परिकरमा - प्रकरण ५
बन में सरूप सिनगार
वतन आपनो, ब्रह्मसृष्ट को देऊं बताए । धाम की सुध मैं सब देऊं, ज्यों अंतस्करन में आए ॥१॥
इन भोम की रेती क्यों कहूं, उज्जल जोत अपार । भोम बन आसमान लो, झलकारों झलकार ॥२॥
जोत जरे इन जिमी की, मावत नहीं आसमान । तिन जिमी के बन को, जुबां कहा करसी बयान ॥३॥
इन भोम रंचक रेत की, तेज न माए आकास । जो नंग इन जिमी के, क्यों कहे जुबां प्रकास ॥४॥
जोत जिमी पोहोंचे आसमान लो, आसमान पोहोंचे जोत बन । सो छाए रही ब्रह्मांड को, सब ठौरों उठत किरन ॥५॥
ए मंदिर झरोखे बन पर, झलकत हैं कई नंग । बन फूल फल बेलियां, लगत झरोखों संग ॥६॥
कई रंग नंग झलकत, जिमी झलके दिवालों बन । सो छाए रही जोत आसमान में, पसु पंखी नूर रोसन ॥७॥
जिमी आकास बिरिख नूर के, पात फूल फल नूर । दिवाल झरोखे नूर के, क्यों कहूं नूर जहूर ॥८॥
जात अलेखे पंखियों, पसु अलेखे जात । जात जात अनगिनती, क्यों कर कहूं विख्यात ॥९॥
पसु पंखी अति सुन्दर, बोलत अमृत रसान । सुन्दरता केस परन की, क्यों कर करों बयान ॥१०॥
कई विध बानी बोलहीं, कई विध जिकर सुभान । कई दिन रातों रटत हैं, मुख मीठी कई जुबान ॥११॥
मीठे नैन बैन मुख मीठे, सोभा सुंदर अमान । जिन विध धनी रीझहीं, खेलें बोलें तिन तान ॥१२॥
विचित्र बानी माधुरी, बन में गूंजें करें गान । चेतन चैन जो चातुरी, क्यों कर करूं बखान ॥१३॥
आए दरवाजे आगे खड़े, खेलोने अति घन । स्याम स्यामाजी साथ को, पसु पंखी लेवें दरसन ॥१४॥
ठौर खेलन के चित धरो, विध विध के बन माहें । केहेती हों आगूं तुम, जो हिरदे चढ़ चढ़ आए ॥१५॥
आगूं धाम के बन भला, जमुना जी सातों घाट । तीन बाएं तीन दाहिने, बीच जल कठेड़ा पाट ॥१६॥
घाट पाट जल ऊपर, अमृत बन हैं जांहें । इन बन की सोभा क्यों कहूं, मेरो सब्द न पोहोंचे तांहें ॥१७॥
झीलन स्यामा संग राज सों, साथें किए जल केलि । इन समें के विलास की, क्यों कहूं रंग रेलि ॥१८॥
मानिक हीरे पाच पोखरे, नूर तरफ से चारों द्वार । चारों खूंटों थंभ नीलवी, अंबर भरयो झलकार ॥१९॥
ए बारे थंभों चांदनी, सोभित जल ऊपर । साथ बैठा सब फिरता, चारों तरफों पसर ॥२०॥
सोभा बन संझा समें, फल फूल खुसबोए । साथ बैठा पाट ऊपर, बीच सुंदर सरूप दोए ॥२१॥
बीच बैठक राज स्यामाजी, साथ गिरदवाए घेर । साजे सकल सिनगार, सोभा क्यों कहूँ इन बेर ॥२२॥
साथ बैठा पाट ऊपर, लग कठेड़े भराए । जोत करी आकास लों, जानों आकास में न समाए ॥२३॥
कई रंग नंग कठेड़े, परत जल में झांई । तेज जोत जो उठत, तले मावे न आकास माहीं ॥२४॥
सो झांई जल लेहेरां लेवहीं, तिनसे लेहेरां लेवे आसमान । कई रंग लेहेरें तिनकी, एक दूजी न सके भान ॥२५॥
जल में सिनगार सखियन के, लेहेरां लेवें संग छांहें । होए ऊंचे नीचें आसमान लों, केहेनी अचरज न आवे जुबांए ॥२६॥
जेती जुगत पाट ऊपर, सब लेहेरां लेवें माहें जल । जानों तले ब्रह्मांड दूजो भयो, भयो आसमान जोत सकल ॥२७॥
बन पाट जोत आसमान लों, सब देखत जल माहें । एक नयो अचंभोए बन्यो, केहेनी में आवत नाहें ॥२८॥
ज्यों ज्यों जल लेहेरां लेवहीं, त्यों त्यों तले ब्रह्मांड डोलत । कई विध तेज किरनें उठें, नूर आसमान लेहेरां लेवत ॥२९॥
ए ब्रह्मांड कह्यो न जावहीं, पर समझाए न निमूने बिन । सब्दातीत के पार की, बात केहेनी झूठी जिमी इन ॥३०॥
हर घाटों सोभा कई विध, कई जुदे जुदे सुख सनंध । बन नीके अपना देखिए, रस सीतल वाए सुगंध ॥३१॥
क्यों कहूं सोभा बन की, और छाए रही फूल बेल । तले खेलें सैयां सरूपसों, आवें एक दूजी कंठ मेल ॥३२॥
जिमी बन जुबां न आवहीं, तो क्यों कहूं सिनगार जहूर । सुन्दरता सरूपों की, कई रस सागर भर पूर ॥३३॥
अब क्यों कहूं जोत सरूपों की, और सुन्दरता सिनगार । वस्तर भूखन इन जिमी के, हुआ आकास उद्दोतकार ॥३४॥
कई रंग के नकस, कई भांत बेल फूल माहें । कई रंग इनमें जवेर, इन जुबां में आवत नाहें ॥३५॥
इन बेल फूल कई पांखड़ी, तिन हर पांखड़ी कई नंग । तिन नंग नंग कई रंग उठें, तिन रंग रंग कई तरंग ॥३६॥
ए स्वाद आतम तो आवहीं, जो पलक न दीजे भंग । अरस-परस एक होवहीं, परआतम आतम संग ॥३७॥
अब भूखन की मैं क्यों कहूं, जो इत हैं हेम मनी । कई विध की इत धात है, नंग जात नाहीं गिनी ॥३८॥
क्यों कहूं इन बानी की, मुख से उचरत जे । मीठी मीठी मुसकनी, सब भीगे इस्क के ॥३९॥
हँसत नेत्र मुख नासिका, श्रवन हँसत चरन । भों भृकुटी गाल अधुर, हँसत सिनगार भूखन ॥४०॥
चाल चातुरी कहा कहूं, लटक चटक भरे पाए । मटके अंग मरोरते, कछू ए गत कही न जाए ॥४१॥
ए सुख सरूपों की मुसकनी, रंग रस गत मुख बान । ए भोम बन धनी धाम को, रेहेस लीला नित्यान ॥४२॥
अब क्यों कहूँ भूखन की, और क्यों कहूँ बानी मिठास । क्यों कहूँ रेहेस जो पिउ को, जो अंग अंग में उलास ॥४३॥
इन जिमी इन बन में, करें खेल सरूप जो एह । कहा कहूँ इन विलास की, जो करत प्रेम सनेह ॥४४॥
कई रंग रेहेस संग धनी के, केते कहूँ विलास । प्रेम प्रीत सनेह कई रीत, मीठी मुसकनी कई हाँस ॥४५॥
नैन सों नैन लेत रंग सैंनें, अरस-परस उछरंग । उर मुख नेत्र कर कंठ, यों सुख सब विध अंग ॥४६॥
बंके नैन समारे सर बंके, बंकी सारस भों बंकी । बंके बैन लगत बान बंके, बंकी चलत बंक लंकी ॥४७॥
रस लेत धाम के सरूप सों, एक दूजी को ठेल । विविध विहार अलेखे अंगों, क्यों कहूं खुसाली खेल ॥४८॥
अंग इस्क इन भोम के, अलेखे अंग असल । कई रंग रस सरूप सों, जुदे जुदे या सामिल ॥४९॥
कहा कहूं वस्तर भूखन की, नूर रोसन जोत उजास । स्याम स्यामाजी साथ की, अंग अंग पूरत आस ॥५०॥
ए जोत में सोभा सुन्दर, देखिए हिरदे में आन । भर भर प्याले पीजिए, देख केहे सुन कान ॥५१॥
भोम बन तलाब सोभित, कुन्ज-बन बीच मंदिर । कहा कहूं गलियन की, छाया प्रेमल सुंदर ॥५२॥
नरमाई इन रेत की, उज्जल जोत सुपेत । खुसबोए कही न जावहीं, निकुन्ज-बन या रेत ॥५३॥
सोभा पाल तलाब की, कही न जाए जुबां इन । बन दयोहरी जल मोहोल की, रोसन रोसन में रोसन ॥५४॥
दयोहरियां सोभित ताल की, पाल पांवड़ियां अन्दर । सोभा कहा कहूं सब जड़ित की, बीच मोहोल जल ऊपर ॥५५॥
जुदी जुदी जुगतें सोभित, बन मोहोलों लिया घेर । गिरद झरोखे नवों भोम के, बीच धाम बन चौफेर ॥५६॥
याही भांत अछर की, बीच बन गलियां जानवर । खेल खेलें अति सोहने, क्यों बरनों सोभा दोऊ घर ॥५७॥
साम सामी दोऊ दरबार, उठत रोसनी नूर । क्यों कहूं इन जुबानसों, करें जंग दोऊ जहूर ॥५८॥
आगूं बड़े द्वार के, बीस थंभ तरफ दोए । रंग पांचों नूर जहूर के, ए सिफत किन मुख होए ॥५९॥
द्वार आगूं दोए चबूतरे, दोए तले बीच चौक । हरा लाल दोऊ पर दरखत, हक हादी रूहों ठौर सौक ॥६०॥
भोम बन आकास का, अवकास न माए उजास । कछुक आतम जानहीं, सो कह्यो न जाए प्रकास ॥६१॥
महामत कहे बन धाम का, विध विध दिया बताए । जो होसी ब्रह्मसृष्ट का, ए बान फूट निकसे अंग ताए ॥६२॥
॥ प्रकरण ॥५॥ चौपाई ॥३६८॥
