परिकरमा - प्रकरण ४० | Parikarmaa prakaran 40
धाम की रामतें - चरचरी
एक चित्रामन दिवालें बन, चढ़िए तिन पर धाए । एक चुटकी लेके भागी ताली देके, कहे दौड़ मिलियो आए ॥१॥
एक गली घर में दे परिकरमें, उमंग अंग न माए । एक का कपड़ा धाए के पकड़या, खैंच चली चित्त चाहे ॥२॥
छज्जे चढ़ एक दूजी देवें ठेक, यों कई ठेकतियां जाए । एक दोऊ पांऊं ठेकें खेल विसेकें, जानों लगत न छज्जे पाए ॥३॥
सखियां चढ़ धाए छज्जे न माए, खेल रच्यो इन दाए । एक दिवालों घोड़े तित चढ़ दौड़े, नए नए खेल उपाए ॥४॥
एक दूजी को ठेलें तीसरी हड़सेले, यों पड़ियां तीनों गिर । कई और आए गिरें उपरा ऊपरें, उठ न सकें क्यों ए कर ॥५॥
एक दौड़ियां जाए दई हाँसिएं गिराए, हुओ ढेर उपरा ऊपर । एक खेलते हारी जाए पड़ी न्यारी, खेल होत इन पर ॥६॥
होवे इन बिध हाँसी अंग उलासी, सूल आवत पेट भर । एक सूल भर पेटे इन विध लेटें, ए देखो खेल खबर ॥७॥
एक लेटतियां जाए सूल उभराए, उठावें कर पकर । आई तिन हाँसी मावे न स्वांसी, गिरी पकरे कर ॥८॥
देखो इनको सूल मुख सनकूल, दरद न माए अन्दर । सखियां बेसुमार हुओ अंबार, ए देखो नीके नजर ॥९॥
स्याम स्यामाजी आए देख्यो खेल बनाए, सब उठियां हँसकर । खेलें महामति देखलावें इंद्रावती, खोले पट अन्तर ॥१०॥
॥ प्रकरण ॥४०॥ चौपाई ॥२३५६॥
