परिकरमा - प्रकरण ३३ | Parikarmaa prakaran 33
खिलवत में हाँसी फरामोसी दई
अब देखो अन्दर अर्स के, रूहें बैठी बारे हजार । उतरी लैलत-कदर में, खेल देखन तीन तकरार ॥१॥
वास्ते हाँसी के मने किए, किया हाँसी को दिल हुकम । तो हाँसी को दिल उपज्या, मांग्या हाँसी को खेल खसम ॥२॥
ए देखो भोम तले की, बैठा हक मिलावा जित । आप अर्स में अरवाहों को, खेल मेहेर का दिखावत ॥३॥
साहेब बैठे तखत पर, खेलावत कर प्यार । ऐसी हाँसी फरामोसीय की, कबूं देखी ना बेसुमार ॥४॥
उठके गिर गिर पड़सी, फरामोसी हाँसी के खेल । ए जो तीनों तकरार, हकें देखाए माहें लैल ॥५॥
क्यों कहूं सुख रूहन के, हकें यों कहया उतरते । जो केहेता हों तुमको, जिन भूलो खेल में ए ॥६॥
क्यों कहूँ सुख रूहन के, हक इन विध हांसी करत । आप देत भुलाएके, आपै जगावत ॥७॥
क्यों कहूं सुख रूहन के, हकें कौल से किए हुसियार । दिल नींद दे ऊपर जगावत, करने हाँसी अपार ॥८॥
खेल किया हांसी वास्ते, वास्ते हाँसी किए फरामोस । वास्ते हाँसी ऊपर पुकारहीं, वास्ते हाँसी न आवत होस ॥९॥
आप फरामोसी ऐसी दई, जो भूलियां आप हक घर । ऊपर कई विध केहे केहे थके, पर जाग न सके क्योंए कर ॥१०॥
ऐसी दारू ल्याए रूहअल्ला, जासों मुरदा जीवता होए । पर फरामोसी इन हाँसी की, उठ न सके कोए ॥११॥
इन विध हाँसी न जाए कही, कई कोट विधों जगावत । कई दारू उपाय कर कर थके, दिल ठौर क्योंए न आवत ॥१२॥
हाँसी होसी अति बड़ी, ए खेल किया वास्ते इन । औलिया लिल्ला दोस्त कहावहीं, पर बल न चल्या इत किन ॥१३॥
हाँसी इसही बात की, फेर फेर होसी ए । उठ उठ गिर गिर पड़सी, बखत जागने के ॥१४॥
आपन को फरामोस की, नींद आई निहायत । अर्स अजीम में कूदते, कछू चल्या न हकसों इत ॥१५॥
अरवाहें हमेसा अर्स की, कहावें खास उमत । पर कछू बल चल्या नहीं, ना तो रखते हक निसबत ॥१६॥
हँसते हँसते उठसी, ऐसी हुई न होसी कब । हक हँससी आपन पर, ऐसी हुई जो हाँसी अब ॥१७॥
कई हाँसी खुसाली अर्स में, करी मिनो मिने रूहन । पर ए हाँसी ऐसी होएसी, जो हुई नहीं कोई दिन ॥१८॥
ऐते दिन हाँसी खुसाली, करी रूहों दिल चाही जे । पर ए हाँसी हक दिल चाही, ताथे बड़ी हाँसी हुई ए ॥१९॥
रूह अपनी इन मेले से, जुदी करो जिन खिन । न्यारी निमख न होए सके, जो होए अरवा मोमिन ॥२०॥
इन ठौर ए मिलावा, जिन जुदी जाने आप । इतहीं तेरी कयामत, याही ठौर मिलाप ॥२१॥
हक हादी इतहीं, इतहीं असलू तन । खोल आंखें इत रूह की, एह तेरा बका वतन ॥२२॥
ए ठौर नजर में लीजिए, लगने न दीजे पल । कौल फैल या हाल सों, देख हक हाँसी असल ॥२३॥
इत देख फेर फेर तूं, अपनी रूह की आंखां खोल । कर कुरबानी आपको, आए पोहोंच्या कयामत कौल ॥२४॥
ए हाँसी करी हक ने, फरामोसी की दे। क्यों न विचारें आपन, ए तरंग इस्क के ॥२५॥
याथें देखो हक इस्क, हेत प्रीत मेहेरबान । ए हकें करी ऐसी हांसियां, खोल आंखें दिल आन ॥२६॥
ऐसा हेत देख्या हक का, तो भी लगे न कलेजे घाए । ऐसी रब रमूजें सुन के, हाए हाए उड़त नहीं अरवाए ॥२७॥
ए सुख जरा याद न आवहीं, याद न एक एहेसान । हक देत याद कई विध सों, हाए हाए ऐसी लगी नींद निदान ॥२८॥
ना तो ऐसी मेहेर इस्क सों, हक करत आपन सों । जगाए के पेहेचान सब दई, हाए हाए आवत ना होस मों ॥२९॥
महामत कहे ए मोमिनों, ए देखो हक की मेहेर । जो एक एहेसान हक का लीजिए, तो चौदे तबक लगे जेहेर ॥३०॥
॥ प्रकरण ॥३३॥ चौपाई ॥१८१७॥
