परिकरमा - प्रकरण ४३ | Parikarmaa prakaran 43
सागरों रांग मोहोलात मानिक पहाड़
नूर कुन्जी अगिन मुसाफ की, कले कुलफ खोलत हकीकत । सुध पाइए सागर नूर पार की, हक मारफत रूहों खिलवत ॥१॥
नूर दखिन सुख सागर, नूर वाहेदत मुख नीर । पाइए मारफत मुसाफ की, अर्स अंग असल सरीर ॥२॥
नूर नैरित अंग उजले, सोभा सुन्दर सागर खीर । हक इलम देखावे उरफान, पिएं इस्क प्याले सूरधीर ॥३॥
नूर दधि सागर सीतल, नूर पछिम अंग पूरन । ए सुख अतंत हमेसा, नूर वाहेदत पूर रोसन ॥४॥
नूर वाइव बल पूरन, नूर जहूर समन सागर । परख पूरन सुख सुन्दर, सब बिध नूर नजर ॥५॥
नूर मीठा मधु उत्तर, सुख अतंत अंगों अंग । ए विध जाने रस रसना, उपजत इनके संग ॥६॥
नूर अमृत सागर ईसान, सुख सीतल सुन्दर । नूर नजर भर देखिए, सुख सब बाहेर अन्दर ॥७॥
नूर पूर सुख सागर, अतंत पूरव सुखदाए । ए सबरस सब विध सब सुख, नूर सब अंगों उपजाए ॥८॥
ए तरफ आठों नूर सागर, अंग आवत नूर मुतलक । ए देखतहीं सुख सागर, ए सहूर इलम नूर हक ॥९॥
आठ तरफ जुदी जुदी जिमी, नूर एक से दूजी सरस । नूर बीच जिमी बीच सागर, जिमी सिफत न पार अरस ॥१०॥
पार जिमी ना पार सागर, नूर पाइए न काहू इंतहाए । नूर जिमी देखो नूर सागर, नूर अपार अर्स गिरदवाए ॥११॥
नूर पसु पंखी नूर में, जिमी जुदी जुदी नई सिफत । नई कहूं हिसाब इतके, ए नूर खूबी हमेसा अतंत ॥१२॥
पार न जिमी अर्स को, पार ना पसु जानवर । पार नहीं बिरिख बाग को, पार ना पहाड़ सागर ॥१३॥
सब सुख एक एक चीज में, सबकी सिफत नहीं पार । अर्स पहाड़ या तिनका, सब देखेही पाइए बेसुमार ॥१४॥
ए पाल आड़े जिमी सागर, नूर लगी रांग आसमान । इंतहाए नहीं गिरद फिरवली, नूर सिफत कहा कहे जुबान ॥१५॥
नूर रांग तरफ जो देखिए, इंतहाए न कहूं आवत । पार आवे जिन चीज को, तिनकी होए सिफत ॥१६॥
इंतहाए नहीं जिन चीज को, ताकी सिफत न होए जुबांए । सहूर इत सो क्या करे, जो सिफत न सब्द माहें ॥१७॥
हक ल्याए हिसाब में, जो कहावे अर्स अपार । सो अर्स दिल मोमिन का, ए किन बिध कहूं सुमार ॥१८॥
ऐसे ही सागरों रांग के, बारे हजार द्वार । और खूबी खुसाली ज्यों खिड़कियां, कहूं गिनती न आवे पार ॥१९॥
यों अर्स जिमी अपार के, सोभित गिरदवाए द्वार । रूह के दिल से देख फेर, ज्यों तूं सुख पावे बेसुमार ॥२०॥
आठ तरफ नूर जिमी के, तरफ आठ नूर सागर । ए गिन देख द्वार दिल अर्स में, पार न आवे क्यों ए कर ॥२१॥
नूर पार जिमी और रांग की, जो फेर देख रूह दिल । कई पहाड़ मोहोल बाग नेहेरें, जिमी बराबर टेढ़ी न तिल ॥२२॥
ज्यों फिरती थाल अर्स उज्जल, यों ही साफ सिफत बराबर । अर्स जिमी कही नूर की, कहूं गढ़ा न ऊंची टेकर ॥२३॥
पार नहीं बीच थाल के, गिरदवाए ना चौड़ी तूल । मोहोल पहाड़ नेहेरें सरभर, मुख सिफत कहा कहे बोल ॥२४॥
तो नूर रांग पार की क्यों कहूं, जाको सुमार नहीं वार पार । वह मोमिन देखें दिल अर्स में, जो दिल अर्स परवरदिगार ॥२५॥
कई जातें नूर पंखियन की, कई जातें नूर जानवर । जैसा रंग नूर जिमी का, पसु पंखी रंग सरभर ॥२६॥
नए नए रंगों नूर बाग बन, इंतहाए नहीं बिरिख नूर । ना इंतहाए नूर पसु पंखी, क्यों कहूं इन अंग जहूर ॥२७॥
नूर जिमी या तूल चौड़ी, इंतहाए न तरफ आवत । कहूं जुबां अर्स गिनती, अंग अर्स के जानें सिफत ॥२८॥
एक जिमी सिफत जो देखिए, तो जाए निकस नूर उमर । अपार जिमी इंतहाए सिफत, ए आवत नहीं क्योंए कर ॥२९॥
नूर जिमी बराबर अर्स की, कहूं चढ़ती नहीं उतार । दूजी सोभा नूर रोसन, जिमी भरी अम्बर झलकार ॥३०॥
कई रंग जिमी केती कहूं, और कई रंग नूर दरखत । सोई जिमी रंग पसु पंखियों, कर तुहीं तुहीं जिकर करत ॥३१॥
ना गिनती नाम जो हक के, सो हर नामें करें जिकर । मुख चोंच सुन्दर सोहनें, बोलें बानी मीठी सकर ॥३२॥
नूर वाउ चलत बहु विध की, सुगंध सोहत सीतल । सब चीजें खुसबोए नूर पूर, जिमी मोहोल बन जल ॥३३॥
फल फूल बन पसु पंखी बेहेकत, कोई चीज न बिना खुसबोए । सदा सुगन्ध सबे सुख दायक, याकी सिफत किन बिध होए ॥३४॥
नूर चीज सब चेतन आसिक, बाए बादल बीज अम्बर । सब बिध स्वाद पूर पूरन, सुख जाए ना कहयो क्योंए कर ॥३५॥
पार सोभा ना पार सागर, ना पार टापू ना इमारत । पार टापू ना मोहोल किनारें मोहोल, सोभा आसमान नूर झलकत ॥३६॥
अर्स सूर कई एक मोहोल में, तैसे मोहोल टापू अपार किनार । एक मोहोल अम्बर कई बीच में, जुबां क्यों कहे गिनती सुमार ॥३७॥
जो कोई होसी अंग अर्स की, और जागी होए हक इलम । तो कछू बोए आवे इन सहूर की, जो करे मदत हक हुकम ॥३८॥
पर जो स्वाद हक उरफान में, सो केहे ना सके जुबां इन अंग । जो हक मेहेर कर देवहीं, तो प्याले पीजे हक हादी संग ॥३९॥
हक मेहेर बड़ी न्यामत, रूह जिन छोड़े एह उमेद । ए फल सब बंदगीय का, जो कहे मुतलक अर्स भेद ॥४०॥
जिन दिल हुआ अर्स हक का, सोई लीजो इन अर्स सहूर । कहे हक हुकम ए मोमिनों, नूर पर नूर सिर नूर ॥४१॥
इन नूर रांग की रोसनी, क्यों कहूं जुबां इन मुख । द्वार द्वारी कलस कंगूरे, ए लें हक हुकमें मोमिन सुख ॥४२॥
दोए दोए गुरज बीच द्वार के, दो दो छोटी द्वारी के । ए छोटे बड़े मेहेराब जो, सोभा क्यों कहूं सिफत ए ॥४३॥
सोभा देत देखाई आसमान में, ऊँची सीढ़ियों नहीं सुमार । चार चार आगूं द्वार चबूतरे, दो दो बन के रंग नहीं पार ॥४४॥
दोए मुनारों लगते, कई छातें चबूतरों पर । दोए बीच सीढ़ियां आगूं द्वार के, जुबां सिफत पोहोंचे क्यों कर ॥४५॥
बिरिख बाग आगूं सब चबूतरों, कई जुदे जुदे बागों रंग बन । आगूं देत खूबी इन द्वारने, बन आसमान कियो रोसन ॥४६॥
सब बागों सोभित रस्ते, कहूं घट बढ़ नाहीं हार । कई चौक मोहोल मन्दिरन के, कई गली चली बांध किनार ॥४७॥
लाल जिमी नूर लाल बन, सोभित पसु नूर लाल । लाल जानवर लाल पर, रंग फल फूल सब गुलाल ॥४८॥
नूर जरद जिमी जानवर, नूर पीले पसु जरद जोत । फल फूल पीले बिरिख बेलियां, नूर पीला आकास उद्दोत ॥४९॥
नीली जिमी नूर पाच की, नूर नीले पसु जानवर । नूर नीला आसमान जिमी, ए नूर खूबी कहूं क्यों कर ॥५०॥
सेत जिमी सेत पसु पंखी, नूर आकास उज्जल । उज्जल नंग नूर सबे, बिरिख बेल सेत फूल फल ॥५१॥
नूर स्याम जिमी आसमान लग, नूर स्याम पसु पंखी नूर । फल फूल स्याम नूर बिरिख बेली, नूर पसु पंखी सब जहूर ॥५२॥
नूर जिमी आसमानी आसमान नूर, रंग पसु पंखी नूर आसमान । फल फूल बिरिख बेली सोई रंग, नूर सोभा जंग सके न भान ॥५३॥
दस दस रंग बिरिख बेल में, फल फूल रंग दस दस । रंग दस दस जिमी आकासें, नूर पसु पंखी याही रंग रस ॥५४॥
कई रंगों जिमी कई आकासें, पसु पंखी बन कई रंग । सब चीजों सोभा सब आसमान, सोभा नूर सबों में जंग ॥५५॥
अगिन ईसान लाल नूर, पीत नीर रंग दखिन । नैरित खीर नीला रंग, दधि सेत पछिम रोसन ॥५६॥
घृत वाइव बल स्याम रंग, रंग आसमानी मधु उत्तर । दस रंग अमृत ईसान, रस पूरव रंग सरभर ॥५७॥
ए-साफ अगिन पूर उज्जल, दखिन नीर रंग लाल । नैरित खीर पीत रंग, दधि पछिम नीला कमाल ॥५८॥
रंग जिमी दिस सागर, एक एक दोए बीच जान । ले इस्क गिन अगिन से, ज्यों सब होए अर्स पेहेचान ॥५९॥
नूर नीर खीर दधि सागर, घृत मधु एक ठौर । रस सब रस सागर, बिना मोमिन न पावे कोई और ॥६०॥
दो दरिया बीच एक जिमी, दो जिमी बीच दरिया एक । यों आठ दरिया बीच आठ जिमी, गिन तरफ से इन विवेक ॥६१॥
दरियाव जिमी परे रांग के, फिरते न आवे पार । देख जिमी या सागर, कहूं गिनती न पाइए सुमार ॥६२॥
और कही जो बिध रांग की, कलस कंगूरे बीच आसमान । द्वार द्वारी कही गिनती, ए क्यों होए सिफत बयान ॥६३॥
॥ प्रकरण ॥४३॥ चौपाई ॥२४५४॥
