परिकरमा - प्रकरण ९
टापू के बीच मोहोलात चौसठ पांखड़ी की
बन्यो ताल के बीच में, चारों तरफों जल । बन झरोखे गिरदवाए, सोभित बाग मोहोल ॥१॥
अब कहूं ताल के मोहोल की, जल गिरदवाए गेहेरा गंभीर । लेहेरें लगें बीच गुरज के, जल खलकत उज्जल खीर ॥२॥
ज्यों एक फूल चौसठ पांखड़ी, चार द्वार बने गिरदवाए । गुरज साठ बने तिन पर, ए खूबी कही न जाए ॥३॥
एक टापू बन्यो बीच जल के, मोहोल गुरज तिन पर । दयोहरियां ताल किनार पर, फिरती पाल बराबर ॥४॥
ए चौक बने चारों तरफों, और पाल ऊपर चार घाट । चारों द्वार टापूअके, बने सनमुख ठाट ॥५॥
दयोहरियां घाटन पर, चारों जुदी जिनस । देख देख के देखिए, जानों एक पे और सरस ॥६॥
पाल टापू हीरे एक की, तिनमें कई मोहोलात । अनेक रंग नंग देखत, असल हीरा एक जात ॥७॥
जब खूबी ताल यों देखिए, चढ़ चांदनी पर । फिरती पाल बन दयोहरी, जल सोभित अति सुंदर ॥८॥
तले सोभा चारों द्वारने, आगूं कठेड़े बैठक । आराम लेवें इन ठौरों, जब आवें इत हादी हक ॥९॥
बीच-बीच में बन बिराजत, गुरज छज्जे जल पर । छे छज्जे फिरते बने, सब गुरजों यों कर ॥१०॥
तीन छातें चौथी चाँदनी, सब गुरजों पर इत । तले छज्जे जल हाथ लग, ऊपर अति सोभित ॥११॥
ए टापू जिमी जवेर की, बीच बीच बन्या बन । दोनों तरफों छज्जे बने, ऊपर बन रोसन ॥१२॥
तीनों तरफों गुरज के, छज्जे बने यों आए । उपरा ऊपर भी तीन हैं, क्यों कहूं सोभा ताए ॥१३॥
तीन तीन छज्जे तरफ जल के, छे छज्जे बन पर । अन्दर गिरदवाए मोहोलात, बीच बैठक चबूतर ॥१४॥
दो गुरजों बीच मंदिर, हर मन्दिर झरोखे । तीन तीन उपरा ऊपर, बने तीनों भोमों के ॥१५॥
गुरज गुरज तीन द्वारने, तीनों भोमों में । कई एक ठौरों चरनियां, ऊपर चढ़िए जिनों से ॥१६॥
सामी और हार बनी, मन्दिर सामी मन्दिर । तिनमें साठ बाहेर, और साठ भए अन्दर ॥१७॥
बीच चेहेबच्चा जल का, कई फुहारे छूटत । फिरते द्वार इन चौक के, बोहोत सोभा अतन्त ॥१८॥
तीनों भोम चबूतरे, और फिरते मन्दिर द्वार । बीच बैठक चबूतरे, बने थंभ तरफ हार ॥१९॥
कही फिरती हार थंभन की, द्वार द्वार आगूं दोए । हर मन्दिर दो द्वारने, सोभा लेत अति सोए ॥२०॥
साठ गुरज फिरते कहे, गिरद चांदनी दिवाल । सो ए कमर के ऊपर, खूबी लेत कांगरी लाल ॥२१॥
ऊपर चांदनी कठेड़ा, बीच जोड़ सिंघासन । राज स्यामाजी बीच में, फिरती बैठक रूहन ॥२२॥
कबूं मिलावा नजीक, मिल बैठें गिरदवाए । छोटा तखत दुलीचे पर, बैठी रूहें अंग सों अंग लगाए ॥२३॥
कबूं कबूं बैठियां कुरसियों, रूहें बारे हजार । कबूं दो दो एक कुरसी पर, कबूं हर कुरसी चार चार ॥२४॥
कबूं दो दो सै एक कुरसियों, बैठें साठों गुरजों गिरदवाए । सो कुरसी दिवालों लगती, यों बैठक कठेड़े भराए ॥२५॥
बीच तखत बिराजत, सबथें ऊंचा गज भर । बैठक हक बड़ी रूह, सोभा लेत सब पर ॥२६॥
हक बड़ी रूह बैठें तखत पर, फिरती रूहें बैठत । दो दो सै बीच गुरज के, बारे हजार रूहें इत ॥२७॥
चांद चौदमी रात का, बैठें चांदनी नूरजमाल । सनमुख सबे बैठाए के, करें खावंद रूहें खुसाल ॥२८॥
अमृत खसम रूहन पर, नूर नजरों सींचत । सो रस रूहें रब का, सनमुख रोसन पीवत ॥२९॥
पूरन पांचों इंद्री सरूपें, एक एक में पांच पूरन । हर एक में बल पांच का, हर एक में पांच गुन ॥३०॥
एक एक जाहेर सब में, एक एक में चार बातन । इन बिध रूहें मुतलक, असल अर्स के तन ॥३१॥
अर्स तन रूहें आतमा, तरफ सबों बराबर । पूरन कहावें याही बात से, सब विधों ए कादर ॥३२॥
सरूप बैठे सब मिल के, घेर के गिरदवाए । सबों सुख पूरन हक का, रूहें लेवें दिल चाहे ॥३३॥
अब और देऊँ एक नमूना, इनको न पोहोंचे सोए । पर कहे बिना रूहन के, दिल रोसन क्यों होए ॥३४॥
एक जरा इन जिमी का, ताको नूर न माए आकास । तिन जिमी के जवेर को, होसी कौन प्रकास ॥३५॥
सो जवेर आगूं रूहन के, कैसा देखावें नूर । ज्यों सितारे रोसनी, बल क्या करे आगूं सूर ॥३६॥
आगूं रूह सूरत सूर के, जवेर गए ढँपाए । तो सोभा हक जात की, क्यों कर कही जाए ॥३७॥
जो रूहें अंग अर्स के, तिन चीज न कोई सोभाए । वाहेदत में बिना वाहेदत, और कछू ना समाए ॥३८॥
वस्तर भूखन हक जात के, सो हक जातै का नूर । कोई चीज अर्स अंग को, कर ना सके जहूर ॥३९॥
सोभा अंग अर्स के, या वस्तर या भूखन । होवे दिल चाहया कई विध का, सोभा सिनगार माहें खिन ॥४०॥
सो हेम नंग अति उत्तम, इन रूहों के माफक । वस्तर भूखन साज के, जाए देखें नजर भर हक ॥४१॥
ए सोभा सब साज के, रूहें ले बैठी अपना नूर । सो आगूं हक बड़ी रूह नूर के, ए क्यों कर करूं मजकूर ॥४२॥
तखत रूहों बीच चांदनी, बैठे बड़ी रूह खावंद । सो थंभ हुआ चांदनी, ऊपर आया पूरन चन्द ॥४३॥
जेती फिरती चांदनी, भरयो नूर उद्दोत । ले सामी चन्द रोसनी, भयो थंभ एक जोत ॥४४॥
इन नूर थंभ की रोसनी, पड़ी ताल पर जाए । जल थंभ कियो आसमान लों, घेरयो चंद गिरदवाए ॥४५॥
जंग करे जोत थंभ की, अर्स जोतसों आए । मिली जोत जिमी बन की, ए नूर आसमान क्यों समाए ॥४६॥
महामत कहे ए मोमिनों, जो होवे अरवा अर्स । सो प्रेम प्याले ल्यो भर भर, पीजे हकसों अरस-परस ॥४७॥
॥ प्रकरण ॥९॥ चौपाई ॥६१६॥
