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विषय-सूची

सागर - प्रकरण १

श्री किताब आठों सागर मूल मिलावे के लिखे हैं

सागर पेहेला नूर का

भोम तले की क्यों कहूं, विस्तार बड़ो अतंत । नेक नेक निसान दिए हादियों, मैं करूं सोई सिफत ॥१॥

चौसठ थंभ चबूतरा, दरवाजे तखत बरनन । रूह मोमिन होए सो देखियो, करके दिल रोसन ॥२॥

मेयराज हुआ महंमद पर, पोहोंच्या हक हजूर । सो साहेदी दई महंमदें, सो मोमिन करें मजकूर ॥३॥

सो रूहें अर्स दरगाह की, कही महंमद बारे हजार । दे साहेदी गिरो महंमदी, जाको वतन नूर के पार ॥४॥

हुकम से अब केहेत हों, सुनियो मोमिन दिल दे । हक सहूरें विचारियो, हकें सोभा दई तुमें ए ॥५॥

हकें अर्स किया दिल मोमिन, सो मता आया हक दिल सें । तुमें ऐसी बड़ाई हकें लिखी, हाए हाए मोमिन गल ना गए इन में ॥६॥

नूर सिफत द्वार सनमुख, और नूर द्वार पीछल । एक दाएँ बाएँ एक, हुआ बेवरा चारों मिल ॥७॥

सोभित द्वार सनमुख का, नूर थंभ पाच के दोए । थंभ नीलवी दो इनों लगते, सोभा लेत अति सोए ॥८॥

इन सामी द्वार पीछल, थंभ दोए नीलवी के । दो थंभ जो इनों लगते, नूर पाच के थंभ ए ॥९॥

नूर द्वार थंभ दो मानिक, तिन पासे दो पुखराज । ए द्वार तरफ दाहिनी, रहया नूर इत बिराज ॥१०॥

तरफ बांई द्वार पुखराजी, दो मानिक थंभ तिन पास । चार थंभ नूर सरभर, ए अदभुत नूर खूबी खास ॥११॥

नूर चारों पौरी बराबर, जो करत हैं झलकार । ए जुबां खूबी तो कहे, जो पाइए काहूं सुमार ॥१२॥

थंभ बारे बारे चारों खांचों, कहूं तिनका बेवरा कर । बारे नंग चार धात के, रंग जुदे जोत बराबर ॥१३॥

नेक देखाए रंग अर्स के, कई खूबी रंग अलेखे । रूह सहूर करे हक इलमें, हक देखाएँ देखे ॥१४॥

असल पांच नाम रंग के, नीला पीला लाल सेत स्याम । एक एक रंग में कई रंग, सो क्यों कहे जांए बिना नाम ॥१५॥

देखो चौसठ थंभ चबूतरा, रंग नंग अनेक अर्स । नाम लिए न जांए रंगो के, रंग एक पे और सरस ॥१६॥

मैं तो नाम लेत जवेरों, जानों बोहोत नाम लिए जांए । नंग नाम धात कहे बिना, रंग नाम आवे ना जुबांए ॥१७॥

एकै रस के सब रंग, करें जुदे जुदे झलकार । रंग नंग धात तो कहिए, जो आवे कहूं सुमार ॥१८॥

पर हिरदे आवनें रूहों के, मैं कई बिध करत बयान । ना तो क्यों कहूं रंग नंग धात की, ए तो खिलवत बका सुभान ॥१९॥

अर्स धात ना रंग नंग रेसम, जित नया न पुराना होए । जित पैदा कछू नया नहीं, तित क्यों नाम धरे जाएं सोए ॥२०॥

हेंम जवेर या जो कछू, सो सब जिमी पैदास । इत नाम पैदास के क्यों कहिए, जित पैदा न नास ॥२१॥

थंभ और चीज न आवे सब्द में, कर मोमिन देखो सहूर । अर्स बानी देख विचारिए, तब हिरदे होए जहूर ॥२२॥

नाम निसान इत झूठ है, तो भी तिन पर होत साबूत । जोत झूठी देख नासूत की, अधिक है मलकूत ॥२३॥

सो मलकूत पैदा फना पल में, कई करत खावंद जबरूत । सो रोसनी निमूना देख के, पीछे देखो अर्स लाहूत ॥२४॥

इन बिध सहूर जो कीजिए, कछू तब आवे रूह लज्जत । और भांत निमूना ना बनें, ए तो अर्स अजीम खिलवत ॥२५॥

आगूं नूर-मकान की कंकरी, देखत ना कोट सूर । तिन जिमी नंग रोसनी, सो कैसो होसी नूर ॥२६॥

ए नूर मकान कहया रसूलें, आगूं जाए ना सके क्‍योंए कर । तिन लाहूत में क्यों पोहोंचहीं, जित जले जबराईल पर ॥२७॥

ए देखो तुम रोसनी, हक अर्स इन हाल । जित पर जले जबराईल, कोई फरिस्ता न इन मिसाल ॥२८॥

मेयराज हुआ महंमद पर, नेक तिन किया रोसन । अब मुतलक जाहेर तो हुआ, जो अर्स में मोमिनों तन ॥२९॥

दिल अर्स भी तो कहया, हकें जान ए निसबत । इन गिरो पर मेयराज तो हुआ, जो दिन ऊग्या हक मारफत ॥३०॥

ए जो अंदर अर्स अजीम के, खिलवत मासूक या आसिक । नूरतजल्ला क्यों कहूं, बका वाहेदत हक ॥३१॥

इन भांत निमूना लीजिए, करियो हक सहूर मोमिन । तुम ताले आया लदुन्नी, तुम देखो अर्स रोसन ॥३२॥

ए तुम ताले तो आइया, जो तुम असल खिलवत । निसदिन सहूर एही चाहिए, हक बैठे तुमें खेलावत ॥३३॥

अब गिन देखो थंभ चौसठ, बीच चारों हिस्सों चार द्वार । नाम रंग नंग तो कहिए, जो कित खाली देखूं झलकार ॥३४॥

एक जोत सागर सब हो रहया, और ऊपर तले सब जोत । कई सूर उड़ें आगूं कंकरी, तिन भोम की जोत उद्दोत ॥३५॥

चंद्रवा दुलीचा तकिए, सब जोतै का अंबार । जित देखों तित जोत में, नूर क्यों कहूं लेहेरें अपार ॥३६॥

दो दो नंग थंभों के बीच में, बिना नूर न पाइए ठौर । दिवाल बंधाई नूर की, क्यों कहूं रंग नंग और ॥३७॥

बीच खाली जित जाएगा, तित लरत थंभों का नूर । उत जंग होत नंगन की, तित अधिक नूर जहूर ॥३८॥

नूर नूर सब एक हो गई, एक दूजी को खेंचत । दूनी जोत बीच खाली मिनें, रंग क्यों गिने जांए इत ॥३९॥

जिमी जात भी रूह की, रूह जात आसमान । जल तेज वाए सब रूह को, रूह जात अर्स सुभान ॥४०॥

पसु पंखी या दरखत, रूह जिनस हैं सब । हक अर्स वाहेदत में, दूजा मिले ना कछुए कब ॥४१॥

दूजा तो कछू है नहीं, दूजी है हुकम कुदरत । सो पैदा फना देखन की, फना मिले न माहें वाहेदत ॥४२॥

जो कछुए चीज अर्स में, सो सब वाहेदत माहें । जरा एक बिना वाहेदत, सो तो कछुए नाहें ॥४३॥

ए खिलवत हक नूर की, नूर आला नूर मकान । बिछौना सब नूर का, सब नूरै का सामान ॥४४॥

नूर चंद्रवा क्यों कहूं, नूरै की झालर । तले तरफें सब नूर की, देखो नूरै की नजर ॥४५॥

रूहें मिलावा नूर में, बीच कठेड़ा नूर भर । थंभ तकिए सब नूर के, कछू और ना नूर बिगर ॥४६॥

तखत सोभित बीच नूर का, नूर में जुगल किसोर । बैठे हक बड़ी रूह नूर में, नूर सोभा अति जोर ॥४७॥

नूर सरूप रूप नूर के, नूर वस्तर भूखन । सोभा सुन्दरता नूर की, सब नूरै नूर रोसन ॥४८॥

गुन अंग इंद्री नूर की, नूरै बान वचन । पिंड प्रकृत सब नूर की, नूरै केहेन सुनन ॥४९॥

रूहें बड़ी रूह नूर में, नूर हक के सदा खुसाल । हक नूर निसदिन बरसत, नूर अरस-परस नूरजमाल ॥५०॥

नाम ठाम सब नूर के, कहूं जरा ना नूर बिन । मोहोल मन्दिर सब नूर के, माहें बाहेर नूर पूरन ॥५१॥

अर्स भोम सब नूर की, नूरै के थंभ दिवाल । द्वार बार कमाड़ी नूर के, नूर गोख जाली पड़साल ॥५२॥

मेहेराव झरोखे नूर के, जरे जरा सब नूर । अर्स माहें बाहेर सब नूर में, नूर नजीक नूर दूर ॥५३॥

नूर नाम रोसन का, दुनी जानत यों कर । सो तो रोसनी जिद अंधेर की, दुनी क्या जाने लदुन्नी बिगर ॥५४॥

तले भोम चबूतरा, बैठा हक मिलावा इत । हक हादी ऊपर बैठ के, गिरो को खेलावत ॥५५॥

अर्स मता अपार है, दिल में न आवे बिना सुमार । ताथें ल्याऊं बीच हिसाब के, ज्यों रूहें करें विचार ॥५६॥

अर्स नाहीं सुमार में, सो हक ल्याए माहें दिल मोमिन । बेसुमार ल्‍याए सुमार में, माहें आवने दिल रूहन ॥५७॥

इत फिरते साठ मन्दिर, तिन बीच गलियां चार । चारों तरफों देखिए, जानों जोतै का अंबार ॥५८॥

चौकठ ताके घोड़ले, और दिवालों चित्रामन । सोभा क्यों कहूं जोत में, भरयो नूर रोसन ॥५९॥

दिवालों चित्रामन, कई जोत उठें तरंग । साम सामी ले उठत, करत माहों माहें जंग ॥६०॥

बिरिख बेली कई जवेर की, सकल वनस्पति । नकस कटाव केते कहूं, बनी पसु पंखी जात जेती ॥६१॥

देख देख के देखिए, सोभा अति सुन्दर । जैसी देखियत दिवालों, तिनसे अधिक अन्दर ॥६२॥

अधिक चित्रामन अन्दर, क्या क्या देखों इत । जिनको देखों निरख के, जानों एही अधिक सोभित ॥६३॥

अन्दर कई वस्तां धरी, कई सेज्या चौकी सन्दूक । जित सोभा जो लेत है, तित देखिए तिन सलूक ॥६४॥

कई सीसे प्याले डब्बे, कई अन्दर गिरद देखत । कई तबके छोटी बड़ियां, कई सीकियां लटकत ॥६५॥

अन्दर की वस्तां क्यों कहूं, और क्यों कहूं चित्रामन । जो मन्दिरों अन्दर देखिए, तो दिल होवे रोसन ॥६६॥

बार-साखें द्वार ने, सोभें साठों मन्दिरों के । सोभें गिरदवाए बराबर, एक एक पें अधिक सोभा ले ॥६७॥

बारीक इन कमाड़ियों, अनेक चित्रामन । रंग नंग या तखतें, ए सब जवेर चेतन ॥६८॥

ना चितारे चेतरी, ना घड़ी ना किन समारी । ए अर्स जिमी थंभ मोहोलातें, या दिवालें या द्वारी ॥६९॥

किनार दिवालें द्वार ने, लाल दोरी दोए दोए । मन्दिर मन्दिर की हद लग, सोभा लेत अति सोए ॥७०॥

दोरी लगती कांगरी, सब ठौरों गिरदवाए । चित्रामन तिनके बीच में, जो देखों सो अधिक सोभाए ॥७१॥

साठों तरफों मन्दिर, नई नई जुदी जुगत । ए साठों फेर के देखिए, सोभा और पे और अतंत ॥७२॥

क्यों कहूं जुगत अंदर की, क्यों कहूं जुगत बाहेर । जित देखों तित लग रहों, जानों नजरों आवे जाहेर ॥७३॥

उपली भोम चढ़न को, सीढ़ियां अति सोभित । नई नई तरह नए रंगों, सामी जोतें जोत उठत ॥७४॥

सीढ़ियां अति झलकत, जब सखियां उतर चढ़त । प्रतिबिंब सखियों सोभित, पड़घा मीठे स्वर उठत ॥७५॥

स्वर भूखन के बाजत, मीठे अति रसाल । इनकी सोभा क्यों कहूं, जाको खावंद नूरजमाल ॥७६॥

सीढ़ियां अति सोभित, माहें मंदिरों सबन । कहूं कहूं देहेलान में, जो जित सो तित रोसन ॥७७॥

दो दो थंभ आगूं द्वारने, तिन आगूं दूसरी हार । ए थंभ अति बिराजत, सोभा नाहीं सुमार ॥७८॥

चार हांस तले थंभ के, आठ ऊपर तिन । सोले बीच आठ तिन पर, और चार ऊपर इन ॥७९॥

इन बिध हांस थंभन की, माहें नकस कई कटाव । जुदी जुदी जुगतों चित्रामन, माहें जुदे जुदे कई भाव ॥८०॥

एक एक रंग का जवेर, उसी जवेर में नकस । जुदे जुदे कई कटाव, एक दूजे पे सरस ॥८१॥

इनके बीच चबूतरा, इत कठेड़ा गिरदवाए । ए खूबी इन चबूतरे, इन जुबां कही न जाए ॥८२॥

तो भी नेक कहूं मैं इन की, जो आए चढ़त है चित्त । ए जो बैठक खावंद की, सो नेक कहूं सिफत ॥८३॥

भोम उज्जल कई नकस, कहा कहूं जिमी इन नूर । जानों कोटक उदे भए, अर्स के सीतल सूर ॥८४॥

फिरते थंभ जो चौसठ, चारों तरफों द्वार । दो दो सीढ़ी आगूं द्वारने, सोभित हैं अति सार ॥८५॥

कई थंभ हैं मानिक के, कई पाच कई पुखराज । नूर रोसन एक दूसरे, मिल जोतें जोत बिराज ॥८६॥

कई लसनियां नीलवी, एक थंभ एक रंग । यों फिरते थंभ नंगन के, जुदे जुदे सब नंग ॥८७॥

सोले थंभों कठेड़ा, यों थंभ कठेड़ा किनार । कठेड़ा थंभों लगता, सोले सोले तरफ चार ॥८८॥

थंभ थंभ को देखत, ज्यों सूर के सामी सूर । बढ़त है बीच रोसनी, क्यों कहूं नूर को नूर ॥८९॥

यों थंभ थंभ जोत में, देखो सबन का जहूर । ऊपर तले सब जोत में, जम्या नूर भरपूर ॥९०॥

ऊपर चंद्रवा थंभों लगता, तले जेता चबूतर । जड़ाव ज्यों अति झलकत, एता ही इन पर ॥९१॥

कई रंगों के जवेर, करत जोत अपार । कई बेल फूल पात नकस, ए सिफत न आवे सुमार ॥९२॥

बिछौना बिछाइया, करत दुलीचा जोत । फल फूल पात नकस, कई उठत तरंग उद्दोत ॥९३॥

चारों तरफों दुलीचा, फिरता बिछाया भर कर । चबूतरे लग कठेड़ा, सोभा अति सुन्दर ॥९४॥

क्यों कहूं रंग दुलीचे, फिरती दोरी चार । स्याम सेत हरी जरद, ए फिरती जोत किनार ॥९५॥

कई विध के कटाव, कई बिरिख बेल नकस । पात फूल बीच फिरते, और पे और सरस ॥९६॥

लग कठेड़े तकिए, क्यों कहूं तकियों रंग । बारे हजार दाब बैठियां, एक दूजे के संग ॥९७॥

बैठक दोऊ सिंघासन, चार पाए एक तखत । पीछल तकिए दोऊ जुदे, रख्या ऊपर दुलीचे इत ॥९८॥

मोती रतन मानिक, हीरे हेम पाने पुखराज । गोमादिक पाच पिरोजा परवाल, रहे कई रंग नंग धात बिराज ॥९९॥

नंग नाम केते कहूं, कहूं केती अर्स धात । बरनन तखत अर्स का, कहे जुबां सुपन नंग जात ॥१००॥

चार थंभ चार खूंट के, छत्री सोभा अति जोर । जो कदी नैनों देखिए, तो झूठे तन बंध देवे तोर ॥१०१॥

पीछल तकिए दोऊ तरफों, बीच चढ़ती कांगरी चार । फूल पात बेल कटाव कई, जुबां कहा कहे नकस अपार ॥१०२॥

दोऊ छेड़ों में थंभ दोए, बीच तीसरा सरभर । तिन गुल पर गुल कटाव, नूर रोसन सोभा सुन्दर ॥१०३॥

जो बरनन करूं पूरे पात को, तो चल जाए काहू उमर । तो पात न होवे बरनन, ए अर्स तखत यों कर ॥१०४॥

एक पात कई बेल कांगरी, बेल फूल पात कटाव । तिन बेलों पात कई बेलें, ऐसे बारीक अति जड़ाव ॥१०५॥

एक नंग बारीक इत देखिए, ताकी जोत न माए आसमान । अपार जरे अर्स की, ना आवे माहें जुबान ॥१०६॥

दोऊ तरफों सिंघासन के, बगलों तकिए दोए । बारीक तिन कटाव कई, ए बरनन कैसे होए ॥१०७॥

ऊपर छत्रियां क्यों कहूं, कई रंग नंग जोत किनार । कई दोरी बेली कांगरी, सोभा फिरती तरफ चार ॥१०८॥

चार थंभ जो पाइयों पर, तिन में बेली अनेक । रंग नंग बारीक अलेखे, तिनको क्यों कर होए विवेक ॥१०९॥

चार खूंने के चार नकस, कई कांगरी कटाव फूल । बीच पांखड़ी फिरती फूल ज्यों, ए अर्स तखत इन सूल ॥११०॥

फूल कटाव कई बीच में, कई विध के नकस । इन के बीच में मानिक, गिरदवाए नीलवी सरस ॥१११॥

दोऊ सरूपों ऊपर, दो फूल ज्यों बिराजत । देखी और अनेक चित्रामन, पर अचरज एह जुगत ॥११२॥

दोए कलस दोए छत्रियों, छे कलस गिरदवाए । ए आठ कलस हैं हेम के, सुन्दर अति सोभाए ॥११३॥

जोर करे जोत जवेर, ऊपर हक तखत । ए नूर जिमी आसमान में, रोसन बढ्यो अतंत ॥११४॥

सो ए धरया इत तखत, जानों नजर ना छोडूं खिन । पल न चाहे बीच आवने, ऐसी सोभा तखत बीच इन ॥११५॥

एक गादी दोए चाकले, पीछल वाही जिनस । चौखूंने कटाव कई पसमी, जो देखों सोई सरस ॥११६॥

किनार बाएं बीच जवेर के, और रोसन बेसुमार । ए तखत नूरजमाल का, अर्स सब चीजों अपार ॥११७॥

इन सिंघासन ऊपर, बैठे जुगल किसोर । वस्तर भूखन सिनगार, सुन्दर जोत अति जोर ॥११८॥

एक जोत जुगल की, और बीच बैठे सिंघासन । बल बल जाऊं मुखारबिंद की, और बलि बलि जाऊं चरन ॥११९॥

कहा कहूं जोत रूहन की, और समूह भूखन वस्तर । ए कही जोत पूरन सिंध की, जो अव्वल नूर सागर ॥१२०॥

ए सागर भर पूरन, तेज जोत को गंज । कई इन सागर लेहेरें उठें, पूरन नूर को पुंज ॥१२१॥

महामत कहे सिंध दूसरा, सोभा सरूप रूहन । ए सुखकारी अति सुन्दर, ए बका वतन बीच तन ॥१२२॥

॥ प्रकरण ॥१॥ चौपाई ॥१२२॥

इसी सन्दर्भ में देखें-