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प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण २१

जीव को सिखापन

सुन मेरे जीव कहूं वृतांत, तोको एक देऊं द्रष्टांत । सो तूं सुनियो एकै चित, तोसों कहत हों करके हित ॥१॥

परीछितें यों पूछयो प्रस्न, सुकजी मोको कहो वचन । चौदे भवन में बड़ा जोए, मोको उत्तर दीजे सोए ॥२॥

तब सुकजी यों बोले प्रमान, लीजो वचन उत्तम कर जान । चौदे भवन में बड़ा सोए, बड़ी मत का धनी जोए ॥३॥

भी राजाऐं पूछा यों, बड़ी मत सो जानिए क्यों । बड़ी मत को कहूं विचार, लीजो राजा सबको सार ॥४॥

बड़ी मत सो कहिए ताए, श्री कृष्णजी सों प्रेम उपजाए । मत की मत तो ए है सार, और मत को कहूं विचार ॥५॥

बिना श्री कृष्णजी जेती मत, सो तूं जानियो सबे कुमत । कुमत सो कहिए किनको, सबथें बुरी जानिए तिनको ॥६॥

ऐसो तिन को कहा वृतांत, सो भी राजा तोको कहूं द्रष्टांत । सुन राजा कहूं सो जुगत, जासों पेहेचान होवे दोऊ मत ॥७॥

श्री कृष्ण जी सों प्रेम करे बड़ी मत, सो पोहोंचावे अखंड घर जित । ताए आड़ो न आवे भवसागर, सो अखंड सुख पावे निज घर ॥८॥

ए सुख या मुख कह्यो न जाए, याको अनुभवी जाने ताए । ए कुमत कहिए तिनसे कहा होए, अंधकूप में पड़िया सोए ॥९॥

सब दुखों में बुरा ए दुख, कुमत करे धनीसों बेमुख । केतो कहूं या दुख को विस्तार, जाके उलटे अंग इंद्री विकार ॥१०॥

दोऊ मत को कह्यो प्रकार, ए ब्रह्मसृष्टी करें विचार । जाको जाग्रत है बड़ी बुध, चेते अवसर जाके हिरदे सुध ॥११॥

ए सुकजी के कहे वचन, नीके फिकर कर देखो मन । बोहोत फिकर की नहीं ए बात, ए समया हाथ ताली दिए जात ॥१२॥

तेरी गिनती बांधी स्वांसों स्वांस, तिनको भी नाहीं विस्वास । केते रहे बाकी तेरे स्वांस, एक स्वांस की भी नाहीं आस ॥१३॥

स्वांस तो खिन में कई आवें जांए, गए अवसर पीछे कछू न बसाए । तिन कारन सुन रे जीव सही, बड़ी मत मैं तोको कही ॥१४॥

जो जोगवाई है तेरे हाथ, सो या मुखथें कही न जात । एते दिन तें ना करी पेहेचान, तैसी करी ज्यों करे अजान ॥१५॥

अब ए वचन विचारो मन, साख दई सुकजी के वचन । भी वचन कहूं सुन मेरे जिउ, जिन छोड़े चरन खिन पिउ ॥१६॥

निज घर पिउ को लीजे प्रकास, ज्यों वृथा न जाय एक स्वांस । ग्रह गुन इंद्री भर तूं पांओ, ऐसा फेर न पाईए दाओ ॥१७॥

भरम भान के कहे वचन, बड़ी मत ले ज्यों होए धंन धंन । ए भरम की नींद उड़ाए के दे, पेहेचान पिउ की नीके कर ले ॥१८॥

मुखथें वचन कहे तो कहा, जो छेद के अजूं ना निकस्या । अगलों ने किव करी अनेक, तें भी कछुक करी विसेक ॥१९॥

पर सांचा तो जो होए गलतान, तो भले मुख निकसी ए बान । ए बानी मेरी नाहीं यों, और किव करत हैं ज्यों ॥२०॥

ए गुसा किया मेरे जीव के सिर, ना तो और किवकी भांत कहूं क्यों कर । आतम मेरी है अति सुजान, अछरातीत निध करी पेहेचान ॥२१॥

अब सांचा तो जो करे रोसन, जोत पोहोंची जाए चौदे भवन । ए समया तो ऐसा मिल्या आए, चौदे भवन में जोत न समाए ॥२२॥

यों हम ना करे तो और कौन करे, धनी हमारे कारन दूजा देह धरे । आतम मेरी निज धाम की सत, सो क्यों ना करे उजाला अत ॥२३॥

श्री सुंदरबाई के चरन प्रताप, प्रगट कियो मैं अपनों आप । मोंसों गुनवंती बाईऐं किए गुन, साथें भी किए अति घन ॥२४॥

जोत करूं धनी की दया, ए अंदर आए के कह्या । उड़ाए दियो सबको अंधेर, काढ़यो सबको उलटो फेर ॥२५॥

इंद्रावती प्रगट भई पिउ पास, एक भई करे प्रकास । अखंड धाम धनी उजास, जाग जागनी खेलें रास ॥२६॥

॥ प्रकरण ॥२१॥ चौपाई ॥५३३॥

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