परिकरमा - प्रकरण ४२
बड़ी रामत
कहियत नेहेचल नाम, सदा सुखदाई धाम । साथजी स्यामाजी स्याम, विलसत आठों जाम री ॥१॥
नित इत विश्राम, पूरन हैं प्रेम काम । हिरदे न रहे हाम, इस्क आराम री ॥२॥
आराम तो इन विध लेवें, सबे भरी अहंकार । पूरन हित पिउसों चित्त, जिनको नहीं सुमार ॥३॥
एक जुत्थ सहेली, मिल बैठी भेली, सुख केहेत न आवे पार । कोई छज्जे ऊपर, सखियां मिलकर, कहें पिउ को विहार ॥४॥
एक लम्बे हिंडोलें, मिल बैठी झूलें, लेवें सीतल सुगंध बयार । एक झरोखे माहें, मिल बैठत जाहें, करें रती रेहेस विचार ॥५॥
एक पिउ मद मतियां, आवें ठेकतियां, कंठ खलकते हार । एक जुदी जुदी आवें, स्वांत देखलावें, करें नूर रोसन झलकार ॥६॥
एक बांहें सों बांहें, संग मिलाए, आवें लिए अहंकार । एक दूजी के साथें, लिए कण्ठ बाथें, भूखन उद्दोतकार ॥७॥
एक कण्ठ हाथ छोड़ें, आगूं दौड़ें, कहे आइयो मुझ लार । एक चढ़ें गोखें, झांकत झरोखें, देखत बन विस्तार ॥८॥
एक बैठत पलंगें, पिउजीके संगें, खेलत प्रेम खुमार । आप अपने अंगें, करत हैं जंगें, कोई न देवे हार ॥९॥
एक अंग अनंगे, भांत पतंगे, क्यों कहूं ए मनुहार । अति उछरंगें, होत न भंगें, सत सुख संग भरतार ॥१०॥
एक प्रेम तरंगें, मद मछरंगें, बांहोंड़ी कण्ठ आधार । एक अंग मकरंदें, काढ़त निकंदें, आवत नाहीं पार ॥११॥
बादलियां आवें, रंग देखलावें, करें मोर कोयल टहुंकार । अति घन गाजें, अम्बर बिराजे, सोभित रूत मलार ॥१२॥
रूचिया मेह, बढ़त सनेह, ए समया अति सार । एक केहे सखी सीढ़ियां, दौड़ के चढ़ियां, होत सकल भोम झनकार ॥१३॥
एक साम सामी आवें, अंग न मिलावें, कहा कहूं चंचल आकार । एक दौड़ के धसियां, बन में निकसियां, मस्त हुइयां देख मलार ॥१४॥
एक आइयां सघन में, धाए चढ़ी बन में, खेल करें अपार । एक झूलें डारी चढ़ के, और पकड़ के, क्यों कहूं खेल सुमार ॥१५॥
एक भांत बांदर की, ठेक दे चढ़ती, करती रंग रसाल । एक दौड़ें पातों पर, करें चढ़ उतर, खेलत माहें खुसाल ॥१६॥
एक ठेक देती, बनसें रेती, कहा कहूं इनको हाल । एक आइयां दौड़ रेती, इतथें जेती, खेलें एक दूजीके नाल ॥१७॥
एक जाए गड़ें रेती, निकस न सकती, देवें एक दूजी को ताल । एक काढ़े घसीटें, और ऊपर लेटें, कहा कहूं इनकी चाल ॥१८॥
खेलते दिन जाए, हाँसी न समाए, प्रेम पिएं संग लाल । एक ठेक देतियां, रेती में गड़तियां, खेल होत कमाल ॥१९॥
केटलीक सखी संग, निकसी रमती रंग, रूप देखावें झुन्झार । एक दौड़ के जावें, हौज में झंपावें, एक ले दूजी लार ॥२०॥
एक आवें दौड़ कर, गिरें उपरा ऊपर, किन विध कहूं ए रंग । एक लरें पानी सें, जुत्थ जुत्थ सें, देखो इनको जंग ॥२१॥
पानी ऐसा उड़ावें, जानो अम्बर बरसावें, खेल करें न बीच में भंग । क्योंए न थकें, ऐसे अंग अर्स के, आगूं सोहें पुतलियां नंग ॥२२॥
एक खेल छोड़ें, दूजे पर दौड़ें, अंग न माए उछरंग । एक खिन में अर्स परे, खेल जाए करें, इन विध अंग उमंग ॥२३॥
परिकरमा कर आवें, पल में फिर आवें, आए कदमों लगें सब संग । कहे महामती, सब रंग रती, क्यों कहूं प्रेम तरंग ॥२४॥
॥ प्रकरण ॥४२॥ चौपाई ॥२३९१॥
