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परिकरमा - प्रकरण ३९ | Parikarmaa prakaran 39

प्रेम को अंग बरनन

प्रेम देखाऊं तुमको साथजी, जित अपना मूल वतन । प्रेम धनी को अंग है, कहूं पाइए ना या बिन ॥१॥

प्रेम नाम दुनियां मिने, ब्रह्मसृष्टि ल्‍याई इत । ए प्रेम इनों जाहेर किया, ना तो प्रेम दुनी में कित ॥२॥

ए दुनियां पूजे त्रिगुन को, करके परमेस्वर । सास्त्र अर्थ ऐसा लेत है, कहे कोई नहीं इन ऊपर ॥३॥

सुक व्यास कहें भागवत में, प्रेम ना त्रिगुन पास । प्रेम बसत ब्रह्मसृष्ट में, जो खेले सरूप बृज रास ॥४॥

तो नवधा से न्यारा कहया, चौदे भवन में नाहें । सो प्रेम कहां से पाइए, जो रेहेत गोपिका माहें ॥५॥

नाम खुदाए का कुरान में, लिख्या है आसिक । पढ़े इस्क औरों में तो कहे, जो हुए नहीं बेसक ॥६॥

आसिक नाम अल्लाह का, तो लिख्या इप्तदाए । इस्क न पाइए और कहूं, बिना एक खुदाए ॥७॥

पढ़े तब पावें इस्क को, जब खुलें माएने मगज । इस्क बिना करें बंदगी, कहें हम टालत हैं करज ॥८॥

मगज न पाया माएना, दुनी पढ़े कतेब वेद । प्रेम दुनी में तो कहें, जो पावत नाहीं भेद ॥९॥

प्रेम ब्रह्म दोऊ एक हैं, सो दोऊ दुनी में नाहें । पढ़े दोऊ बतावें दुनी में, जो समझत ना सास्त्रों माहें ॥१०॥

तो न्यारा कहया सब्द थें, प्रेम ना मिनें त्रिगुन । कई कोट ब्रह्मांडों न पाइए, प्रेम धाम धनी बिन ॥११॥

प्रेम सब्दातीत तो कहया, जो हुआ ब्रह्म के घर । सो तो निराकार के पार के पार, सो इत दुनी पावे क्यों कर ॥१२॥

प्रेम बताऊं ब्रह्मसृष्ट का, पेहेले देखो धाम बरनन । पीछे प्रेम बताऊं ब्रह्मसृष्ट का, जो धाम धनी के तन ॥१३॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जिन सिर नूरजमाल । कई कोट ब्रह्मांडों न पाइए, इनका औरे हाल ॥१४॥

क्यों न होए प्रेम इनको, धनी अछरातीत जिन सिर । ब्रह्मसृष्ट बिना न पाइए, देखो कोट ब्रह्मांडों फेर फेर ॥१५॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाको धनी राखत रूख । धाम मंदिर मोहोलन में, धनी देत सेज्या पर सुख ॥१६॥

क्यों न होए प्रेम इनको, सोहागनियां बड़ भाग । क्यों कहूं इन रूहन की, जाए देत धनी सोहाग ॥१७॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाके घर एह धाम । स्याम स्यामाजी साथ में, जाको इत विश्राम ॥१८॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो इनहीं में रहे हिल मिल । सकल अंग सुख देत हैं, धाम धनी के दिल ॥१९॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो रहे इन मोहोल मंदिर । दिल दे विहार करत हैं, ले दिल धनी अंदर ॥२०॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाके ए वस्तर भूखन । साजत हैं सबों अंगों, धाम धनी कारन ॥२१॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाके ए सोभा सिनगार । सबों अंगों सुख धनी को, निस दिन लेत समार ॥२२॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाको इन धनी सों विहार । निस दिन केलि करत हैं, सब अंगों सुखकार ॥२३॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो निरखत धाम धनी । रात दिन सुख लेत हैं, सब अंगों आप अपनी ॥२४॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो धनी की सेंना लेत । नैनों नैन मिलाए के, सामी इसारत देत ॥२५॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो धाम धनी अरधंग । अह निस अनुभव होत है, इन पिउ की सेज सुरंग ॥२६॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो इन मेले में बैठत । अरस-परस रंग अहनिस, नए नए खेल करत ॥२७॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाको ए धनी सरूप । रात दिन सुख लेत हैं, जाके सब अंग अनूप ॥२८॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाको निस दिन एही रमन । सब अंगों आनंद होत है, मिलावे धनी इन ॥२९॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो इन धनी की गलतान । निस दिन धनी खेलावत, विध विध की देत मान ॥३०॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो लेत धनी को सुख । आठों जाम सेवा मिने, सदा खड़े सनमुख ॥३१॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाको इन साथ में रस रंग । निस दिन विहार करत हैं, धाम धनी के संग ॥३२॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो रहें इन साथ के माहें । निस दिन आराम पिउ का, न्यारे निमख न होवें क्याहें ॥३३॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो धनी को लेवें माहें नैन । न्यारे निमख न करें, निस-दिन एही सुख चैन ॥३४॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो निरखें धनी के अंग । पलक ना पीछी फेरत, आठों-जाम उछरंग ॥३५॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाको याही साथ में खेल । मन्दिर या मोहोलन में, पिउ सो रमन रंग रेल ॥३६॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाको मिलाप इन घर । विहार करत अंग उछरंग, धनी सों बिध बिध कर ॥३७॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो बैठत पिउ के पास । निस-दिन रामत रमूज में, होत न वृथा एक स्वांस ॥३८॥

क्यों न होए प्रेम इनको, हाँस विनोद में दिन जाए । सेज्या संग इन धनी के, रस रंग रैन विहाए ॥३९॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो धाम धनी के तन । इन मोहोलों में इन पिउ संग, हींचत हिंडोलन ॥४०॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो झांकत झरोखे इन । झूलत हैं इन पिउ संग, बीच इन हिंडोलन ॥४१॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो करें इन हिंडोलों विहार । झूलत बोलें झनझनें, यों मन्दिर होत झनकार ॥४२॥

क्यों न होए प्रेम इनको, ऊपर झूलत हैं यों कर । अरस-परस इन धनी सों, दोऊ बैठत बांध नजर ॥४३॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो लें इन हिंडोलों सुख । झलकत भूखन झूलते, बैठत हैं सनमुख ॥४४॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो लें झूलतें रंग रस । उछरंग अंग न मावहीं, अंक भर अरस-परस ॥४५॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो झूलते होंए मगन । फेर फेर प्रेम पूरन, उमंग अंग सबन ॥४६॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो इन हिंडोलों झूलत । इन समें सोभा मन्दिरों, कड़े हिंडोले खटकत ॥४७॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो पौढ़त इन पिउ संग । अरस-परस दोऊ हींचत, अंग लगाए के अंग ॥४८॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो लेत इतकी खुसबोए । सिनगार कर सेज्या पर, केलि करें संग दोए ॥४९॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो इन मोहोलों में नेहेचल । दोऊ हिंडोलों हींचत, करें दिल चाह्या मिल ॥५०॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो लेवें इन हिंडोलों सुख । अखंड इन मोहोलन में, लेवें सदा सनमुख ॥५१॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो इन हिंडोलों पौंढ़त । मन चाहे इन मन्दिरों, अखण्ड केलि करत ॥५२॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो खेलत इन मोहोलन । हिंडोलों या पलंगे, सुख लेवें चाहे मन ॥५३॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो इन मोहोलों या पलंग । चित्त चाहे सुख अनुभवी, इन धनी के संग ॥५४॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाको देखें धनी नजर । प्रेम प्याले पीवत, धनी देत भर भर ॥५५॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो सेज समारें हेत कर । चारों जाम इन धनी को, राखत हैं उर पर ॥५६॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो फूलन सेज बिछाए । चारों पोहोर रंग रेहेस में, केलै करते जाए ॥५७॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाको धनी निरखत नैंन भर । आठों जाम अंग उनके, उलसत उमंग कर ॥५८॥

क्यों न होए प्रेम इनको, रंग रची सेज समार । चारों जाम पिउ सब अंगों, देत सुख अपार ॥५९॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो पिउसों पीवें प्रेम रस । कर कर साज सबों अंगों, पिउसों अरस-परस ॥६०॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो पिउ के सुने बंके बैन । याके आठों जाम हिरदे मिने, चुभ रेहेत पिउ के चैन ॥६१॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाके निरखें धनी भूखन । याही नजर अंगना अंग में, चुभ रेहेत निस-दिन ॥६२॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाको पिउ एती दिलासा देत । सामियों तो अंग इस्क के, कोट गुना कर लेत ॥६३॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाके निरखें धनी वस्तर । सो रूहें अपना अंग हैं, लेत खैंच नजर ॥६४॥

क्यों न होए प्रेम इनको, धनी बरसत निज नजर । ताके अंग रोम रोम में, प्रेम आवत भर भर ॥६५॥

क्यों न होए प्रेम इनको, धनीसों नैनों नैन मिलाए । ताको इन सरूप बिना, पल पट दई न जाए ॥६६॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाके धनी निरखें नैन । आठों-जाम याके अंग में, चुभ रेहेत बंके बैन ॥६७॥

क्यों न हो प्रेम इनको, जो पिउ की निरखें बंकी पाग । निस-दिन नजर न छूटहीं, पिउसों करें रंग राग ॥६८॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो लेत पिया को दिल । ए निस-दिन पिएं सुधा रस, पिउसों प्याले मिल ॥६९॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाके ए मोहोल ए सेज । लें सोहाग सबों अंगों, जिन पर धनी को हेज ॥७०॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो धनी को रिझावत । आठों पोहोर सबों अंगों, अरस-परस रंग रमत ॥७१॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाको धनी सों अन्तर नाहें । अरस-परस एक भए, झीलें प्रेम रस माहें ॥७२॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो पिउ सों करें एकांत । आठों-जाम इन सरूप सों, सुख लेत भांत भांत ॥७३॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो पिउ को निरखें नीके कर । आठों-पोहोर इनों पर, धनी की अमी नजर ॥७४॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जिनका एह चलन । आठों पोहोर इन धनी सों, रस भर रंग रमन ॥७५॥

क्यों न होए प्रेम इनको, प्रेम वासा इन ठौर । एही कहे प्रेम के पात्र, प्रेम नहीं कहूं और ॥७६॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो इन बन में करें बिलास । निस-दिन इन धनीय सों, करत विनोद कई हाँस ॥७७॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो बसत धाम बन माहें । जो बन हमेसा कायम, एक पात गिरे कबूं नाहें ॥७८॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो सदा खेलत इन बन । एक पात की जोत देखिए, करें जिमी अम्बर रोसन ॥७९॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो इन बन में करें विलास । सोहागिन अंग धनी धाम की, प्रेम पुंज नूर प्रकास ॥८०॥

क्यों न होए प्रेम इनको, करें धाम धनी सो केलि । इन बन इन धनीय सों, रमन अह निस खेलि ॥८१॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जाको इन बन में है हाँस । कमी कबूं न होवहीं, सदा फल फूल बास ॥८२॥

क्यों न होए प्रेम इनको, जो इन बन को रस लेत । फल फूल सुगंध बेलियां, वाउ सीतल सुख देत ॥८३॥

महामत कहे मेहेबूबजी, अब दीजे पट उड़ाए । नैना खोल के अंक भर, लीजे कंठ लगाए ॥८४॥

॥ प्रकरण ॥३९॥ चौपाई ॥२३४६॥

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