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परिकरमा - प्रकरण ३४ | Parikarmaa prakaran 34

परिकरमा नजीक अर्स के

बेवरा अगली भोम का, मेहेराव और झरोखे । खूबी क्यों कहूं दिवाल की, सोभा लेत इत ए ॥१॥

गिरदवाए मेहेराव झरोखे, फेर देखिए तरफ चार । इन मुख खूबी तो कहूं, जो होवे कहूं सुमार ॥२॥

बेसुमार जो फेर फेर कहिए, तो आवत नहीं हिरदे । तो सब्द में ल्यावत, ज्यों दिल आवे मोमिनों के ॥३॥

पार ना कहूं अर्स का, सो कह्या बीच दिल मोमिन । ए विचार कर देखिए बका, सो ल्‍याए बीच दिल इन ॥४॥

हिसाब बीच ल्याए बिना, हक आवें नहीं दिल माहें । हक देत लदुन्नी मेहेर कर, हक अर्स आवे बीच जुबांए ॥५॥

दोऊ तरफ बड़े द्वार के, ए जो हांसें कही पचास । सामी चौक चांदनी, क्यों कहूं खूबी खास ॥६॥

देहेलान ऊपर द्वार के, जो ऊपर चबूतरे दोए । चार चार मंदिर दोऊ तरफ के, ऊपर लग चांदनी सोए ॥७॥

हांस पचास अगली दिवालें, दोऊ तरफों पचीस पचीस । दो मेहेराव बीच झरोखे, हर हांसें मंदिर तीस ॥८॥

हर मंदिर एक झरोखा, याकी सोभा किन मुख होए । आए लग्या बन दिवालें, देत मीठी खुसबोए ॥९॥

दोए भोम कही जो बन की, खिड़की मोहोल तिन बन । भोम दूजी मोहोल झरोखे, इत बसत पसु पंखियन ॥१०॥

उतर झरोखों से जाइए, दूजी भोम बन माहें । बन सोभे पसु पंखियों, कई हक जस गावें जुबांए ॥११॥

चल जाइए सातों घाट लग, खूबी देख होइए खुसाल । कई विध हक जिकर करें, पसु पंखी अपने हाल ॥१२॥

इस्क जुबां बानी गावहीं, खूब सोभित अति नैन । मगन होत हक सिफत में, मुख मीठी बानी बैन ॥१३॥

किन बिध कहूं पसु पंखियों, परों पर चित्रामन । मुख बोलें हक के हाल में, तिन अंबर भरे रोसन ॥१४॥

जैसी सोभा पसु पंखियों, सोभा तैसी भोम बीच बन । सो सोभा मीठी हक जिकर, यों हाल खुसाल रात दिन ॥१५॥

सोभा जाए ना कही बन पंखियों, और जिकर करत हैं जे । तो हक हादी रूहें मिलावा, कहूं किन बिध सोभा ए ॥१६॥

इतथें चलके जाइए, ऊपर दोऊ पुलन । ए खूबी मैं क्यों कहूं, जो नूरजमाल मोहोलन ॥१७॥

सात घाट कहे बीच में, माहें पसु पंखी खेलत । तले भोम या ऊपर, बन में केलि करत ॥१८॥

केल लिबोई अनार, बांईं तरफ खूबी देत । जांबू नारंगी बट दाहिने, नूर सनमुख सोभा लेत ॥१९॥

दोए पुल सात घाट बीच में, पाट घाट बिराजत । बीच दोऊ दरबार के, बन अंबर जोत धरत ॥२०॥

जो घड़नाले पुल तले, दस दस दोऊ के । दस नेहेरें चलें दोरी बंध, बड़ी अचरज खूबी ए ॥२१॥

दोऊ पुल देख के आइए, निकुंज मंदिरों पर । इत देख देख के देखिए, खूबी जुबां कहे क्यों कर ॥२२॥

आगूं इतथें हिंडोले, जित चौकी बट पीपल । चार चौकी बट हिंडोलें, इतथें ना सकिए निकल ॥२३॥

दूजी भोम जो चौकियों, दौड़ जाइए तितथें । बीच मेहेरावों कूद के, उतर आइए अर्स में ॥२४॥

पेहेली भोम के झरोखे, सो दूजी भोम लग बन । ए झरोखे के बराबर, भोम दूजी हिंडोलन ॥२५॥

पेहेली भोम फूल बाग लों, दिवाल देखिए दिल धर । फिरते मेहेराव झरोखे, बन आवे अंदर थे नजर ॥२६॥

फेर देखिए फूल बाग लों, हर मंदिर मेहेराव दोए । बीच बीच उचेरा झरोखा, कहूं किन मुख सोभा सोए ॥२७॥

भोम तले बन हिंडोले, अति सोभित इतथें । मेहेराव झरोखे सुन्दर, जब बैठ देखिए बन में ॥२८॥

कई जिकर करें जानवर, मीठे स्वर बयान । इस्क खूबी अति बड़ी, सिफत बका सुभान ॥२९॥

इत क्यों कहूं खूबी हिंडोले, जित हींचें रूहें हादी हक । बयान न होए एक जंजीर, जो उमर जाए मुतलक ॥३०॥

ए भोम तले की दिवाल में, मेहेराव आवे न सिफत मों । देख देख के देखिए, फेर चलिए फूल बाग लों ॥३१॥

दूसरी भोम जो अर्स की, सो तीसरी भोम लग बन । जाइए झरोखे से हिंडोले, ए सोभा कहूं मुख किन ॥३२॥

चौथी भोम के बन से, जाइए तीसरी भोम अर्स । ए भोम झरोखे बराबर, ए बन मोहोल अरस-परस ॥३३॥

पांचमी भोम बन चांदनी, अति खूबी लेत इत ए । चल जाइए चौथी भोम अर्स, मोहोल देखो बैठ झरोखे ॥३४॥

बट पीपल की चौकियां, एक घाट लग हद । लंबी चांदनी फूल बाग लों, ए सोभा न आवे माहें सब्द ॥३५॥

हर हांस तीस मंदिर, हर मंदिर झरोखा एक । दोऊ तरफ दो मेहेराव, मन्दिरों खूबी विसेक ॥३६॥

हर हांस साठ मेहेराव, इनों बीच बीच झरोखा । भोम तले अति रोसनी, खूबी क्यों कहूं सोभा बका ॥३७॥

इन विध हांसें फिरतियां, चारों तरफों सौ दोए । चारों तरफ का बेवरा, नेक केहेत हुकम सोए ॥३८॥

एक तरफ आगूं द्वारने, तरफ दूजी चौकी हिंडोले । फूल बाग तरफ तीसरी, चौथी चबूतरे चेहेबच्चे ॥३९॥

चार चार नेहेरें जंजीर ज्यों, मिल मिल फिरें गिरदवाए । बीच बीच सोभित बगीचों, अचरज एह देखाए ॥४०॥

बीच झरोखें कारंजे, चारों तरफों चार चलत । ए चारों बीच चेहेबच्चे, एकै ठौर पड़त ॥४१॥

कहूं कारंज एक बीच में, एक ठौर उछलत । सो चारों फुहारे होए के, चारों खूंटों गिरत ॥४२॥

सो ए फूलबाग की, सोभा इन मुख कही न जाए । नूर जोत फूल पातन की, जानो अंबर में न समाए ॥४३॥

चार खूंट चारों हांसों, कई जिनसों फूल देखाए । कई जुगतें पात सोभित, सब खुसबोए रही भराए ॥४४॥

फूल कहूं कई रंग के, गिनती न आवे सुमार । ना गिनती रंग पात की, खूबी क्यों कहूं इनों किनार ॥४५॥

जानो के गंज नूर को, भराए रहयो आकास । जब नीके नजर दे देखिए, तब कछू पाइए खूबी खास ॥४६॥

विवेक कर जब देखिए, तब पाइए फूल पांखड़ीं पात । कई जिनसें जुगतें कांगरी, नूर आगे देखी न जात ॥४७॥

कई जिनस जुगत रंग फूल में, कई जिनस जुगत पात रंग । नूर बाग खासी हक हादी रूहें, खूबी क्यों कहूं जुबां इन अंग ॥४८॥

ए बाग चौड़ा लंबा सोहना, माहें जुदी जुदी कई जिनस । कई एक रंगों बगीचे, जानों एक से और सरस ॥४९॥

एक एक दरखत में कई रंग, यों कई बगीचे विवेक । कई बगीचे चेहेबच्चे, जानों जो देखों सोई विसेक ॥५०॥

नेहेरें चलत कई बीच में, चेहेबच्चे बगीचों । कई बैठकें कारंजों, जल उछलत फुहारों ॥५१॥

कई मोहोल मन्दिरों चबूतरे, इत बने हैं बनके । इत हक हादी रूहें बैठक, अति ठौर खुसाली ए ॥५२॥

चारों खूटों बड़े चार चेहेबच्चे, तिन हर एक में कई कारंज । सब नेहेरें तहां से चलें, वह चेहेबच्चों भरया जल गंज ॥५३॥

पांच पांच हांसों बगीचा, भए पचास हांसों बाग दस । ए सोभा इन जुगतें, याको क्यों कहूं रूप रंग रस ॥५४॥

ए बड़ा बाग ऊपर चबूतरे, तापर बन की दिवाल । ए नूर फूलन का क्यों कहूं, सेत स्याम नीले पीले लाल ॥५५॥

तले तीन तरफ मेहेराव, ए जो कही दिवाल गिरदवाए । ऊपर दिवालें बनकी, ए सिफत कही न जाए ॥५६॥

इन सौ बगीचों चेहेबच्चे, जुदी जुदी जिनस जुगत । ए बाग नेहेरें देखते, नैना क्योंए ना होंए तृपित ॥५७॥

जो बाग तले चबूतरा, सो छाया बीच दरखत । बीच अर्स के उसी जुबां, हक आगूं होए सिफत ॥५८॥

ए बिरिख जो अर्स भोम के, सो अर्सै के हैं नंग । ए जोत कहूं क्यों इन जुबां, और किन विध कहूं तरंग ॥५९॥

जिमी तले जो दरखत, एह जिनस कछू और । खूबी फल फूल पात की, किन मुख कहूं ए ठौर ॥६०॥

रंग जोत खूबी खुसबोए की, क्यों कर कहूं ए बन । फल फूल पात तले जिमी, जानों सूर हुए रोसन ॥६१॥

कई नेहेरें कई चेहेबच्चे, कई कारंजें जल उछलत । कई मोहोल माहें बैठकें, हक हादी रूहें खेलत ॥६२॥

तले बाग जो दरखत, बड़ा बन गिरदवाए । चारों खूंटों बराबर, खूबी जरे की कही न जाए ॥६३॥

तो क्यों कहूं सारे बाग की, जिन की खूबी कही ए । ऐसा जरा कहया जिनका, तो क्यों कहूं ठौर हक के ॥६४॥

जेता बाग ऊपर, तेता तले विस्तार । चारों खूंटों बराबर, ए सिफत न आवे सुमार ॥६५॥

अति खूबी बाग ऊपर, तले तिनसे अधिकाए । वह खूबी इन मुख से, मोपे कही न जाए ॥६६॥

बाग पांच पांच हांसके, हैं दस बाग हांस पचास । यों मोहोलातें सौ बाग की, कहूं किन विध खूबी खास ॥६७॥

चारों तरफों चलती, नेहेरें बीच बाग के । बीच मेहेरावों से देखिए, सोभित बिरिखों तले ॥६८॥

पचास हांस तरफ बाग के, हर हांसें तीस मन्दिर । मेहेराव बीच झरोखा, तीन तीन सबों अन्दर ॥६९॥

इन हांस चेहेबच्चे से चलिए, दूसरे पोहोंचिए जाए । मोहोल मेहेरावों देखिए, बाग इतथें और सोभाए ॥७०॥

एक एक मन्दिर में आएके, फेर देखिए गिरदवाए । इन विध रूहें देखिए, उलट अंग न समाए ॥७१॥

ए बाग मेहेराव देखके, आए बड़े चेहेबच्चे । आया आगूं लाल चबूतरा, खूबी किन विध कहूं मैं ए ॥७२॥

चालीस हांसों चबूतरा, बड़े मेहेराव इन पर । देख देख के देखिए, खूबी क्यों कहूं इन चबूतर ॥७३॥

तीन हजार छे सै बने, मेहेराव बराबर । सोभा हांसों चालीस, इन जुबां कहूं क्यों कर ॥७४॥

ए ठौर सोभा अति बड़ी, और बन विस्तार । ए ठौर बैठक बड़ी, पसु पंखी खेलें अपार ॥७५॥

अति खूबी आगूं कठेड़े, हांसो चालीसों सोभित । देखत अर्स आंखन सों, खूबी उत जुबां बोलत ॥७६॥

जुदी जुदी जिनसों सोभित, जुदी जुदी जिनसों फल फूल । पात रंग जुदी जिनसों, देख देख होइए सनकूल ॥७७॥

हर मन्दिर माहें आए के, चढ़िए हर झरोखे । जब आइए हर झरोखे, तब खूबी देखो बाग ए ॥७८॥

बड़े मेहेराव बराबर, एक दूजे को लगता । हांस चालीस ऊपर चबूतरे, सोभा न आवे सब्द में बका ॥७९॥

एह भोम एह चबूतरा, लगते पेड़ दरखत । ए ठौर बरनन करते, हाए हाए छाती नाहीं फटत ॥८०॥

आगूं भोम चबूतरे, चारों तरफों चौगान । गिरदवाए परे पुखराज के, जिमी रोसन खेलें रेहेमान ॥८१॥

जिमी ऊंची नीची कहूं नहीं, बराबर एक थाल । पसु पंखी सब में खेल हीं, ए खेलौने नूर जमाल ॥८२॥

बड़ा बन ऊँचे हिंडोले, तले हाथी जात आवत । कहूँ केते बड़े जानवर, इन चौगान खेल करत ॥८३॥

बाघ केसरी चीते खेलहीं, और मोर मुरग बांदर । हर जातें जातें कई जिनसें, कहूँ कहां लग खेल जानवर ॥८४॥

हर जिनसें कई खेलत, एक एक में खेल अपार । खेलें कूदें नाचें उड़ें, गावें कई विध जुबां न सुमार ॥८५॥

इन मुख सोभा क्यों कहूं, और क्यों कहूं सोभा जिकर । सोभा पर चित्रामन, ए जुबां फना कहे क्यों कर ॥८६॥

सोभा कही न जाए दरखतों, और कही ना जाए इन भोम । जो देखो सोभा पसुअन की, करे रोसन अति एक रोम ॥८७॥

कई नाचत नट बांदर, कई बाजे बजावत । ए खेलौने हक हादीय के, केहेनी जुबां क्यों पोहोंचत ॥८८॥

चढ़ ऊँचे लेत गुलाटियां, फेर गुलाटियों उतरत । ए नट विद्या बहुविध की, क्यों कर करूं सिफत ॥८९॥

कूदत फांदत नाचत, लेत भमरियां दे पड़ताल । नई नई विद्या देख के, हक हादी रूहें होत खुसाल ॥९०॥

चढ़ कूदें कई दरखतों, पेड़ पेड़ से पेड़ ऊपर । तले जो अंत्रीख आए के, फिरत चढ़त ऊँचे उतर ॥९१॥

जंत्र बेन बजावहीं, रबाब ताल मृदंग । अमृत सारंगी झरमरी, झांझ तंबूरा चंग ॥९२॥

सरनाई भेरी नफेरी, और बाजे कई बजाए । तुरही रनसिंघा महुअर, और नगारे करनाए ॥९३॥

लेत तले से गुलाटियां, चढ़त जात आसमान । उतरें भी गुलाटियों, फेर फेर गुलाटों दे तान ॥९४॥

अंत्रीख मिने गुलाटियां, देत जात फिरत । इन विध लेत भमरियां, यों कई विध केलि करत ॥९५॥

देखो बन्दर खेल अर्स में, बड़ा देख्या अचरज ए । ए खूबी खुसाली क्यों कहूं, हक हादी आगूं होत है जे ॥९६॥

ए नट विद्या कई नाचत, बाजे दिल चाहे बजावत । ए खेल अचम्भा देख के, हादी रूहें राचत ॥९७॥

इत आगूं लाल चबूतरे, भोम क्यों कहूं बन विस्तार । खेल पसु पंखियन को, जुबां कहे जो होवे कहूं पार ॥९८॥

बाघ केसरी खेलहीं, चीते खेलें सियाहगोस । सब विद्या अपनी साधहीं, सब खेलें इस्क के जोस ॥९९॥

हर खांचें जातें जुदी जुदी, आप अपनी विद्या खेलत । गाए नाचें जिकर करें, हर भांतें रूहों रिझावत ॥१००॥

हाथी घोड़े बैल बकर, साम्हर चीतल हरन । मेढ़े पाड़े पस्वड़े, कई खेलें ऊँट अरन ॥१०१॥

चालीस हांसों की ए कही, करें आप अपना खेल । छोड़ें न हांस मरजादा, हक आगे करें सब केलि ॥१०२॥

दस हांसें बाकी रही, ताके मंदिर झरोखे । तित ढिग दो दो मेहेराव, खूबी लेत बन पर ए ॥१०३॥

एक सौ दस छेल्‍ली हार के, ए जो मोहोल भुलवनी के । एक सौ दस चारों तरफों, ए जो बारे हजार कहे ॥१०४॥

चबूतरे चेहेबच्चे लग, बीच चालीस मंदिर । चालीस चेहेबच्चे परे, अस्सी बीच तीस अंदर ॥१०५॥

तीस चेहेबच्चे ऊपर, बने जो झरोखे । चार चार द्वार हर मंदिरों, मुख क्यों कहूं सोभा ए ॥१०६॥

इत लगते जो मंदिर, हारें भुलवनी । केहे केहे मुख कहा कहे, सोभा अतंत घनी ॥१०७॥

छे हांस ऊपर दस मंदिर, हांसें पोहोंची लग पचास । एक झरोखा दो मेहेराव, ए जो फिरती खूबी खास ॥१०८॥

ए मोहोल फिरते बन ऊपर, ए जो सोभा लेत हैं इत । बन झरोखे सोभा तो कहूं, जो होए निमूना कहूं कित ॥१०९॥

ए जो घाट अनार का, आए मिल्या दिवाल । ए खूबी क्यों कहूं इन जुबां, रूह देखत बदले हाल ॥११०॥

घाट लिबोई हिंडोलों, आए मिल्या इत ए । खूबी ताड़ बन की, क्यों कहूं बल जुबां के ॥१११॥

केल बन आगूं चल्या, मधु बन मिल्या आए । इत सोभा बड़े बन की, इन अंग मुख कही न जाए ॥११२॥

और हांसें पचास जो, आगूं बड़े दरबार । सोभित झरोखे मेहेराव, आगूं चौक सोभे बन हार ॥११३॥

ए जो बड़ी कही पड़साल, ऊपर बड़े द्वार । दोऊ तरफों तले दस थंभ, एक एक रंग के चार चार ॥११४॥

सामी दस थंभ दिवाल में, करे जोत जोत सो जंग । बीस थंभ रंग रंग मुकाबिल, तिन रंग रंग कई तरंग ॥११५॥

जो थंभ आगूं द्वार ने, अति उज्जल हीरों के । दोऊ तरफों जोड़े चार थंभ, ए चारों मानिक रंग लगते ॥११६॥

तिन जोड़े भी चार थंभ, सो पीत रंग पुखराज । तिन परे चारों पाच के, दोऊ तरफों रहे बिराज ॥११७॥

चारों खूंटों थंभ नीलवी, सोभा लेत इत ए । पांच थंभों के लगते, हुए बीस दस जोड़े ॥११८॥

ए बीस थंभों का बेवरा, इनों क्यों कहूं रोसन नूर । कटाव किनारे कांगरियों, क्यों कहूं इन द्वार जहूर ॥११९॥

चार चार मेहेराव दाएं बाएं, आठ हुए तरफ दोए । सोभा आगूं बड़े द्वार के, सो इन मुख खूबी क्यों होए ॥१२०॥

दोऊ तरफ दोए चबूतरे, ए जो लगते दिवाल । तीनों तरफों कठेड़ा, क्यों देऊं इन मिसाल ॥१२१॥

कठेड़ा रंग कंचन, जानों के मीना माहें । सोभा लेत थंभ कठेड़े, ए केहे न सके जुबांए ॥१२२॥

कई रंग जवेर चबूतरों, कई दिवालें रंग नंग । ऊपर तले का नूर मिल, करत अंबर में जंग ॥१२३॥

ए अर्स नूरजमाल का, तिन अर्स बड़ा दरबार । एह जोत आकास में, मावत नहीं झलकार ॥१२४॥

आठ भोम इन ऊपर, तिन आठों भोम पड़साल । जाए पोहोंच्या लग चांदनी, ऊपर गुमटियां लाल ॥१२५॥

ए सोभा अचरज अदभुत, जानें अर्स अरवाए । इन भोम रूह सो जान हीं, जिन मोमिन कलेजे घाए ॥१२६॥

आगूं तले चौक चांदनी, उतर जाइए सीढ़ियन । आगूं दोए चबूतरे चौक के, उपर हरा लाल दोऊ बन ॥१२७॥

इत सोभा चौक चांदनी, इन मोहोलों मुजरा जानवर । इन जुबां खूबी क्यों कहूं, ए जो बन में करें जिकर ॥१२८॥

ए जो रस्‍ता बन का, जोए जमुना लग किनार । सात घाट दोए पुल बीच में, कई चौक बने कई हार ॥१२९॥

द्वार सामी पाट घाट का, सो रस्ता बराबर । जोए परे रस्ता नूर लग, आवे साम सामी द्वार नजर ॥१३०॥

ऊपर पाट चौक चांदनी, चारों खूंटों अति सोभाए । नंग जंग करें रंग पांच के, बारे थंभ गिरदवाए ॥१३१॥

चारों तरफों थंभ दो दो, जानों बन चार द्वार । मानिक हीरे पाच पोखरे, ए चारों द्वार नंग चार ॥१३२॥

नूर दिस थंभ दोए मानिक, बट दिस हीरा थंभ दोए । दोए थंभ पाच दिस अर्स के, थंभ पोखरे केल दिस सोए ॥१३३॥

चार थंभ चार खूंट के, नीलवी के झलकत । ए बारे थंभों का बेवरा, माहें जल सों जंग करत ॥१३४॥

सोभा लेत अति कठेड़ा, ऊपर ढांप चली किनार । सोभा जल में झलकत, जल नंग तरंग करे मार ॥१३५॥

ए दोऊ द्वार के बीच में, भरी जोत जिमी अंबर । और उठत जोत बन की, नूर अर्स कहूं क्यों कर ॥१३६॥

नूर और नूरतजल्ला, आकास जिमी सब नूर । देत देखाई सब नूरै, नूर जहूर भर पूर ॥१३७॥

सब्द न अब आगे चले, जित पर जले जबराईल । इत आवें रूहें अर्स की, जो होए अरवा असील ॥१३८॥

महामत कहे सुनो मोमिनों, ए अर्स नूरजमाल । एही अर्स अजीम है, रहें इन दरगाह रूहें कमाल ॥१३९॥

॥ प्रकरण ॥३४॥ चौपाई ॥१९५६॥

इसी सन्दर्भ में देखें-