परिकरमा - प्रकरण ६ | Parikarmaa prakaran 6
जमुना जोए किनारे सात घाट
केल का घाट
कतरे कई केलन के, लटक रहे जल पर । आगे पीछे कोई नहीं, सब सोभित बराबर ॥१॥
दिवालां थंभन की, नरमाई अतंत । छाया पात गली मन्दिरों, तले उज्जल रेत चिलकत ॥२॥
कई चौक ठौर खेलन के, छाया पात सीतल । खूबी जुबां ना केहे सके, रेत मोती निरमल ॥३॥
कच्चे पक्के केलों कतरे, एक खूबी और खुसबोए । जुदी जुदी जिनसों सोभित, सुन्दर चौक में सोए ॥४॥
सैयां आवत झीलन को, निकस मन्दिरों द्वार । ए समया कह्यो न जावहीं, सोभा सिफत अपार ॥५॥
ए घाट पोहोंच्या बड़े वन को, जित हिंडोलों हींचत । उत चल्या किनारे जमुना, हद लिबोई से इत ॥६॥
घाट लिबोई का
छत्रियां लिबोइयन की, सुगंध सीतल अति छांहें । पेड़ जुदे जुदे लम्बी डारियां, मिल गैयां माहों माहें ॥७॥
कई विध के फल लटकत, जल पर बनी जो हार । लटके जवेर जड़ाव ज्यों, ऐसी बन की रची किनार ॥८॥
या विध फल छाया मिने, बनमें झूमत अन्दर । कहूं हारे कहूं फिरते, कई रंग चन्द्रवा सुन्दर ॥९॥
सोभा तले रेतीय की, कहा कहूं छाया ऊपर । कही न जाए लिबोई घाट की, सोभा अचरज तले भीतर ॥१०॥
पेड़ जुदे जुदे गेहेरी छाया, सब पेड़ों छत्री एक । देख देख के देखिए, जानों सबसे ए ठौर नेक ॥११॥
धाम छोड़ आगे चल्या, तरफ चेहेबच्चे पास । इन बन की सोभा क्यों कहूं, जित नित होत विलास ॥१२॥
जब खेलें इत सखियां, स्याम स्यामाजी संग । तब सोभा इन बन की, लेत अलेखे रंग ॥१३॥
घाट अनार का
ए बन खूबी देत हैं, चल्या दोरी बंध हार । फल नकस की कांगरी, लटकत जल अनार ॥१४॥
केतिक छाया जल पर, केतिक छाया बार । ए दोऊ बराबर चली, जमुना बांध किनार ॥१५॥
घाट अनार को अति भलो, एकल छत्री सब जान । घट बढ़ काहूं न देखिए, छाया गेहेरी सब समान ॥१६॥
जो जहां घाट बन देखिए, जानों एही बन विसेक । एक से दूजा अधिक, सो कहां लो कहूं विवेक ॥१७॥
कहूं फूल कहूं फल बने, कहूं पात रहे अति बन । जुदी जुदी जुगतें मंडप, जानों बहु रंग मनी कंचन ॥१८॥
इन पेड़ों खूबी क्यों कहूं, देख बन होइए खुसाल । रोसन रेत खुसबोए बन, आए लग्या दिवाल ॥१९॥
अमृत बन - घाट पाट का
दोऊ पुलों के बीच में, सोभित सातों घाट । तीन बाएं तीन दाहिने, बीच थंभ चांदनी पाट ॥२०॥
अमृत बन अति सोभित, घाट पाट का जे । आगूं दरवाजे निकट, बन बन्या जो सुन्दर ए ॥२१॥
कई रंग के इत बिरिख हैं, नीले पीले सेत लाल । क्यों कहूं सोभा इन मुख, जाकी पूरन सिफत कमाल ॥२२॥
अखोड़ अंजीर बन अमृत, ऊपर छाया अंगूर । एक छाया पात दिवाल लो, क्यों कर बरनों ए नूर ॥२३॥
कई रंग हैं एक पात में, कई रंग हैं फूल फल । अब क्यों बरनों मैं इन जुबां, कई बन हैं सामिल ॥२४॥
केते रंग एक पात में, केते रंग एक फूल । केते रंग एक फल में, केते रंग डाल मूल ॥२५॥
ए बन जोत इन भांत की, रोसन करत आसमान । आप अपना रंग ले उठत, कोई सके न काहूं भान ॥२६॥
कई मेवे इन बन में, केती कहूं जिनस । जुदे जुदे स्वाद कई विध के, जानो एक से और सरस ॥२७॥
इन पेड़ो खूबी क्यों कहूं, देख बन होइए खुसाल । ए रेत रोसन खुसबोए बन, ए निरखत बदले हाल ॥२८॥
घाट जांबू का
निकट घाट पाट के, सोभित है अति बन । इन मुख खूबी क्यों कहूं, छत्रियां जांबूअन ॥२९॥
गेहेरी छाया अति निपट, देखत नहीं आसमान । जमुना धाम के बीच में, ए बन सोभा अमान ॥३०॥
ए मंडप जानों चंद्रवा, कहूं ऊँचा नीचा नाहें । ए सोभा जुबां ना केहे सके, होंस रेहेत दिल माहें ॥३१॥
अनेक रंग इन ठौर के, क्यों कहूं इतका नूर । रोसन जिमी प्रफुलित, क्यों कहूं जुबां जहूर ॥३२॥
एह सिफत न जाए कही, जिन बन कबूं न जवाल । ए जुबां खूबी तो कहे, जो कोई होवे इन मिसाल ॥३३॥
सिफत न होवे रेत की, ना होवे बन सिफत । जो कछू कहूं सो उरे रहे, मेरी जुबां ना पोहोंचत ॥३४॥
घाट नारंगी का
चार हार फल की बनी, जल पर दोरी बंध । तले सात सात की कांगरी, माहें नकस कई सनंध ॥३५॥
खुसरंग फल नारंग के, पीलक लिए रंग लाल । झांईं उठे माहें जल, ए सोभित इन मिसाल ॥३६॥
नारंग बन की छत्रियां, जाए लगी बट घाट । फल फूल पात जड़ित ज्यों, जानों रच्यो अचंभो ठाट ॥३७॥
एकल छाया रेती रोसन, पूरन सिफत कमाल । और अनेक बन आगूं भला, ए हद छोड़ चल्या दिवाल ॥३८॥
इन बन की सोभा अति बड़ी, आवत आतम में जोए । इन नैन श्रवन के बल थें, मुखसे न निकसे सोए ॥३९॥
इन बन सोभा अपार है, कछु आतम उपजत सुख । तिनको हिस्सो लाखमों, कहयो न जाए या मुख ॥४०॥
घाट बट का
जो बट बन्यो जमुना पर, अनेक तिनकी डार । निपट पसारा इनका, जित बैठ करत सिनगार ॥४१॥
ऊँचा निपट दयोहर ज्यों, तले हाथों डारी लगत । डारों डारी अति विस्तरी, सुमार न इन सिफत ॥४२॥
जानों थंभ दिए बडवाईके, फिरते फिरते हार चार । सोभा लेत पात फूल, ए बट बड़ो विस्तार ॥४३॥
छत्री पांच ऊपरा ऊपर, जानों रचिया भोम समार । एक भोम रेती तले, ऊपर भोम बट चार ॥४४॥
एक पड़त झरोखे जल पर, और तरफ सब बन । ऊपर भोम धाम देखिए, दसों दिसा नूर रोसन ॥४५॥
इत बोहोत ठौर खेलन के, कई जिनसें तले ऊपर । बैठत दौड़त कूदत, खेलत कई हुनर ॥४६॥
ठेकत हैं कई जल में, और कूद चढ़े कई डार । खेल करें कई भांत सों, सब अंगों चंचल हुसियार ॥४७॥
तरफ चारों फिरते हिंडोले, उपली लग भोम जोए । धाम तलाव जमुना नारंगी, सखियां हींचत बट पर सोए ॥४८॥
अतंत सोभा इन घाट की, छाया चली जल पर । ए बट या और बिरिख, जल छाए लिया बराबर ॥४९॥
घाट बट को अति बड़ो, जल लिए चल्या किनार । कई बन इत बहु विध के, जानों बने दोरी बंध हार ॥५०॥
सातों घाट ए कहे, आगे पुल कुंज बन । अपना खजाना एह है, महामत कहे मोमिन ॥५१॥
॥ प्रकरण ॥६॥ चौपाई ॥४१९॥
