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परिकरमा - प्रकरण ३८ | Parikarmaa prakaran 38

धाम बरनन

बरनन धाम को, कहूं साथ सुनो चित्त दे । कई हुए ब्रह्मांड कई होएसी, कोई कहे न हम बिन ए ॥१॥

क्यों कहूं धाम अन्दर की, विस्तार बड़ो अतन्‍त । क्यों कहे जुबां झूठी देह की, अखण्ड पार के पार जो सत ॥२॥

तो भी नेक केहेना साथ कारने, माफक जुबां इन बुध । अद्वैत अखण्ड पार की, करूं साथ के हिरदे सुध ॥३॥

थंभ दिवालें गलियां, कई सीढ़ियां पड़साल । मन्दिर कमाड़ी द्वार ने, माहें कई नंग रंग रसाल ॥४॥

गली माहें कई गलियां, कई चौक चबूतरे अनेक । खिड़की माहें कई खिड़कियां, जित देखूं जानों सोई विसेक ॥५॥

दूजी भोम का चेहेबच्चा, जल पर झरोखे तिन । सोभा लेत अति सुन्दर, तीनों तरफों बन ॥६॥

तीनों तरफ बन डारियां, करत छाया जल पर । एक तरफ के झरोखे, जल छाए लिया अन्दर ॥७॥

तीनों तरफों कठेड़ा, नेक नेक पड़साल । चारों तरफ उतरती सीढ़ियां, पानी बीच विसाल ॥८॥

आगूं मन्दिर चबूतरा, थंभ सोभित तरफ चार । इत आवत रूहें नहाए के, बैठ करत सिनगार ॥९॥

इत दाहिनी तरफ जो मन्दिर, गिनती बारे हजार । इन मन्दिरों खेलें भुलवनी, हर मन्दिर द्वार चार ॥१०॥

कर सिनगार इत खेलत, ए जो मन्दिर हैं भुलवन । दौड़ें खेलें हँसें रूहें, देख अपनी आभा रोसन ॥११॥

कई फिरते चबूतरे, फिरते मन्दिर गिरदवाए । थंभ तिन आगूं फिरते, बीच फिरता चौक सोभाए ॥१२॥

कई चौखूंने चबूतरे, चारों तरफों मंदिर । थंभ फिरते चारों तरफों, ए सोभा अति सुन्दर ॥१३॥

कई चौखूंने चबूतरे, मन्दिर आठों हार । चली चार गलियां चौक थें, हार आठ थंभ गली बार ॥१४॥

कही एक ठौर के चौक की, जित बैठत धनी आए । चौक चबूतरे इन भोम के, कई जुगत क्यों कही जाए ॥१५॥

ऊपर थंभ झलकत, और तले भोम झलकार । सामग्री सब झलकत, और थंभ दिवालों द्वार ॥१६॥

क्यों कहूं हिसाब मन्दिरन को, दिवालां चौक थंभ कई लाख । अमोल अतोल अन गिनती, कछू कहयो न जाए मुख भाख ॥१७॥

ए सुख इन मन्दिरन में, वाही सरूपों सुध । विध विध विलास इन धाम को, कहा कहे जुबां इन बुध ॥१८॥

जो वस्‍त जिन मिसल की, सोई बनी ठौर तित । सेज्या संदूक सिंघासन, कहूं केती कई जुगत ॥१९॥

कई जुगतें कई जिनसें, कई सामग्री सनंध । क्यों करूं बरनन धाम को, ए झूठी देह मत मंद ॥२०॥

कई बेली एक दिवाल में, कई बेल फूल तिन पात । तिन पात पात कई नंग हैं, एक नंग रंग कहयो न जात ॥२१॥

पात पात को देख के, हँसत बेलि संग बेलि । सैंन करें पंखी पंखी सों, जानों दौड़ करसी अब केलि ॥२२॥

फूल फूल कई पांखड़ी, तिन हर पांखड़ी कई नंग । नंग देख नंग हँसत, फूल फूल के संग ॥२३॥

अपनी अपनी जात ले, ठाड़े हैं सकल । करने खुसाल धनीय को, करत हैं अति बल ॥२४॥

त्यों त्यों जोत बढ़त है, ज्यों ज्यों देखें नूरजमाल । नाचत हरखत हँसत, देख धनी को खुसाल ॥२५॥

करें खुसाल धनीय को, होंए आप खुसाली हाल । ए सोभा इन मुख क्यों कहूं, ए देखे सब मछराल ॥२६॥

कई पसु पंखी जवेरन के, कई रंग बिरंग कई विध । जानों के खेल पर सब खड़े, ए क्यों कही जाए सनंध ॥२७॥

होत कछू पड़ताल पांउं से, बोलें सब स्वर अपनी बान । पसु पंखी देखे बोलते, सब आप अपनी तान ॥२८॥

कछू थोड़े ही पड़ताल से, धाम सब्द धमकार । बोले पसु पंखी बानी नई नई, जुबां जुदी जुदी अनेक अपार ॥२९॥

जिमी चेतन बन चेतन, पसु पंखी सुध बुध । थिर चर सबे चेतन, याकी सोभा है कई विध ॥३०॥

तो कहया थावर चेतन, अपनी अपनी मिसल । ए अन्तर आंखें खुले पाइए, परआतम सुख नेहेचल ॥३१॥

एक थंभ कई चित्रामन, हर चित्रामन कई नकस। नकस नकस कई पांखड़ी, जो देखों सोई सरस ॥३२॥

तिन हर पांखड़ी कई कांगरी, हर कांगरी कई नंग । एक नंग को बरनन ना होवहीं, तो सारे थंभ को क्यों कहूं रंग ॥३३॥

मोर मैना मुरग बांदर, कई जुदी जुदी सब जुबान । नेक सब्द उठे भोम का, बोलें आप अपनी बान ॥३४॥

एक सब्द के उठते, उठें सब्द अनेक । पसु पंखी जो चित्रामन के, कई विध बोलें विवेक ॥३५॥

कई जुदे जुदे रंगों पुतली, कई बने चित्रामन । कई विध खेल जो खेलहीं, मुख मीठी बान रोसन ॥३६॥

सो भी खेल बोल स्वर उठत, रंग रस होत रमन । सोभा सुन्दरता इनकी, केहे न सकों मुख इन ॥३७॥

चित्रामन सारे चेतन, सब लिए खड़े गुमान । जोत लरत है जोत सों, कोई सके न काहू भान ॥३८॥

करे जोत लड़ाई जोत सों, तेज तेज के संग । किरन किरन सों लड़त हैं, आठों जाम अभंग ॥३९॥

नूर नूर जहूर जहूर सों, करत सफ जंग दोए । एक दूजे के सनमुख, ठेल न सके कोए ॥४०॥

जंग करत अंगो अंगें, साथ नंग के नंग । रंग सों रंग लरत हैं, तरंग संग तरंग ॥४१॥

एक रंग को नंग कहावहीं, तामें कई रंग उठत । ताको एक रंग कहयो न जावहीं, आगे कहा कहूं विध इत ॥४२॥

जित देखूं तित सूरमें, एक दूजे थें अधिक देखाए । कई ऊपर तले कई बीच में, याको जुध न समाए ॥४३॥

तेज जोत उद्दोत आकास लों, किरना न काहूं अटकाए । देख देख जंग निरने कियो, कोई पीछा ना पाँउं फिराए ॥४४॥

चलते हलते धाम में, सबे होत चलवन । कई कोट जुबां इत क्या कहे, कई बिध थंभ दिवालन ॥४५॥

एक सरूप के नख की, सोभा बरनी न जाए । देख देख के देखिए, तो नेत्र क्योंए न तृपिताए ॥४६॥

तो सारे सरूप की क्यों कहूं, और क्यों कहूं इनों के खेलि । बन बेली पसु पंखी, माहें करें रंग रस केलि ॥४७॥

जात न कही एक सरूप की, अति सोभा सुन्दर मुख । तेज जोत रंग क्यों कहूं, ए तो साख्यातों के सुख ॥४८॥

सोभा जाए ना कही बिरिख पात की, तो क्यों कहूं फल फूल बास । क्यों होए बरनन सारे बिरिख को, ए तो सुख साथ को उलास ॥४९॥

जो एता भी कहया न जावहीं, तो क्यों कहूं थंभ चित्राम । परआतम हमारियां, ए तिनके सुख आराम ॥५०॥

एक थंभ की एह विध कही, ऐसे कई थंभ दिवालें द्वार । फेर देखों एक भोम को, तो अतंत बड़ो विस्तार ॥५१॥

पार नहीं थंभन को, नहीं दिवालों पार । ना कछू पार सीढ़ियन को, ना पार कमाड़ी द्वार ॥५२॥

नवों भोमका तुम साथ जी, कर देखो आतम विचार । क्यों आवे जुबां इन अकलें, ए जो अपारे अपार ॥५३॥

चित्रामन एक थंभ की, क्यों कहूं केते रंग । बन बेली फूल पात की, जुदी जुदी जिनसों नंग ॥५४॥

पसु पंखी हाथ पांउं नैन के, कई विध केस परन । कई खेल पुतलियन के, कई वस्तर कई भूखन ॥५५॥

कई बिध सोभा भोम की, कई रंग नंग नकस अनेक । कई ठौर अलेखे जड़ित में, जो देखो सोई नेक से नेक ॥५६॥

ए कही न जाए एक जिनस, सो जिनस अखंड अलेखे । सत सरूप सुख लेत हैं, देख देख के देखें ॥५७॥

अति सोभा सुन्दर ऊपर की, कई नकस बेल फूल । कई जिनसें कहा कहूं, होत परआतम सनकूल ॥५८॥

कई जिनस जुगत थंभन में, कई जिनस जुगत दिवाल । कई जिनसें द्वार क्यों कहूं, ए जो जिनस जुगत पड़साल ॥५९॥

कई जिनसें जुगत सीढ़ियां, कई जुगतें जिनसें मंदिर । कई जिनस झरोखे जालियां, कई जिनस जुगत अंदर ॥६०॥

सामग्री कई सनंधें, कई जिनसें सेज्या सिंघासन । कई सनंधें चौकी संदूकें, कई बिध भरे भूखन ॥६१॥

कई जिनसें वस्तर भरे, कई विध विध के विवेक । वस्तर भूखन किन विध कहूं, कई विध जुगत अनेक ॥६२॥

कई विध प्याले सीसे सीकियां, कई डब्बे तबके दिवाल । सोभित सुन्दर मंदिरन में, कई लटकत रंग रसाल ॥६३॥

कई जुगतें हिंडोलों मंदिरों, कई जंजीरां झलकत । माहें डब्बे पुतलियां झनझनें, कई विध झूलत बाजत ॥६४॥

कई मिलावे साथ के, सुन्दर झरोखे झांकत । सोभा देखत बन की, मोहोल इन समें सोभित ॥६५॥

दौड़त खेलत सखियां, एक साम सामी आवत । हाँसी रमूज एक दूजी सों, अरस-परस ल्यावत ॥६६॥

नवों भोम के मन्दिरों, माहें सखियां खेल करत । चारों जाम हाँस विलास में, रंग रस दिन भरत ॥६७॥

झरोखे नवों भोम के, मिल मिल बैठत जाए । निस दिन हेत प्रीत चित्त सों, मन वांछित सुख पाए ॥६८॥

विध विध के सुख बन में, सैयां खेलें झरोखों माहें । वाउ ठंढा प्रेमल गरमीय में, सुख लेवें सीतल छांहें ॥६९॥

सुख बरसाती और बिध, बीज चमके घटा चौफेर । सेहेरां गरजत बूंदें बरसत, घटा टोप लिया बन घेर ॥७०॥

ज्यों ज्यों अम्बर गाजत, मोर कोयल करें टहुंकार । भमरा तिमरा गान गूंजत, स्वर मीठे पंखी मलार ॥७१॥

सीत कालें सुख धूप को, पहेले पोहोंचत झरोखों आए । इत आराम घड़ी दोए तीन का, प्रभात समें सुखदाए ॥७२॥

दौड़े कूदें सखियां ठेकत, कई अंग अटपटी चाल । मटके चटके पांउं लटके, अंग मरोरत मुख मछराल ॥७३॥

जुदे जुदे जुत्थों प्रेम रस, अलबेलियां अति अंग । हँसत आवत धनी के चरनों, रस भरियां अंग उमंग ॥७४॥

कई हाथों फिरावत छड़ियां, कई हाथों फिरावत फूल । कई आवत गेंद उछालती, कई आवत हैं इन सूल ॥७५॥

सब आए आए चरनों लगें, एक एक आगूं दूजी के । ए बड़ा सुखकारी समया, सोभा लेत इत ए ॥७६॥

बात बड़ी देख देखिए, प्रेम प्रघल भर पूर । प्रेम अंग कहयो न जावहीं, सूरों में सूर सूर ॥७७॥

रंग नंग नकस न जाए कहे, तो क्यों कहे जाएं थंभ दिवालें द्वार । तो समूह की जुबां क्या कहे, जाको वार न पार सुमार ॥७८॥

रंग नंग नकस अन-गिनती, कहयो न जाए सुमार । ज्यों बट बीज माहें खड़ा, कर देखो आतम विचार ॥७९॥

कई दिवालें कई चौक थम्भ, कई मन्दिर कमाड़ी द्वार । एक भोम को बरनन ना केहे सकों, एतो नवों भोम विस्तार ॥८०॥

दसमी भोमें चांदनी, ऊपर कांगरी जोत । तेज पुन्ज इन नूर को, जानों आकास सब उद्दोत ॥८१॥

हेम जवेर रंग रेसम, केहे केहे कहूं मुख जेता । नूर तेज जोत झलकत, अकल आवे जुबां में एता ॥८२॥

महामत कहे सुनो साथजी, बुध जुबां करे बरनन । ले सको सो लीजियो, ए नेक कहया तुम कारन ॥८३॥

॥ प्रकरण ॥३८॥ चौपाई ॥२२६२॥

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