॥१९॥

इन ठौर खेल रूह के, बोहोत भई भुलवन । होत हाँसी इत खेलते, रंग रस बढ़त रूहन ॥२०॥

इनहूं बीच चबूतरा, हक हादी मध बैठत आए । ए सोभा इन बखत की, इन मुख कही न जाए ॥२१॥

दूजी भोम का चेहेबच्चा, धनी बैठत इत अन्हाए । सिनगार समें रूहन के, इन जुबां कहयो न जाए ॥२२॥

इत खेल के आए चेहेबच्चे, अन्हाए के कियो सिनगार । पीछे चरनों लागें जुगल के, माहें माए ना मंदिरों झलकार ॥२३॥

ए नेक कही इन ठौर की, इत हिसाब बिना बैठक । सुख देत इत कायम, जैसा बुजरक हक ॥२४॥

ए दूजी भोम जो अर्स की, इत बोहोत बड़ो विस्तार । ए नेक नेक केहेत हों, जुबां कहा केहे सिफत सुमार ॥२५॥

भोम तीसरी

बैठे हक हादी भोम तीसरी, जित आवत नूरजलाल । इत दोए पोहोर की बैठक, और सेज्या सुख हाल ॥२६॥

बीच बन्या दरवाजा दो हांस का, बीच दस झरोखे । पांच बने बांईं हांस के, पांच दाहिनी से ॥२७॥

बड़े झरोखे तिन पर, तिन पर बड़े देहेलान । इत आए फजर पसु पंखियों, दीदार देत सुभान ॥२८॥

देहेलान दस मंदिर का, झरोखे दस सामिल । माहें चौक दस मंदिर का, हुए तीनों मिल कामिल ॥२९॥

तीसरा हिस्सा एक हांस का, ए जो दस झरोखे । द्वार थंभ आगूं इन, ना दिवाल बीच इनके ॥३०॥

और सुख इन भोम के, बोहोत बड़ो विस्तार । सो मुख बानी क्यों कहूं, जिनको नहीं सुमार ॥३१॥

मंदिर दस का बेवरा, दस का एकै देहेलान । माहें बाहेर बराबर, जानें मोमिन अर्स बयान ॥३२॥

और जो झरोखे गिरदवाए के, तिनही के सरभर । एता ऊंचा जिमी से, देखें हुकमें रूहें नजर ॥३३॥

छे मंदिर आगूं सीढ़ियां, दोऊ तरफ चढ़ाए । चौक छोटे आगूं देहरी, सोभा इन मुख कही न जाए ॥३४॥

और चौक बड़ा जो बीच का, सीढ़ी सनमुख आगूं द्वार । सोए बराबर द्वार के, सोभा कहूं जो होए सुमार ॥३५॥

दोऊ तरफों खिड़कियां, तिन आगूं बढ़ती पड़साल । ए रूहें नजरों नीके देखहीं, तो तेहेकीक बदलें हाल ॥३६॥

और आरोगें भी इतहीं, इत बैठें नूरजमाल । दौड़त रूहें निहायत, ए क्यों कहूं खुसाली ख्याल ॥३७॥

बड़ी बैठक पड़साल की, इत मेवा मिठाई आरोगत । कर सिनगार चरनों लगें, सबे इत बैठत ॥३८॥

सिनगार करें देहेलान में, आरोगें और मंदिर । इतहीं दीदार नूर को, दिन पौढ़े पलंग अंदर ॥३९॥

दो हांस बीच तीसरा हिस्सा, तिनके झरोखे दस । एक हांस तिनकी बढ़ी, ए भी सोभा एक रस ॥४०॥

बड़ा दरवाजा इनमें, बीच दोए हांस इन । भोम तले लग चांदनी, ए खूबी अति रोसन ॥४१॥

अंदर चौड़ाई चौक की, और भी हैं कई ठौर । जुदे जुदे सुख लेत हैं, रंग रस कई और और ॥४२॥

भोम चौथी

निरत होत चौथी भोम में, जित मोहोल बन्यो विसाल । चौक मध्य अति सुन्दर, क्यों कहूं मंदिर द्वार ॥४३॥

तीनों तरफों मंदिर, आगूं दो दो थंभों की हार । बड़ा मोहोल अति सोभित, सुन्दर अति सुखकार ॥४४॥

थंभ द्वार अति सोभित, तरफ तीनों साठ मंदिर । बीस बीस हर तरफों, चौक बैठक अति अंदर ॥४५॥

द्वार सोभित कमाड़ियों, साठों करें झलकार । और जोत थंभन की, सुख कहूं जो होए सुमार ॥४६॥

पीठ पीछे जो मंदिर, कई रंग सेत दिवाल । दाहिनी तरफ लाखी मंदिर, क्यों कहूं नकस मिसाल ॥४७॥

बांईं तरफ दिवाल जो, मंदिर लिबोई रंग । बेल नकस कटाव कई, सो केते कहूं तरंग ॥४८॥

हरी दिवाल जो मंदिर, सो सामी है नेक दूर । चारों तरफों अर्स जवेर, करें जंग नूर सों नूर ॥४९॥

एह ठौर है निरत की, सो केता कहूं मजकूर । चारों तरफों ऊपर तले, कहूं मावत नहीं जहूर ॥५०॥

राज स्यामाजी बीच में, बैठक सिंघासन । रूहें बारे हजार को, हक देत सुख सबन ॥५१॥

कई विध के बाजे बजें, नवरंग बाई नाचत । हाथ पांउ अंग बालत, कही न जाए सिफत ॥५२॥

ले बाजे रूहें खड़ी, मृदंग जंत्र ताल । रंग रबाब चंग तंबूरा, बोलत बेन रसाल ॥५३॥

पांउं झांझर घूंघर बोलहीं, कांबी कड़लो बाजत । याही तरह अनवट बिछुआ, संग लिए गाजत ॥५४॥

हाथ कंकन नंग नवघरी, स्वर एकै रस पूरत । और भूखन सबों अंगों, सोभित सब सूरत ॥५५॥

जिन विध पाऊं चलावहीं, सोई भूखन बोलत । जो बजावें झांझरी, तो घूंघरी कोई ना चलत ॥५६॥

जो बोलावत घूंघरी, तो नहीं झांझरी बान । जो सबे बोलावत, तो बोलें सब समान ॥५७॥

प्रेम रसायन गावत, अति प्यारी मीठी बान । याही विध हस्त देखावहीं, फेर फेर देत हैं तान ॥५८॥

कई जुदे जुदे बोलें भूखन, सब बाजे मिलावत संग । एक रस सब गावत, नवरंग-बाई के रंग ॥५९॥

हाथ धरत मृदंग पर, जब अव्वल स्वर करत । निरत करें कई विधसों, कई गुन कला ठेकत ॥६०॥

कई गत भांत रंग ल्यावत, ए तो कामिल निरत कमाल । इन छेक बालन की क्यों कहूं, जो देखत नूर जमाल ॥६१॥

कई विध कहूं बाजंत्र की, कई विध नट नाचत । कई विध की फेरी कहूं, कई रंग रस गावत ॥६२॥

नामै जाको नवरंग, ताकी निरत कहूं क्यों कर । अनेक गुन रंग ल्यावहीं, नए नए दिल धर ॥६३॥

मुरली बजावत मोरबाई, बेनबाई बाजंत्र । तानबाई तान मिलावत, निरत जामत इन पर ॥६४॥

कंठ केलबाई अलापत, स्वर पूरत बाईसेंन । सब मिल गावें एक रस, मुख बानी मीठी बैन ॥६५॥

झरमरबाई बजावत, माहें झरमरी अमृती । कई बाजे कई रंग रस, ए रंग अलेखे कहूं केती ॥६६॥

खड़ियां रूहें निरत में, इत उछरंग होत । तरफ चारों जवेरन में, निरत देखे अधिक जोत ॥६७॥

निरत कला सब नाच के, फेर फेर देत पड़ताल । यों स्वर मीठे मोहोलन के, चलत आगूं मिसाल ॥६८॥

ऐसे ही प्रतिबिंब इनके, मोहोल बोलें कई और । बानी बाजे निरत अवाजे, होत निरत कई ठौर ॥६९॥

साम सामी पसु पंखी नंग के, जंग करें जवेरों दोए । एक ठौर निरत नाचत, ठौर ठौर सामी होए ॥७०॥

यों सब ठौर जंग अर्स में, कहूं केती विध किन । अपार अखाड़े सब दिसों, होत सब में रोसन ॥७१॥

ए रूह की आंखों देखिए, असल बका के तन । तो देखो चित्रामन धाम की, करत निरत सबन ॥७२॥

एह खेल एक पोहोर लग, होत हमेसां इत । पंद्रा दिन जब घर रहें, तब देखें दुलहा निरत ॥७३॥

मेहेबूब को रिझावने, अनेक कला साधत । और नजर ना कर सकें, बंध ऐसे ही बांधत ॥७४॥

थंभ दिवालें सिंघासन, सब में होत निरत । इन समें पसु पंखी चित्रामन के, सब ठौरों केलि करत ॥७५॥

बोहोत बातें बीच अर्स के, किन विध कहूं इन मुख । जो बैठीं इन मेले मिने, सोई जानें ए सुख ॥७६॥

ऐसी चारों तरफों कई बैठकें, अंदर या गिरदवाए । ए सुख अखंड अर्स के, क्यों कर कहे जांए ॥७७॥

भोम पांचमी पौढ़न की

सुख बड़ो भोम पांचमी, मध्य मंदिर बारे हजार । बीच मोहोल स्यामाजीय को, इन चारों तरफों द्वार ॥७८॥

चौखूंनी बाखर बनी, तिन विस्तार है बुजरक । चारों तरफों बराबर, कहूं बेवरा बुध माफक ॥७९॥

बराबर मोहोल के गिरद, बीच बीच पौरी द्वार । पौरी के तरफ सामनी, मोहोल दरवाजे चार ॥८०॥

मोहोल के चारों खूंने, सोले सोले हवेली । जमे जो चौसठ कही, तिन द्वार द्वार एक गली ॥८१॥

ओगन-पचास चौपुड़े, ताके कहूं मंदिर । हर एक के एक सौ चौबीस, जमे छे हजार छेहत्तर ॥८२॥

चौक अठाईस त्रिपुड़े, हर एक के एक सौ दोए । अठाईस सै छप्पन, जमें मंदिरन को सोए ॥८३॥

चौक चार खूंने के दोपुड़े, हर एक के ओनासी मंदर । तीन सै सोले एह जमें, लगते दिवाल अंदर ॥८४॥

चौसठ दरम्यान हवेलियां, सो हिसाब कहूं मंदिरन । हर एक के तैंतालीस, जमे सताईस सै बावन ॥८५॥

जमे कियो मंदिरन को, सब बारे हजार भए । दरवाजे थंभ गलियां, अब कहूं जो बाकी रहे ॥८६॥

ओगन-पचास चौपुड़े, ताके जमे कियो थंभन । एक सौ चवालीस हर एकों, जमे सात हजार छप्पन ॥८७॥

हर एक के एक सौ पंद्रा, ए जो त्रिपुड़े अठाईस । थंभ जमे बत्तीस सै, और ऊपर भए जो बीस ॥८८॥

चार खूंने चार दोपुड़े, पचासी हर एक के । जमे तीन सै चालीस, एते थंभ भए ॥८९॥

ए जो चौसठ हवेलियां, तिन हर एक के थंभ चालीस । तिनके सब जमा कहे, साठ अगले सौ पचीस ॥९०॥

जमे सब थंभन को, एक सौ तेरे हजार । छेहत्तर तिनके ऊपर, एते भए सुमार ॥९१॥

ओगन-पचास चौपुड़े, तिन गली गिनों यों कर । हर एक की चौबीस कही, जमे अग्यारे सै छेहत्तर ॥९२॥

चौक त्रिपुड़े अठाईस, गली हर एक की अठार । तिनकी ए जमे भई, पांच सै ऊपर चार ॥९३॥

चौक चार खूंने के दोपुड़े, गली बारे हर एक । अड़तालीस ए जमे, ए जो गली दिवालों देख ॥९४॥

और जो चौसठ हवेलियां, एक एक गली गिरदवाए । एक एक द्वार दो दो पौरी, इन बिध ए सोभाए ॥९५॥

जमे सब गलियन को, सत्रह सै बानबे । आठों जाम देखिए, ज्यों रूह याही में रहे ॥९६॥

बड़े दरवाजे चौक के, एक सौ चवालीस । तैंतीस सै बारे जमे, हर द्वार पौरी तेईस ॥९७॥

यामें बत्तीस द्वार बाहेर के, एक सौ बारे अंदर । तैंतीस सै बारे जमे, यामें आओ साथ सुंदर ॥९८॥

चौखूंनी चौसठ बाखरे, इनों बीच बीच दरम्यान । दो दो पौरी तिनकी, याको रूहें जानें बयान ॥९९॥

मंदिरों माहें खिड़कियां, बाहेर दिवालों के । चारों खूंने गुरज से, तित दो दो झरोखे ॥१००॥

भोम पांचमी मध की, इत पौढ़त हैं रात । स्याम स्यामाजी साथ सब, जोलों होए प्रभात ॥१०१॥

ए तो मन्दिर कहे मध के, गिरद मन्दिरों हार । नेक नेक कही अंदर की, और कई विध मोहोल किनार ॥१०२॥

भोम छठी सुखपाल

घरों आए पीछे सबन के, छठी भोम सुखपाल । बने बिराजे मोहोल में, अति बड़ी पड़साल ॥१०३॥

भोम छठी बड़ी जाएगा, है बैठक इत विस्तार । बीच सिंघासन कई विध के, और झरोखे किनार ॥१०४॥

जुदी जुदी जुगतों जाएगा, बहु विध सिंघासन । छोटे बड़े कई माफक, कई छत्र मनी रतन ॥१०५॥

सुख अलेखे देत हैं, चारों तरफों झरोखे। ए कायम सुख कैसे कहूं, देत दायम हक जे ॥१०६॥

सुख देवें जब अंदर, तब ए बातें मीठी बयान । रंग रस करें रूहन सों, कोई ना सुख इन समान ॥१०७॥

कई चौक कई गलियां, कई हवेलियां अनेक । देख देख के देखिए, जानों एही विध विसेक ॥१०८॥

बीच तरफ या गिरदवाए, किन विध कहूं मोहोलन । एह अर्स की रोसनी, क्यों कहे जुबां इन ॥१०९॥

अनेक विध हैं अर्स में, केती विध कहूं जुबान । कहया न जाए एक नकस, मुख कहा करे बयान ॥११०॥

झरोखे इन भोम के, बने बराबर हर हार । खूबी नूर रोसनी, क्यों कहूं सोभा अपार ॥१११॥

तेज तेज सों लरत हैं, जहूर जहूर सों जंग । केते कहूं रंग रंग सों, तरंग संग तरंग ॥११२॥

भोम सातमी हिंडोले

कहा कहूं भोम सातमी, मध्य मोहोल अनेक । कई विध गलियां हवेलियां, एक दूजी पे नेक ॥११३॥

कई मोहोल कई मालिए, सोई झरोखे सुन्दर । द्वार बार सीढ़ी खिड़कियां, अति सोभा लेत मन्दिर ॥११४॥

कई सुख सातमी भोम के, कई हिंडोले हजार । रूहें आप मन चाहते, अर्स आराम नहीं पार ॥११५॥

भोम सातमी किनार में, मन्दिर झरोखे जित । दोनों हारों हिंडोले, छप्पर-खटों के इत ॥११६॥

साम सामी बैठी रूहें, हेत में सब हींचत । कड़े हिंडोले कई स्वर, बहु विध बोलत ॥११७॥

गिरदवाए सब हिंडोले, जुदी जुदी जिनसों अनेक । बारे हजार बोलत, स्वर एक दूजे पे विसेक ॥११८॥

हाँसी होत है इन समें, सुन सुन स्वर खुसाल । हँस हँस के हँसत, सब संग हींचें नूरजमाल ॥११९॥

ए सुख आनन्द अति बड़ो, रंग रस बढ़त अति जोर । भूखन हाँसी कड़े हिंडोले, ए क्यों कहूं अर्स सुख सोर ॥१२०॥

अतंत सुख इन बखत को, जो कदी आवे रूह माहें । तो नींद निज अंग असल की, उड़ जावे कहूं काहें ॥१२१॥

भोम आठमी हिंडोले

इसी भांत भोम आठमी, चार चार खटछप्पर । चारों तरफों हींचत, ए सोभा कहूं क्यों कर ॥१२२॥

चारों तरफों बातें करें, मुख मुख जुदी बान । रंग रस हाँस विनोद की, पिउ सों प्रेम रसान ॥१२३॥

चार हिंडोले जुदे जुदे, झूला लेवें सब एक । एकै बेर सब फिरत हैं, फेर खेल होत विसेक ॥१२४॥

और विध बीच हवेलियों, जुदी जुदी कई जिनस । देख देख के देखिए, एक पे और सरस ॥१२५॥

मंदिर जुदे द्वार जुदे, कई चौक चबूतर । ए सनंध इन मंदिरन की, जुबां सके न बरनन कर ॥१२६॥

कोटान कोट ले जुबां, जानों बरनन करूं एक द्वार । ए बरनन तो होवहीं, जो आवे माहें सुमार ॥१२७॥

इन ठौर विलास बोहोत है, सो इन जुबां कहयो न जाए । ए लीला अर्स खावंद की, केहे केहे रूह पछताए ॥१२८॥

बल तो जुबां को है नहीं, ना कछू बुध को बल । ए जोगवाई झूठे अंग की, क्यों कहे सुख नेहेचल ॥१२९॥

जो कछू हिरदे में आवत, सो आवे नहीं जुबान । चुप किए भी ना बने, चाहें साथ सुजान ॥१३०॥

कहे रूह सुख पावत, और सुख विचारे अतंत । पर दुख पाऊं इन विध का, कछू पोहोंच न सके सिफत ॥१३१॥

चारों तरफों हिंडोले, अर्स के गिरदवाए । सब हिंडोलों हक संग, ए सुख अंग न समाए ॥१३२॥

भोम नौमी गोख (छज्जे) की बैठक

छज्जे बड़े नौमी भोम के, बोहोत बड़ो विस्तार । बैठक धनी साथ की, बाहेर की किनार ॥१३३॥

नजरों सब आवत है, इन ऊपर की बैठक । देख दूर की बातें करें, रंग रस उपजावें हक ॥१३४॥

जब बैठें जिन तरफ, तब तितहीं की जुगत । बातें करें बनाए के, नूर अपने अपनायत ॥१३५॥

जब बैठें तरफ नूर की, तब तितहीं का विस्तार । जित सिफत जिन चीज की, तिन सुख नहीं सुमार ॥१३६॥

जब बैठें तरफ पहाड़ की, तब बरनन करें अति दूर । तिन भोम के सुख को, सुमार नहीं जहूर ॥१३७॥

जब बैठें तरफ दरियाव की, घृत दूध दधी असल । कायम सुख कायम भोम के, आवें न माहें अकल ॥१३८॥

जब बैठें तरफ बड़े बन की, तब सोई सुख बरनन । पसु पंखियों के इस्क की, कई विध करें रोसन ॥१३९॥

और पहाड़ जोए जित के, कई विध की मोहोलात । ताल कुण्ड कई चादरें, इन जुबां कही न जात ॥१४०॥

या हौज या जोए के, कई विध देवें सुख । जब हक आराम देवहीं, तब सोई करें रूहें रूख ॥१४१॥

मोहोल मन्दिर जो मध्य के, सो हैं अति रोसन । थंभों बेल फूल पांखड़ी, एक पात ना होए बरनन ॥१४२॥

तो मोहोल मन्दिर की क्यों कहूं, और क्यों कर कहूं दिवाल । कई लाख खिड़की हवेलियां, कई लाखों पौरी पड़साल ॥१४३॥

बैठ बीच नासूत के, अंग नासूती जुबान । अर्स का बरनन कीजिए, सो क्यों कर होए बयान ॥१४४॥

दसमी भोम चांदनी

दसमी भोमें चांदनी, ए सोभा है अतंत । कई कदेले कुरसियां, बीच सोभा लेत तखत ॥१४५॥

कई बैठक मोहोल चांदनी, हक हादी इत आवत । साथ सब रूहन को, सुख मन चाहे देवत ॥१४६॥

क्यों कहूं इन सुपेती की, उज्जल जोत अपार । दो सै हांसों चांदनी, नाहीं रोसन नूर सुमार ॥१४७॥

ए जो गुमटियां गिरदवाए की, नगीने एक अगले सौ दोए । बारे हजार गुमटियां, सोभा लेत अति सोए ॥१४८॥

चारों तरफों चेहेबच्चे, ए सोभा अति सुंदर । जल गिरत फुहारे मोतियों, चारों चांदनी अंदर ॥१४९॥

गिरदवाए फूल चेहेबच्चे, ए सोभा जुदी जुगत । अन्तर आंखें खोल के, ए सुख देखो अतंत ॥१५०॥

सोभा जल फूलन की, गिरद चारों किनार । ए सोभा अतंत देखिए, जो कछू रूह करे विचार ॥१५१॥

बोहोत बड़ी इत बैठक, विध विध बेसुमार । रात उज्जल अर्स चांदनी, ए सोभा अर्स अपार ॥१५२॥

जब हक हादी बीच बैठत, ले रूहें बारे हजार । नंग जवेर इन जिमी के, गिरद बैठत साज सिनगार ॥१५३॥

राज स्यामाजी बीच में, बैठें सिंघासन ऊपर । ए तखत हक अर्स का, ए सिफत करूं क्यों कर ॥१५४॥

कबूं रूहें निकट, बैठें मिलावा कर । हाँसी रमूज सनमुख, पिएं प्याले भर भर ॥१५५॥

कई विध की इत बैठक, जुदी जुदी जिनस । चारों तरफों अर्स के, देखी और पे और सरस ॥१५६॥

बड़ा मोहोल चौक चांदनी, चांद पूरन रहया छिटक । रात बीच सिर आवत, जब कबूं बैठे इत हक ॥१५७॥

अर्स आए लग्या आकासें, उठ्या जोत अपनी ले । चांद सितारे अंबर, आए मुकाबिल अर्स के ॥१५८॥

चारों तरफों देखिए, रूहें बारे हजार । जिमी अंबर में रोसनी, उठें किरनें नूर अंबार ॥१५९॥

ऊपर चांदनी बैठक, देखिए नूर द्वार । जोत नूर दोऊ सनमुख, अम्बर न माए झलकार ॥१६०॥

देखों तरफ पुखराज की, या देखों तरफ ताल । या जोत मानिक देखिए, होए रही अम्बर जिमी सब लाल ॥१६१॥

क्यों कहूं रोसनी चांद की, क्यों कहूं रोसनी हक । क्यों कहूं रोसनी समूह की, जुबां रही इत थक ॥१६२॥

केहे केहे जुबां इत क्या कहे, तेज जोत रोसन नूर । सो तो इन जिमी जरे की, आकास न माए जहूर ॥१६३॥

ताथें महामत कहे ए मोमिनों, क्यों कहे जुबां इन देह । रूहअल्ला खोले अन्तर, लीजो लज्जत सब एह ॥१६४॥

॥ प्रकरण ॥३१॥ चौपाई ॥१७०२॥

इसी सन्दर्भ में देखें-