सागर - प्रकरण १०
श्री राजजी का सिनगार तीसरा
फेर फेर सरूप जो निरखिए, नैना होंए नहीं तृपित । मोमिन दिल अर्स कह्या, लिखी ताले ए निसबत ॥१॥
चाहिए निसदिन हक अर्स में, और इत हक खिलवत । होए निमख न न्यारे इन दिल, जेती अर्स न्यामत ॥२॥
बरनन किया हक सूरत का, रूह देख्या चाहे फेर फेर । एही अर्स दिल रूह के, बैठे सिनगार कर ॥३॥
अब निस दिन रूह को चाहिए, फेर सब अंग देखे नजर । सूरत छबि सलूकी, देखों भूखन अंग वस्तर ॥४॥
सिनगार किया सब दुलहे, वस्तर या भूखन । अब बखत हुआ देखन का, देखों रूह के नैनन ॥५॥
सब अंग देखों फेरके, और देखों सब सिनगार । काम हुआ अपनी रूह का, देख देख जाऊं बलिहार ॥६॥
रूह चाहे बका सरूप की, करके नेक बरनन । देखों सोभा सिनगार, पेहेनाए वस्तर भूखन ॥७॥
कलंगी दुगदुगी पगड़ी, देख नीके फेर कर । बैठ खिलवत बीच में, खोल रूह की नजर ॥८॥
पेहेले देख पाग सलूकी, माहें कई बिध फूल कटाव । जोत करी है किन बिध, जानों के नकस नंग जड़ाव ॥९॥
देख कलंगी जोत सलूकी, जेता अर्स अवकास । सो सारा ही तेज में, पूरन भया प्रकास ॥१०॥
और खूबी इन कलंगी, और दुगदुगी सलूक । और पाग छबि रूह देख के, होए जात नहीं भूक भूक ॥११॥
देख सुन्दर सरूप धनीय को, ले हिरदे कर हेत । देख नैन नीके कर, सामी इसारत तोको देत ॥१२॥
नैन रसीले रंग भरे, भौं भृकुटी बंकी अति जोर । भाल तीखी निकसे फूटके, जो मारत खैंच मरोर ॥१३॥
हँसत सोभित हरवटी, अंग भूखन कई विवेक । मुख बीड़ी सोभित पान की, क्यों बरनों रसना एक ॥१४॥
लाल रंग मुख अधुर, तंबोल अति सोभाए । ए लालक हक के मुख की, मेरे मुख कही न जाए ॥१५॥
गौर मुख अति उज्जल, और जोत अतंत । ए क्यों रहे रूह छबि देख के, ऐसी हक सूरत ॥१६॥
अति उज्जल मुख निलवट, सुन्दर तिलक दिए । अति सोभित है नासिका, सब अंग प्रेम पिए ॥१७॥
निलवट चौक चारों तरफों, रंग सोभित जोत अपार । निरख निरख नेत्र रूह के, सब अंग होए करार ॥१८॥
देख निलवट तिलक, मुख भौं भासत अति सुन्दर । सब अंग दृढ़ करके, ले रूह के नैनों अन्दर ॥१९॥
नैन निलवट बंकी छबि, अति चंचल तेज तारे । रंग भीने अति रस भरे, बका निसबत रूह प्यारे ॥२०॥
ए रस भरे नैन मासूक के, आसिक छोड़े क्यों कर । कई कोट गुन कटाख्य में, रूह छोड़ी न जाए नजर ॥२१॥
जो देवें पल आड़ी मासूक, तो जानों बीच पड़यो ब्रह्मांड । रूह अन्तराए सहे ना सरूप की, ए जो दुलहा अर्स अखंड ॥२२॥
नैन सुख देत जो अलेखे, मीठे मासूक के प्यारे । मेहेर भरे सुख सागर, रूह तर न सके तारे ॥२३॥
मीठे लगें मरोरते, मीठी पांपण लेत चपल । फिरत अनियारे चातुरी, मान भरे चंचल ॥२४॥
बीड़ी लेत मुख हाथ सों, सोभित कोमल हाथ मुंदरी । लेत अंगुरियां छबिसों, बलि जाऊं सबे अंगुरी ॥२५॥
बीड़ी मुख आरोगते, अधुर देखत अति लाल । हँसत हरवटी सोभा सुन्दर, नेत्र मुख मछराल ॥२६॥
अधबीच आरोगते, वचन केहेत रसाल । नैन बान चलावत सेहेजे, छाती छेद निकसत भाल ॥२७॥
मोरत पान रंग तंबोल, मानों झलके माहें गाल । जो नैनों भर देखिए, रूह तबहीं बदले हाल ॥२८॥
मरकलड़े मुख बोलत, गौर हरवटी हँसत । नैन श्रवन निलवट नासिका, मानों अंग सबे मुसकत ॥२९॥
जोत धरत चित्त चाहती, चित्त चाही नरम लगत । कई रंग करें चित्त चाहती, खुसबोए करत अतंत ॥३०॥
चित्त चाहे सुख देत हैं, लाल मोती कानन । देख देख जाऊं वारने, ए जो भूखन चेतन ॥३१॥
सुपन सरूप जिन बिध के, पेहेनत हैं भूखन । सो तो अर्स में है नहीं, जो सिनगार करें बिध इन ॥३२॥
नए सिनगार जो कीजिए, उतारिए पुरातन । नया पुराना पेहेन उतारना, ए होत सुपन के तन ॥३३॥
ए बारीक बातें अर्स की, सो जानें अरवा अरसै के । नया पुराना घट बढ़, सो कबूं न अर्स में ए ॥३४॥
अर्स में सदा एक रस, करें पल में कोट सिनगार । चित्त चाहे अंगों सब देखत, नया पेहेन्या न जूना उतार ॥३५॥
ज्यों अंग त्यों वस्तर भूखन, करें कोट रंग चित्त चाहे । अर्स जूना न कबूं कोई रंग, देखत पल में नित नए ॥३६॥
देत खुसबोए खुसाली, श्रवनों अति सुन्दर । बात सुनत मेरी रीझत, सुख पावत रूह अन्दर ॥३७॥
जो अटकों इन अंग में, तो जाए न सकों छोड़ कित । गुझ गुन कई श्रवन के, रूह इतहीं होवे गलित ॥३८॥
जामा अंग जवेर का, भूखन नंग कई रंग । जोत पोहोंचे आकास में, जाए करत मिनो मिने जंग ॥३९॥
याही विध जामा पटुका, याही विध पाग वस्तर । करें चित्त चाहे अंग रोसनी, अनेक जोत अंग धर ॥४०॥
जामा पटुका चोली बांहें की, चीन मोहोरी बन्ध बगल । ए आसिक अंग देख के, आगूं नजर न सके चल ॥४१॥
चोली अंग को लग रही, हार लटके अंग हलत । तले हार बीच दुगदुगी, नेहेरे लेहेरें जोत चलत ॥४२॥
बगलों बेली फूल खभे, गिरवान बेली जर । पीछे कटाव जो कोतकी, रूह छोड़ न सके क्योंए कर ॥४३॥
कहें हार हम हैड़े पर, अति बिराजे अंग लाग । सुख देत हक सूरत को, ए कौन हमारो भाग ॥४४॥
कण्ठ हार नंग सब चेतन, देख सोभा सब चढ़ती देत । ए सुख रूह सो जानहीं, जो सामी हक इसारत लेत ॥४५॥
ए जंग रूह देख्या चाहे, मिल जोतें जोत लरत । कई नंग रंग अवकास में, मिनों मिने जंग करत ॥४६॥
जोत अति जवेरन की, बांहों पर बाजू बन्ध । जात चली जोत चीर के, कई विध ऐसी सनन्ध ॥४७॥
हाथ काड़ों कड़ी पोहोंचियां, जानों ए जोत इनथें अतन्त । जोत सागर आकास में, कोई सके ना इत अटकत ॥४८॥
बाजु बन्ध पोहोंची कड़ी, ए भूखन सोभा अपार । नरम हाथ लीकें हथेलियां, क्यों आवे सोभा सुमार ॥४९॥
जुदे जुदे रंगों जोत चले, ए जो नंग हाथ मुंदरी । ए तेज लेहेरें कई उठत हैं, ज्यों ज्यों चलवन करें अंगुरी ॥५०॥
क्यों कहूं जोत नखन की, ए सबथें अति जोर । जानों तेज सागर अवकास में, सबको निकसे फोर ॥५१॥
रंग देखूं के सलूकी, छबि देखूं के नरम उज्जल । जो होए कछुए इस्क, तो इतथें न निकसे दिल ॥५२॥
कैसी नरम अंगुरियां पतली, देख सलूकी तेज । आसमान रोसनी पोहोंचाए के, मानों सूर जिमी भरी रेजा रेज ॥५३॥
जो जोत समूह सरूप की, सो नैनों में न समाए । जो रूह नैनों में न समावहीं, सो जुबां कहयो क्यों जाए ॥५४॥
यों वस्तर भूखन अंग चेतन, सब लेत आसिक जवाब । केहे सब का लेऊं पड़-उत्तर, ए नहीं रूह मिने ख्वाब ॥५५॥
रद बदल भूखन सों, और करे वस्तरों सों । और अंग लग जाए ना सके, फारग न होए इनमों ॥५६॥
ए वस्तर भूखन हक के, सो सारे ही चेतन । सब जवाब लिया चाहिए, आसिक एही लछन ॥५७॥
आसिक रूह जित अटकी, अंग भूखन या वस्तर । यासों लगी गुफ्तगोए में, सो छूटे नहीं क्योंए कर ॥५८॥
इस्क बसे सब अंग में, सब बिध देत हैं सुख । कई सुख हर एक अंग में, सो कहयो न जाए या मुख ॥५९॥
प्रेम लिए सोभा गुन, सब सुख देत पूरन । या वस्तर या भूखन, सुख जाहेर या बातन ॥६०॥
सुख इस्क हक जात के, तिनसे अंग सुखदाए । बाहेर सुख सब अंग में, ए सुख जुबां कहयो न जाए ॥६१॥
अंग वस्तर या भूखन, सब सुख दिया चाहे । कई सुख जाहेर कई बातन, सब मिल प्रेम पिलाए ॥६२॥
इस्क देवें लेवें इस्क, और ऊपर देखावें इस्क । अर्स इस्क जरे जरा, ए जो सूरत इस्क अंग हक ॥६३॥
एक अंग जिन देख्या होए, सो पल रहे न देखे बिगर । हुई बेसकी इन सरूप की, रूह अंग न्यारी रहे क्यों कर ॥६४॥
सब अंग दिल में आवते, बेसक आवत सूरत । हाए हाए रूह रेहेत इत क्यों कर, आए बेसक ए निसबत ॥६५॥
चारों जोड़े चरन के, ए जो अर्स भूखन । ए लिए हिरदे मिने, आवत सरूप पूरन ॥६६॥
जो सोभावत इन चरन को, ए भूखन सब चेतन । अनेक गुन याके जाहेर, और अलेखे बातन ॥६७॥
नंग नरम जोत अतंत, और अतंत खुसबोए । ए भूखन चरनों सोभित, बानी चित्त चाही बोलत सोए ॥६८॥
गौर चरन अति सोभित, और सिनगार भूखन सोभित । ए अंग संग न्यारे न कबहूं, अति बारीक समझन इत ॥६९॥
एही ठौर आसिकन की, अर्स की जो अरवाहें । सो चरन तली छोड़ें नहीं, पड़ी रहें तले पाए ॥७०॥
अर्स रूहें आसिक इनकी, जिन पायो पूरन दाव । ठौर ना और रूहन को, जाको लगे कलेजे घाव ॥७१॥
कई रंग नंग वस्तर भूखन, चढ़ी आकास जोत लेहेर । जो जोत नख चरन की, मानों चीर निकसी नेहेर ॥७२॥
केहेती हों इन जुबांन सों, और सुपन श्रवन नजर । जो नजरों सूरज ख्वाब के, सो सिफत पोहोंचे क्यों कर ॥७३॥
कट चीन झलके दावन, बैठ गई अंग पर । कई रंग नंग इजार में, सो आवत जाहेर नजर ॥७४॥
और भूखन जो चरन के, सो अति धरत हैं जोत । नरम खुसबोए स्वर माधुरी, आसमान जिमी उद्दोत ॥७५॥
पांउं तली नरम उज्जल, लीकें एड़ी लांक लाल । ए रूह आसिक से क्यों छूटहीं, ए कदम नूर जमाल ॥७६॥
तली हथेली हाथ पांऊं की, लाल अति उज्जल । और बीसों अंगुरियां नरम पतली, नख नरम निरमल ॥७७॥
काड़े कोमल हाथ पांउं के, फने पीड़ी अंग माफक । उज्जल अति सोभा लिए, ए सूरत सोभा नित हक ॥७८॥
रंग रस इंद्री नौतन, चढ़ता अंग नौतन । तेज जोत सोभा नौतन, नौतन चढ़ता जोवन ॥७९॥
छब फब मुख सनकूल, चढ़ती कला देखाए । कायम अंग अर्स के, सब चढ़ता नजरों आए ॥८०॥
ए अंग सब अर्स के, अर्स वस्तर भूखन । अर्स जरे जवेर को, सिफत न पोहोंचे सुकन ॥८१॥
सब अंग इस्क के, गुन अंग इन्द्री इस्क । सब्द न पोहोंचे सिफत, इन बिध सूरत हक ॥८२॥
केहे केहे दिल जो केहेत है, ताथें अधिक अधिक अधिक । सोभा इस्क बका तन की, ए मैं केहे न सकों रंचक ॥८३॥
अब लग जानती अर्स के, हेम नंग लेत मिलाए । पैदास भूखन इन विध, वे पेहेनत हैं चित्त चाहे ॥८४॥
एक ले दूजा मिलावहीं, तब तो घट बढ़ होए । सो तो अर्स में हैं नहीं, वाहेदत में नहीं दोए ॥८५॥
घड़े जड़े ना समारे, ना सांध मिलाई किन । दिल चाहे नंगों के असल, वस्तर या भूखन ॥८६॥
ना पेहेन्या ना उतारिया, दिल चाह्या सब होत । जब जित जैसा चाहिए, सो उत आगूं बन्या ले जोत ॥८७॥
जो रूह कहावे अर्स की, माहें बका खिलवत । सो जिन खिन छोड़े सरूप को, कहे उमत को महामत ॥८८॥
॥ प्रकरण ॥१०॥ चौपाई ॥८८७॥
