परिकरमा - प्रकरण ८ | Parikarmaa prakaran 8
हौज कौसर ताल जित जोए कौसर मिली
अब कहूं मैं ताल की, अन्दर आए सको सो आओ । जो होवे रूह अर्स की, फेर ऐसा न पावे दाओ ॥१॥
एक हीरे की पाल है, तिनमें कई मोहोलात । गिरद दयोहरी कई बन हैं, क्यों कहूं फल फूल पात ॥२॥
जब आवत इत अर्स से, चढ़िए इन घाट ताल । चबूतरे दोए दयोहरी, सीढ़ियां चढ़ते होत खुसाल ॥३॥
ए जो कही दो दयोहरी, तिन बीच पौरी दोए । एक आगूं चबूतरा, दूजी आगूं दयोहरी सोए ॥४॥
इतथें सीढ़ियां चढ़ती, ऊपर आए पोहोंची किनार । दोऊ तरफ दोए चबूतरे, बीच चौक खूंटों चार ॥५॥
ए बड़ा घाट तरफ अर्स के, फिरते तीन घाट तरफ और । बने गिरदवाए पाल पर, जुदी जिनसों चारों ठौर ॥६॥
ताल बीच टापू बन्यो, मोहोल बन्यो तिन पर । तिन गिरदवाए जल है, खूबी हौज कहूं क्यों कर ॥७॥
नेक कहूं तिनका बेवरा, चारों तरफ बन पाल । अव्वल बड़े घाट से, ए जो हौज कौसर कहया ताल ॥८॥
जो झुन्ड ताल की पाल पर, ऊंचा अतंत है सोए । फेर आए लग्या भोम सों, इन जुबां सोभा क्यों होए ॥९॥
एह झुन्ड है घाट पर, और पाल ऊपर सब बन । फिरता आया झुन्ड लो, पोहोंच्या पावड़ियों रोसन ॥१०॥
और झुन्ड जो दूसरा, तरफ दाहिनी सोए । छे छाते सीढ़ियों पर, बांधी मिल कर दोए ॥११॥
जो कहे झुन्ड दोऊ तरफ के, दोए दोए चबूतरे किनार । चौथे हिस्से चबूतरे, हार फिरवली खूंटों चार ॥१२॥
चौक बीच आए जब देखिए, दोऊ तरफ बने दोऊ द्वार । दोए द्वार दोए सीढ़ियों, चौक सोभित अति अपार ॥१३॥
एक एक बाजू चबूतरे के, तिनके हिस्से चार । दो हिस्से खूंट दो दिवालों, और दो हिस्सों बीच द्वार ॥१४॥
चार खूंने दोए चबूतरे, दोऊ तरफों चौथे हिस्से । तरफ आठ पेड़ दिवाल ज्यों, सोभा कही न जाए मुख ए ॥१५॥
इसी भांत दोऊ चबूतरे, चारों खूंटों पेड़ दिवाल । जब देखिए बीच चबूतरे, चार द्वार इसी मिसाल ॥१६॥
खूंट आठों दोऊ चबूतरे, और आठों बने द्वार । सोले दिवालें हुई सबे, सोभा लेत पेड़ों हार ॥१७॥
जानों तीनों चौक बराबर, बारे द्वार दिखाई देत । चार चार द्वार चबूतरे, दो सीढ़ियों पर सोभा लेत ॥१८॥
दस द्वार हुए हिसाब के, हुए बारे देखन मों । देखें बीच तीनों चौक से, ए किन मुख खूबी कहों ॥१९॥
दोऊ तरफ दयोहरियां पाल पर, पेड़ सीढ़ियों के लगती । दो सीढ़ी ऊपर आगूं द्वारने, चौक आगूं देत खूबी ॥२०॥
एक तरफ एक सीढ़ियों, सामी दूजी के मुकाबिल । इसी भांत तरफ दूसरी, सोभा कहा कहे इन अकल ॥२१॥
एक एक सीढ़ियों पर, तरफ दूसरी पेड़ दिवाल । तरफ तीसरी पाल पर, चौथी तरफ मोहोल ताल ॥२२॥
दो दयोहरी सोभा लेत हैं, ताल के खूंटों पर । द्वार सामी टापूअ के, दोरी बन्ध बराबर ॥२३॥
दोऊ तरफों दो दयोहरी, उतरती जल पर । तिन आगूं दोए चबूतरे, सो आए छात अन्दर ॥२४॥
ए जो कही दोए दयोहरी, बीच ऊपर दोए मेहेराब । तीनों घाट इन विध, सोभित बिना हिसाब ॥२५॥
ए जो पावड़ियां घाटों पर, जड़ाव ज्यों झलकत । अनेक रंगों किरनें उठें, नूर आसमान लेहेरां लेवत ॥२६॥
और सीढ़ियां जो बाहेर की, छात आई लग तिन । बने छज्जे उपरा ऊपर, ठौर खुसाली खेलन ॥२७॥
ए घाट अति सोहना, चबूतरे बुजरक । अति बिराज्या झुन्ड तले, ऊपर छातें इन माफक ॥२८॥
जब हक आवत ताल को, आए बिराजत इत । सो खेल जल का करके, ऊपर सौक को बैठत ॥२९॥
पीछे तले या ऊपर, रंग भर रूहें खेलत । ए खुसाली खावंद की, जुबां क्या करसी सिफत ॥३०॥
कई रंग इन दरखतों, अनेक रंग इन पात । अनेक रंग फल फूल में, याकी इतहीं होवे बात ॥३१॥
इन ठौर रेती नहीं, एक जवेर को बन्ध । खुसबोए नूर अतंत, क्यों कहूं सोभा सनन्ध ॥३२॥
पाल हीरे की उज्जल, ऊपर रोसन बन छाहें । तिनसे पाल सब रोसन, जिमी हरी पाच देखाए ॥३३॥
ए बन बांईं तरफ का, बन्या दोऊ भर पाल । देत नूर आकास को, सोभा लेत अति ताल ॥३४॥
अंदर दयोहरियां पाल पर, ऊपर बन बिराज्या आए । ए सोभा बन लेत है, ए खूबी कही न जाए ॥३५॥
ऊपर पाल जो दयोहरी, फिरती आगूं गिरदवाए । तिन सबों आगूं चबूतरा, तिन दोऊ तरफों उतराए ॥३६॥
यों दयोहरी सब चबूतरों, तिन सीढ़ियां सबको । हर दयोहरी हर चबूतरे, सीढ़ियां दोऊ तरफों ॥३७॥
दो सीढ़ियों के बीच में, तले चबूतरे द्वार । तिन सब सीढ़ियों परकोटे, चढ़ती कांगरी दोऊ किनार ॥३८॥
सीढ़ियों पर जो चबूतरे, तिन तले सब मेहेराब । मेहेराब आगूं जो चबूतरा, सोभित है ढ़िग आब ॥३९॥
दो दो सीढ़ियों के बीच में, ए जो छोटे कहे दो द्वार । तिन पर अजब कांगरी, अति सोभित पाल अपार ॥४०॥
पाल ऊपर जो दयोहरी, बीच कठेड़ा सबन । ए बैठक सोभा लेत है, कहा कहूं जुबां इन ॥४१॥
घाट बांईं तरफ नव दयोहरी का
घाट बांईं तरफ का, चौथे हिस्से तक । ऊपर झुण्ड बिराजिया, अति सोभा बुजरक ॥४२॥
ऊपर बनी नव दयोहरी, फिरते आए तले आठ थंभ । अदभुत बन्या है कठेड़ा, ए बैठक अति अचंभ ॥४३॥
उतरती दोए दयोहरी, तिन तले दोए चबूतर । बीच उतरती सीढ़ियां, तले चौक पानी भीतर ॥४४॥
फेर कहूं इनका बेवरा, ज्यों जाहेर सबों समझाए । अब कहूं इन भांतसों, ज्यों मोमिनों हिरदे समाए ॥४५॥
पेड़ चार चारों तरफों, छाया सोभा लेत अतंत । हार किनार बराबर, इत ज्यादा दो दरखत ॥४६॥
नव चौकी का मोहोल जो, ए बड़ी ठौर बीच पाल । चौथा हिस्सा पाल का, हुई दयोहरी आगूं पड़साल ॥४७॥
इतथें उतरती सीढ़ियां, दाएं बाएं दो दयोहरी । हुए तीनों चौक बराबर, सीढ़ियां इतथें तले उतरी ॥४८॥
दयोहरी तले जो चबूतरे, चौक दूजा याही बराबर । जल ऊपर जो चबूतरा, आईं सीढ़ियां इत उतर ॥४९॥
अब घाट छोड़ आगे चले, क्यों कहूं खूबी ए । एक छाया सब पाल पर, और छाया पाल से उतरती जे ॥५०॥
और हार दोऊ उतरती, लगती तीसरी तले बन । इन विध पेड़ बराबर, गिरदवाए सबन ॥५१॥
डारी लटकी जल पर, पेड़ गिरद दयोहरी हार । और पेड़ डारों डारी मिली, यों फिरती पाल किनार ॥५२॥
घाट सोले दयोहरी का
जमुना तरफ ताल के, जित जल भिल्या माहें जल । दयोहरियां इन बंध पर, जल पर सोभित मोहोल ॥५३॥
तले जाली द्वारें पाल में, जित जल रहया समाए । इत बैठ झरोखों देखिए, जानों पूर आवत हैं धाए ॥५४॥
चार दयोहरियां लग लग, चारों तरफों चार चार । सोले बंध पर दयोहरी, थंभ पचीस पांच पांच हार ॥५५॥
पचीस थंभ ऊपर कहे, तले सोले थंभ गिरदवाए । सो पोहोंचे दूजी भोम में, भोम बीच की अति सोभाए ॥५६॥
इत कठेड़ा चारों तरफों, बीच कठेड़ा ओर । इन बीच चारों हांसों कुंड बन्या, जल जात चल्या इन ठौर ॥५७॥
इत खुली भोम जल ऊपर, चारों तरफों बराबर । चारों हिस्से हर तरफों, आधी खुली जिमी जल पर ॥५८॥
ऊपर बैठक तले जल, ए जो कहया कठेड़ा गिरदवाए । इत आए जब बैठिए, तले जल अति सोभाए ॥५९॥
चारों तरफों कुण्ड ज्यों, इत देत खूबी अति जल । हाए हाए ए बात करते मोमिन, रूह क्यों न जात उत चल ॥६०॥
चार दयोहरी आगूं चबूतरा, तिन तले घड़नाले चार । तिन बीच चारों झरोखे, करें पानी ऊपर झलकार ॥६१॥
आगूं पांच थंभ ऊपर चबूतरा, इसी भांत झरोखों पर । सोभा लेत चारों झरोखे, थंभ तले ऊपर बराबर ॥६२॥
ऊपर दोऊ तरफों सीढ़ियां, दोऊ तरफ उतरते द्वार । इत आया तले का चबूतरा, परकोटे सोभे दोऊ पार ॥६३॥
जो अंदर चारों घड़नाले, आगूं चबूतरा जल पर । तले जल जाली बारों आवत, सोभा इन घाट कहूं क्यों कर ॥६४॥
सीढ़ियों ऊपर जो चबूतरा, बने चारों झरोखे जे । इत आगूं सबन के कठेड़ा, अति बन्या ताल पर ए ॥६५॥
सोभा जल जो लेत है, भरयो नूर रोसन आकास । बीच लेहेरें लगें मोहोलन को, ए क्यों कहूं खूबी खास ॥६६॥
खेलत जुदी जुदी जिनसों, इत पांउ ना भोम लगत । इत खेलें रूहें पाल पर, कई विध दौड़त कूदत ॥६७॥
ए भोम इन विध की, पांउ न खूंचत रेत । खेलत हैं इत रूहें, नए नए सुख लेत ॥६८॥
आगूं बन इन घाट के, अतंत सोभा लेत । तीसरे झुंड के घाट में, खेलें खावंद रूहें समेत ॥६९॥
घाट तेरे दयोहरी का
दयोहरी चौथे घाट की, देखें पाइयत हैं सुख । झुण्ड बन्या इन ऊपर, खूबी क्योंकर कहूं इन मुख ॥७०॥
चौक पर फिरती चांदनी, आठ दयोहरी गिरदवाए । पांच दयोहरियां बीच में, तले आठ थंभ सोभाए ॥७१॥
तले फिरता कठेड़ा, चारों तरफों द्वार । तले उतरती सीढ़ियां, जल माहें करें झलकार ॥७२॥
जल पर दोए चबूतरे, ऊपर चढ़ती दयोहरी दोए । आए पोहोंची थंभन को, अति सोभा घाट पर सोए ॥७३॥
फेर इनका भी कहूं बेवरा, ज्यों हिरदे आवे मोमिन । ए चौथा घाट अति सोहना, सुख होए अर्स रूहन ॥७४॥
तेरे चौकी बीच पाल के, आगे पालै की पड़साल । गिरद चौकी चार बिरिख की, सोभित झुन्ड कमाल ॥७५॥
उतरी सीढ़ियां पड़साल से, चौक हुआ बीच इत । दोऊ चौक दाएं बाएं बने, बीच दोए दयोहरी जित ॥७६॥
इतथें आगूं सीढ़ियां, दोऊ चबूतरों बराबर । इत चौक होए सीढ़ी उतरीं, तले आए मिली चबूतर ॥७७॥
मोमिन होए सो देखियो, तुमारा दिल कहया अर्स । चारों घाट लीजो दिल में, दिल ज्यों होए अरस-परस ॥७८॥
ए पाल सारी इन भांतकी, कई विध खेल होत इत । या घाटों या पाल पर, हक रूहें खेल करत ॥७९॥
खूबी अजब इन बन की, जो बन ऊपर पाल । दयोहरियां उलंघ के, डारें लटक रही माहें ताल ॥८०॥
ऊपर पाल तलाव के, ऊंचा बन अमोल । जिनकी लम्बी डारियां, तिनमें बने हिंडोल ॥८१॥
अंदर किनारे पाल पर, दयोहरियां बराबर । सोभित किनारे गिरदवाए, अति सोभा सुन्दर ॥८२॥
ऊपर बन बुजरक, कई हिंडोलों हींचत । कई डारी बन झूमत, कई विध खेल करत ॥८३॥
फिरते आए घाट लग, चारों घाट बराबर । कम ज्यादा इनमें नहीं, अब देखो पाल अंदर ॥८४॥
पाल अंदर की मोहोलात
आगूं फिरता चबूतरा, हाथ लगता आब । लग लग द्वार ऊपर बने, जिन बिध होत मेहेराब ॥८५॥
ताल में द्वार लग लग, पौरें बनी बीच पाल । झलकत हैं थंभ अगले, सोभा लेत है ताल ॥८६॥
अब क्यों कहूं पाल अंदर की, कई थंभ कई मोहोलात । कई देहेलाने कई मंदिर, ए खूबी कही न जात ॥८७॥
थंभ दोए हारें बनी, अंदर मोहोल कई और । कई बैठकें जुदी जुदी जिनसों, कहां लग कहूं कई ठौर ॥८८॥
एह जुगत सब पाल में, गिनती न होए हिसाब । थंभ द्वार जो झलकत, सो कहा कहे जुबां ख्वाब ॥८९॥
और सीढ़ियां चारों घाट की, इत दरवाजे नाहें । तित मोहोलात है अंदर, बिना हिसाबें माहें ॥९०॥
चारों हिस्से ताल के, मोहोल बने इन ठाट । और झुण्ड ऊपर चारों चौक के, ए जो बने चारों घाट ॥९१॥
घाट झुण्ड तलाव के, पावड़ियां तरफ जल । दयोहरियां चबूतरे, सोभित इन मिसल ॥९२॥
चौक थंभ कठेड़े, बैठक चारों घाटन । जो बन खूबी पाल पर, सो क्यों कहूं जुबां इन ॥९३॥
फेर कहूं पाल ऊपर, जो देखी माहें दिल । सो कहूं मैं अर्स रूहन को, देखें मोमिन सब मिल ॥९४॥
दयोहरी आगूं चबूतरे, खुले झरोखे ताल पर । सबों बिराजत कठेड़ा, नूर भराए रहयो अंबर ॥९५॥
चारों घाटों के बीच बीच, गिरदवाए दयोहरियां सब । याही विध आगूं सबों, ऊपर बन छाए रही छब ॥९६॥
जो फिरते आए चबूतरे, दोरी बंध बराबर । ऊपर बन सोभे दोरी बंध, कहूं गेहेरा नहीं छेदर ॥९७॥
सब खुले झरोखे ढ़ांप के, बन झलूब आया जल पर । ए सोभा अति देत है, जो देखिए रूह की नजर ॥९८॥
ऊपर दयोहरी तले चबूतरे, तिन तले सब मेहेराब । परकोटे तले छोटे द्वारने, फिरता बन सोभे तले आब ॥९९॥
आब ऊपर जो चबूतरा, फिरते देखिए छोटे द्वार । दे परिकरमा आइए, देख आइए घाट चार ॥१००॥
महामत कहे मोमिन को, गेहेरा गंभीर जल देख । टापू बन्यो बीच हौज के, सोभित अति विसेख ॥१०१॥
॥ प्रकरण ॥८॥ चौपाई ॥५६९॥
