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परिकरमा - प्रकरण ३२

बाब अर्स अजीम का मता जाहेर किया याने एक जवेर का अर्स

गैब बातें बका अर्स की, कहूं सुनी न एते दिन । हम आए अर्स अजीम से, करें जाहेर हक वतन ॥१॥

दुनियां चौदे तबक की, सब दौड़ी बुध माफक । सुरिया को उलंघ के, किन पाया न बका हक ॥२॥

पढ़ पढ़ वेद कतेब को, नाम धरे आलम । एती खबर किन ना परी, कहां साहेब कौन हम ॥३॥

ऊपर तले माहें बाहेर, ए जो कादर की कुदरत । सो कादर काहू न पाइया, जिनके हुकमें ए होवत ॥४॥

ए गुझ भेद जो गैब का, पाया न चौदे तबक । कथ कथ सब खाली गए, पर छूटी न काहू सक ॥५॥

ए तले ला मकान के, चार चीजें जिमी आसमान । ज्यों कबूतर खेल के, आखिर फना निदान ॥६॥

मोहे मेहेर करी रूहअल्ला ने, कुन्जी अर्स की ल्याए । अर्स बका पट खोल के, इलम दिया समझाए ॥७॥

गिरो उतरी लैलतकदर में, कह्या तिनमें का है तूं । खोल दे पट अर्स का, ज्यों आए मिले तुझको ॥८॥

जो अरवाहें अर्स की, सो आए मिलेंगी तुझ । तुझ अन्दर मैं आइया, ए केहे फुरमाया मुझ ॥९॥

किन कायम अर्स न पाइया, ए गुझ रही थी बात । अब तू उमत जगाए अर्स की, बीच बका हक जात ॥१०॥

और करी मेहेर महंमदें, अन्दर बैठे आए । कई विध करी बका रोसनी, सो इन जुबां कही न जाए ॥११॥

चौदे तबक कर कायम, भिस्त द्वार दीजो खोल । मैं साहेब के हुकम से, अव्वल किया है कौल ॥१२॥

सो ढूंढ़ों प्यारी उमत, मेरे हक जात निसबत । जो रूहें भूली वतन, ताए देऊँ हक बका न्यामत ॥१३॥

निमूना इन जिमी का, हक को दिया न जाए । पर कछुक तो कहे बिना, गैब की क्यों समझाए ॥१४॥

ज्यों जड़ाव एक मोहोल है, जवेर जड़े कई संग । कुंदन माहें सोभित, नए नए अनेक रंग ॥१५॥

ए सब एक जवेर का अर्स है, तामें कई तरंग उठत । जुदे जुदे रंगों झरोखे, अनेक भांत झलकत ॥१६॥

अनेक रंग थंभन में, अनेक सीढ़ियां पड़साल । कई रंग भोम चबूतरे, कई रंग द्वार दिवाल ॥१७॥

इन विध समझो अर्स को, एक जवेर कई रंग । द्वार दिवालें पड़सालें, और थंभों उठत तरंग ॥१८॥

जित जैसा रंग चाहिए, तहां तैसा ही देखत । ना समारे नए किन, ना पुराने पेखत ॥१९॥

जवेर जुदे जुदे सोभित, अनेक रंग अपार । एक जवेर को अर्स हैं, ज्यों रंग रस बन विचार ॥२०॥

बन सबे एक रस हैं, कई रंग बिरिख अनेक । रंग रस स्वाद जुदे जुदे, कहां लो कहूं विवेक ॥२१॥

हर जातें कई बिरिख हैं, रंग रस निरमल नेक । स्वाद अलेखे अपार हैं, पर असल बन रस एक ॥२२॥

गिरद अर्स के देखिया, जहां लो नजर पोहोंचत । एकल छत्री बन की, छेदर ना गेहेरा कित ॥२३॥

ज्यों जड़ाव एक चंद्रवा, जवेर जड़े कई बिध । बन बेली कटाव कई, सोभित सोने की सनंध ॥२४॥

अनेक रंगों के जवेर, जो जिन संग सोभित । तिन ठौर बने तिन मिसलें, कई हुए कटाव जुगत ॥२५॥

एक जिमी जरे की रोसनी, मावत नहीं अकास । तिन जिमी के जवेर को, क्यों कर कहूं प्रकास ॥२६॥

एह चंद्रवा बन का, नूर रोसन गिरदवाए । तले जिमी अति रोसनी, ऊपर बन सोभाए ॥२७॥

जरे जरा सब नूर में, छज्जे दिवाल सब नूर । जिमी बन बीच आकास में, मावत नहीं जहूर ॥२८॥

सोभा जानवर अर्स के, ताके एक बाल की रोसन । मावत नहीं आकास में, जुबां क्या करे सिफत इन ॥२९॥

सिफत न होए एक बाल की, तो क्यों होए सिफत वजूद । ए केहेनी में न आवत, तो क्यों कहे जुबां नाबूद ॥३०॥

एक बाल ना गिरे पसुअन का, ना खिरे पंखी का पर । पात पुराना ना होवहीं, अर्स जंगल या जानवर ॥३१॥

इन जिमी के जानवर, ताए देखत हक नजर । ए दिल में तो आवहीं, जो रूह देखे विचार कर ॥३२॥

पार ना खूबी खुसबोए को, पार ना पसु पंखियन । मीठी बानी अति बोलत, अंग सोभित चित्रामन ॥३३॥

सोभा क्यों होए रंग सुरंग की, नैन श्रवन चोंच बान । सुख देवें कई भांत सों, कई बोलें मीठी जुबान ॥३४॥

एक हक को हंसावें खेलके, कई हंसावें मुख बोल । कोई नाहीं निमूना इनका, जो दीजे इनकी तौल ॥३५॥

सोभा लेत जिमी जंगल, माहें टोले कई खेलत । ए खूब खेलौने हक के, ए बुजरक इन निसबत ॥३६॥

कई पिउ पिउ कर पुकारहीं, कई करें खसम खसम । कई धनी धनी मुख बोलहीं, कई कहें भी तुम भी तुम ॥३७॥

इन विध मैं केते कहूं, बोलें जुबां अनेक । पर सबों एही जिकर, कहें मुख वाहेदत एक ॥३८॥

घास करत है सिजदा, करें सिजदा दरखत । तो क्यों न करें चेतन, यों फुरमान फुरमावत ॥३९॥

घास पसु सब नूर के, जिमी जंगल सब नूर । आसमान सितारे नूर के, क्यों कहूं नूर चांद सूर ॥४०॥

आगूं जरे घास अर्स के, ख्वाब हैवान इन्सान । क्यों दीजे निमूना झूठ का, कायम जिमी जरा रेहेमान ॥४१॥

इत जरा छोटा बड़ा नूर का, या हौज जोए मोहोलात । अर्स जरे की इन जुबां, सिफत न कही जात ॥४२॥

आगूं द्वार अर्स के, चौक बन्या चबूतर । कबूं हक तखत बैठहीं, आगे खेलें जानवर ॥४३॥

कई कदेलें कुरसियां, ऊपर रूहें बैठत । सुमार नहीं पसु पंखियों, कई विध खेल करत ॥४४॥

इन दरगाह की रूहन सों, दोस्ती हक की हमेसगी । इन जुबां सों सिफत, क्यों होवे इनकी ॥४५॥

जो नजीकी निस दिन, हक हादी हमेस । क्यों कहूं अर्स अरवाहों को, ए जो कायम खुदाई खेस ॥४६॥

सोभा जाए न कही रूहन की, जो बड़ी रूह के अंग नूर । कहा कहे खूबी इन जुबां, जो असल जात अंकूर ॥४७॥

अब देखो अंतर विचार के, कैसा सुन्दर सरूप रूहन । किन विध खूबी रूहन की, क्यों वस्तर क्यों भूखन ॥४८॥

देखो कौन सरूप बड़ी रूह का, आपन रूहें जाको अंग । हक प्याले पिलावत, बैठाए के अपने संग ॥४९॥

कायम हमेसा बुजरकी, सिरदार इन रूहन । ए जुबां झूठे वजूद की, क्यों करे सिफत इन ॥५०॥

ए सिरदार कदीम रूहन के, हक जात का नूर । तिन नूर को नूर सबे रूहें, ए वाहेदत एकै जहूर ॥५१॥

अर्स जरे की सिफत को, पोहोंचत नहीं जुबान । तो अर्स रूहें सिरदार की, क्यों होवे सिफत बयान ॥५२॥

इन अर्स का खावंद, ताकी सिफत होवे क्यों कर । एह जुबां क्यों केहेवहीं, इन अकल की फिकर ॥५३॥

सूरत हक के जात की, सिफत करूं मुख किन । जुबां न पोहोंचे जरे लग, तो कैसा सब्द कहूं इन ॥५४॥

सिफत हक सूरत की, क्योंए न आवे जुबांए । कछू लज्जत तो पाइए, जो आवे फैल हाल माहें ॥५५॥

कैसा सरूप है हक का, जो इन सबों का खावंद । क्यों देऊं निमूना इनका, इन जुबां मत मंद ॥५६॥

सोभा सुन्दरता जात की, एक हक जात सूरत । अंतर आंखें खोल तूं, अपनी रूह की इत ॥५७॥

रहे ठाढ़ी इन जिमी पर, देख अपना खसम । देख मिलावा अर्स का, और देख अपनी रसम ॥५८॥

देख तले तरफ जिमीय के, उज्जल जोत अपार । बन रोसन भरया आसमान लों, किरना नहीं सुमार ॥५९॥

ऊपर देख तरफ बन के, फल फूल बेली रंग रस । कहूं जड़ाव ज्यों चंद्रवा, कई कटाव कई नकस ॥६०॥

चारों तरफों चंद्रवा, अर्स के यों कर । दौड़ दौड़ के देखिए, आवत यों ही नजर ॥६१॥

फेर फेर बन को देखिए, भांत चन्द्रवा जे । केहे केहे फेर पछतात हों, ऐसे झूठे निमूना दे ॥६२॥

एक जरा कायम देखिए, उड़े चौदे तबक वजूद । सिफत अर्स की क्यों करे, ए जुबां जो नाबूद ॥६३॥

कहे सूरज सोना जवेर, ख्वाब में बुजरक ए । क्यों पोहोंचे निमूना झूठ का, अर्स कायम हक के ॥६४॥

ए मैं देख दुख पावत, दिल में विचारत यों । जो कदी यों जान बोलों नहीं, तो कहे बिना बने क्यों ॥६५॥

इन कहे होत है रोसनी, रूह पावत है सुख । और इस्क अंग उपजे, हक सों होत सनमुख ॥६६॥

उमंग अंग में रोसनी, अलेखे उपजत । इन कहे अरवाहें अर्स की, अनेक सुख पावत ॥६७॥

जित जित देखों नजरों, हक जिमी अर्स वतन । कहे सेती कई कोट गुना, आवत अन्दर रोसन ॥६८॥

कई कोट गुना बढ़त है, बड़ा नफा रूह जान । बढ़त बढ़त हक अर्स की, आवत इस्क पेहेचान ॥६९॥

इन कहे से ऐसा होत है, पीछे आवत फैल हाल । तो ख्वाब में कायम अर्स का, सुख लीजे नूरजमाल ॥७०॥

ए मेहेर देखो मेहेबूब की, बड़ी रूह भेजी इत । इन जिमी रूहें जगाए के, कर दई ए निसबत ॥७१॥

ए हक का दिया पाइए, कौल फैल या हाल । ए साहेब कायम देवहीं, केहेनी अर्स कमाल ॥७२॥

जब केहेनी आई अंग में, तब फैल को नाहीं बेर । फैल आए हाल आइया, लेत कायम रोसनी घेर ॥७३॥

तले से ऊपर चढ़त है, जिमी की रोसन । और जिमी पर उतरत है, ऊपर का नूर बन ॥७४॥

देखों जहां जहां दौड़ के, इसी भांत बन छांहें । जिमी बन नूर देख के, सुख उपजत रूह माहें ॥७५॥

ए बाग गिरद अर्स के, और एही गिरदवाए जोए । एही बाग गिरद हौज के, सब नूर पूर खुसबोए ॥७६॥

जिमी भी सब एक रस, तिनमें कई जुगत । जित जैसा रंग चाहिए, तित तैसा ही देखत ॥७७॥

रेत किनारे जोए पर, और रेत जिमी पर जेती । ताल पाल कई मोहोलों पर, कहूं जल खूबी केती ॥७८॥

पहाड़ जवेर केते कहूं, तले बीच ऊपर । कई जवेर कई रंग के, क्यों कहूं सोभा सुन्दर ॥७९॥

एही जिमी नूरजलाल की, जिन जानो बाग और । याही जवेर को मन्दिर, ताथें एक रस सब ठौर ॥८०॥

ना समारया अर्स को, ना किए नूर मन्दिर । ना किए हौज जोए को, ना पर्वत बन जानवर ॥८१॥

ना समारी जिमी जल को, ना आकास चांद सूर । वाओ तेज सब हक के, हैं कायम हमेसा नूर ॥८२॥

है नूर सब नूरजमाल को, फरिस्ते नूर सिफात । रूहें नूर बड़ीरूह को, ए सब मिल एक हक जात ॥८३॥

दूसरा इत कोई है नहीं, एकै नूरजमाल । ए सब में हक नूर है, याही कौल फैल हाल ॥८४॥

महामत कहे ए मोमिनों, जो अरवा अर्स अजीम । इस्क प्याले लीजियो, भर भर नूर हलीम ॥८५॥

॥ प्रकरण ॥३२॥ चौपाई ॥१७८७॥

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