प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ३६
गुन केते कहूं मेरे पिउ जी, जो हमसों किए अनेक जी । ए बुध इन आकार की, क्यों कहे जुबां विवेक जी ॥१॥
माया मांगी सो देखाए के, भानी मन की भ्रांत जी । सब सुख दिए जगाए के, कई विध के द्रष्टांत जी ॥२॥
बृज के सुख इत आए के, हमको अलेखे दिए जी । रास के सुख इत देएके, आप सरीखे किए जी ॥३॥
कई विध विध के सुख धाम के, जो हमको दिए इत जी । तारतम करके रोसनी, कई बिध करी प्राप्त जी ॥४॥
सेहेजल सुख में झीलते, काहूं दुख न सुनिया नाम जी । सो माया में इत आए के, सुख अखंड देखाया धाम जी ॥५॥
कहे इंद्रावती अति उछरंगे, हमको लाड़ लड़ाए जी । निरमल नेत्र किए जो आतम के, परदे दिए उड़ाए जी ॥६॥
आप पेहेचान कराई अपनी, लई अपने पास जगाए जी । बड़ी बड़ाई दई आपथें, लई इंद्रावती कंठ लगाए जी ॥७॥
॥ प्रकरण ॥३६॥ चौपाई ॥१०६७॥
