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सागर - प्रकरण ११

श्री सुन्दर साथ को सिनगार

सुन्दर साथ बैठा अचरज सों, जानों एकै अंग हिल मिल । अंग अंग सब के मिल रहे, सब सोभित हैं एक दिल ॥१॥

जानो मूल मेला सब एक मुख, सब एक सोभित सिनगार । सागर भरया सब एक रस, माहें कई बिध तरंग अपार ॥२॥

निलवट बेना चांदलो, हरी गरदन मुख मोर । नैन चोंच सिर सोभित, बीच बने तरफ दोऊ जोर ॥३॥

निरमल मोती नासिका, कई बिध नथ बेसर । जोत जोर नंग मिहीं नकस, ए बरनन होए क्यों कर ॥४॥

सोभित हैं सबन के, कानन झलकत झाल । माहें मोती नंग निरमल, झांई उठत माहें गाल ॥५॥

चार चार हार सबन के, उर पर अति झलकत । कण्ठ सरी कण्ठन में, सबन के सोभित ॥६॥

एक हार हीरन का, दूजा हेम कंचन । तीजो हार मानिक को, चौथा हार मोतियन ॥७॥

कहूं डोरे कहूं बादले, कहूं खजूरे हार । कहा कहूं जवेर अर्स के, झलकारों झलकार ॥८॥

हाथ चूड़ी नंग नवघरी, अंगूठिएं झलकत नंग । उज्जल हाथ हथेलियां, पोहोंचों पोहोंची नंग कई रंग ॥९॥

जैसे सरूप अर्स के, भूखन तिन माफक । याही रवेस वस्तर जवेर के, ए अंग बड़ी रूह हक ॥१०॥

जैसी सोभा भूखन की, कहूं तैसी सोभा वस्तर । कछू पाइए सोभा सरूप की, जो खोले रूह नजर ॥११॥

वस्तरों के नंग क्यों कहूं, कई जवेरों जोत । सबे भई एक रोसनी, जानों गंज अंबार उद्दोत ॥१२॥

अतन्त नंग अर्स के, और नरम जवेर अतन्‍त । अतन्त अर्स रसायन, खूबी खुसबोए अति बेहेकत ॥१३॥

कहूं केते नाम जवेरन के, रसायन नाम अनेक । कई नाम भूखन एक अंग, सो कहां लग कहूं विवेक ॥१४॥

सूरत सकल साथ की, मुख कोमल सुन्दर गौर । ए छबि हिरदे तो फबे, जो होवे अर्स सहूर ॥१५॥

रूहें सुन्दर सनकूल मुख, नहीं सोभा को पार । घट बढ़ कोई न इनमें, एक रस सब नार ॥१६॥

कई रंग सोभित साड़ियां, रंग रंग में कई नंग सार । भिन्न भिन्न झलके एक जोत, कई किरनें उठें बेसुमार ॥१७॥

हर एक के सिनगार, तिन सिनगार सिनगार कई नंग । नंग नंग में कई रंग हैं, तिन रंग रंग कई तरंग ॥१८॥

तरंग तरंग कई किरनें, कई रंग नंग किरनें न समाए । यों जोत सागर सरूपों को, रहयो तेज पुन्ज जमाए ॥१९॥

अब इनके अंग की क्यों कहूं, ठौर नहीं बोलन । क्यों कहूं सोभा अखण्ड की, बीच बैठ के अंग सुपन ॥२०॥

रंग तरंग किरने कही, कही तेज जोत जुबां इन । प्रकास उद्दोत सब सब्द में, जो कहया नूर रोसन ॥२१॥

ज्यों ज्यों बैठियां लग लग, त्यों त्यों अरस-परस सुख देत । बीच कछू ना रेहे सके, यों खैंच खैंच ढिग लेत ॥२२॥

जानों सागर सब एक जोत में, नूर रोसन भर पूरन । झांई झलके तेज दरियाव ज्यों, कई उठे तरंग भिन्न भिन्न ॥२३॥

ऊपर तले की रोसनी, और वस्तर भूखन की जोत । और जोत सरूपों की क्यों कहूं, ए जो ठौर ठौर उद्दोत ॥२४॥

ऊपर तले थम्भ दिवालों, सब जोत रही भराए । बीच समूह जोत साथ की, बनी जुगल जोत बीच ताए ॥२५॥

ए जोत में सोभा सुन्दर, और सरूपों की सुखदाए । देख देख के देखिए, ज्यों नख सिख रहे भराए ॥२६॥

ज्यों दरिया तेज जोत का, त्यों सब दिल दरिया एक । एक रस एक रोसनी, जुबां क्यों कर कहे विवेक ॥२७॥

जोत उपली कही जुबांन सों, पर रेहेस चरित्र सुख चैन । सुख परआतम तब पाइए, जब खुलें अन्तर के नैन ॥२८॥

एक रस होइए इस्क सों, चलें प्रेम रस पूर । फेर फेर प्याले लेत हैं, स्याम स्यामाजी हजूर ॥२९॥

क्यों कहूं सुख सबन के, सब अंगों के एक चित्त । अरस-परस सुख लेवहीं, अंग नए नए उपजत ॥३०॥

साथ समूह की क्यों कहूं, जाको इस्कै में आराम । अरस-परस सब एक रस, पिउ विलसत प्रेम काम ॥३१॥

इन धाम के जो धनी, तिन अंगों का सनेह । हेत चित्त आनन्द इनका, क्यों कहूं जुबां इन देह ॥३२॥

सुख अन्तर अन्तस्करन के, आवें नहीं जुबांन । प्रेम प्रीत रीत अन्तर की, सो क्यों कर होए बयान ॥३३॥

सत सरूप जो धाम के, तिनके अन्तस्करन । इस्क तिनके अंग का, सो कछुक करूं बरनन ॥३४॥

नख सिख अंग इस्क के, इस्कै संधों संध । रोम रोम सब इस्क, क्यों कर कहूं सनंध ॥३५॥

अन्तस्करन इस्क के, इस्कै चित्त चितवन । बातां करें इस्क की, कछू देखें ना इस्क बिन ॥३६॥

तत्व गुन अंग इंद्रियां, सब इस्कै के भीगल । पख सारे इस्क के, सब इस्क रहे हिल मिल ॥३७॥

ए सुख संग सरूप के, जो अन्तर अंदर इस्क । आतम अन्तस्करन विचारिए, तो कछू बोए आवे रंचक ॥३८॥

जो कोई आतम धाम की, इत हुई होए जाग्रत । अंग आया होए इस्क, तो कछू बोए आवे इत ॥३९॥

पिउ नेत्रों नेत्र मिलाइए, ज्यों उपजे आनन्द अति घन । तो प्रेम रसायन पीजिए, जो आतम थें उतपन ॥४०॥

आतम अन्तस्करन विचारिए, अपने अनुभव का जो सुख । बढ़त बढ़त प्रेम आवहीं, परआतम सनमुख ॥४१॥

इतथें नजर न फेरिए, पलक न दीजे नैन । नीके सरूप जो निरखिए, ज्यों आतम होए सुख चैन ॥४२॥

तब प्रेम जो उपजे, रस परआतम पोहोंचाए । तब नैन की सैन कछू होवहीं, अन्तर आंखां खुल जाए ॥४३॥

अन्तस्करन आतम के, जब ए रहयो समाए । तब आतम परआतम के, रहे न कछू अन्तराए ॥४४॥

परआतम के अन्तस्करन, पेहेले उपजत है जे । पीछे इन आतम के, आवत है सुख ए ॥४५॥

ताथें हिरदे आतम के लीजिए, बीच साथ सरूप जुगल । सुरत न दीजे टूटने, फेर फेर जाइए बल बल ॥४६॥

सोभा मुखारबिन्द की, क्यों कर कहूं तेज जोत । रस भरयो रसीलो दुलहा, जामें नित नई कला उद्दोत ॥४७॥

कमी जो कछुए होवहीं, तो कहिए कला अधिकाए । ए तो बढ़े तरंग रंग रस के, यों प्रेमे देत देखाए ॥४८॥

बल बल सोभा सरूप की, बल बल वस्तर भूखन । बल बल मीठी मुसकनी, बल बल जाऊं खिन खिन ॥४९॥

बल बल बंकी पाग के, बल बल बंके नैन । बल बल बंके मरोरत, बल बल चातुरी चैन ॥५०॥

बल बल तिरछी चितवनी, बल बल तिरछी चाल । बल बल तिरछे वचन के, जिन किया मेरा तिरछा हाल ॥५१॥

बल बल छबीली छब पर, दंत तंबोल मुख लाल । बल बल आठों जाम की, बल बल रंग रसाल ॥५२॥

बल बल मीठे मुख के, अंग अंग अमी रस लेत । कई बिध के सुख देत हैं, पल पल में कर हेत ॥५३॥

बल बल जाऊं चरन के, बल बल हस्त कमल । बल बल नख सिख सब अंगों, बल बल जाऊं पल पल ॥५४॥

बल बल पियाजी के प्रेम पर, बल बल चितवन हेत । महामत बल बल सबों अंगों, फेर फेर वारने लेत ॥५५॥

॥ प्रकरण ॥११॥ चौपाई ॥९४२॥

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