सागर - प्रकरण १२
सागर पांचमा इस्क का
पांचमा सागर पूरन, गेहेरा गुझ गंभीर । प्याले इस्क दरियाव के, पीवें अर्स रूहें फकीर ॥१॥
इन रस को ए सागर, पूरन जुगल किसोर । ए दरिया सुख पांचमा, लेहेरी आवत अति जोर ॥२॥
अति सुख बड़ी रूह को, इस्क तरंग अतंत । मुख मीठी अपनी रूह को, रस रसना पिलावत ॥३॥
हेत कर इन रूहन की, प्यार सों बात सुनत । सो वचन अन्दर लेय के, मुख सामी बान बोलत ॥४॥
नैनों नैन मिलाए के, अमीरस सींचत । अपने अंग रूहें जान के, नेह नए नए उपजावत ॥५॥
सुख केते कहूं स्यामाजीय के, हक सुख बिना हिसाब । ए सुख सोई जानहीं, जो पिए इन साकी सराब ॥६॥
रस भरी अति रसना, अति मीठी वल्लभ बान । ए सुख कह्यो न जावहीं, जो सुख देत जुबांन ॥७॥
कई सुख मीठी बान के, हक देत कर प्यार । ज्यों मासूक देत आसिक को, एक तन यार को यार ॥८॥
नैन रसीले रंग भरे, प्रेम प्रीत भीगल । देत हैं जब हेत सुख, चुभ रेहेत रूह के दिल ॥९॥
इस्क प्याला रंग रस का, जब देत नैन मरोर । फूल पोहोंचे तालू रूह के, कायम चढ़ाव होत जोर ॥१०॥
कई सुख अंग सरूप के, कई सुख रंग रसाल । कई सुख मीठी जुबांन के, कै प्याले देत रस लाल ॥११॥
कई सुख अमृत सींचत, ज्यों रोप सींचत बनमाली । इन बिध नैनों सींचत, रूह क्यों न लेवे गुलाली ॥१२॥
जो कछू बोले रूह मुखथें, सो नीके सुने हक कान । ऐसा मीठा जवाब तोहे देवहीं, कोई न सुख इन समान ॥१३॥
अरस-परस सुख देवहीं, नाहीं इन सुख को पार । ए रस इस्क सागर को, अर्स रूहें पीवें बारंबार ॥१४॥
ए सुख सागर पांचमा, इस्क सागर दिल हक । पेहेले चार देखें सागर, कोई ना हक दिल माफक ॥१५॥
हकें तोहे खेल देखाइया, बेवरा वास्ते इस्क । क्यों न देखो पट खोल के, नजर खोली है हक ॥१६॥
इन ठौर बैठे देखाइया, साहेबी हक बुजरक । पैठ हक दिल बीच में, पी प्याले इस्क ॥१७॥
तो हकें कहया अर्स अपना, इस्क दिल मोमिन । सो इस्क करे जाहेर, दिल पैठ हक के तन ॥१८॥
इस्क गुझ दिल हक का, सो करे जाहेर माहें खिलवत । सो खिलवत ल्याए इत आसिक, करी इस्कें जाहेर न्यामत ॥१९॥
इत दुनियां चौदे तबक में, एक दम उठत है जे । जो हक सहूर कर देखिए, तो सब वास्ते इस्क के ॥२०॥
ए इस्क सब हक का, अर्स हादी रूहों सों । ए अर्स दिल जाने मोमिन, जो हक की वाहेदत मों ॥२१॥
ए किया एतेही वास्ते, तुमारे दिल उपजाया एह । ए खेल में देखे जुदे होए, लेने मेरा इस्क सनेह ॥२२॥
ए इस्क सागर अपार है, वार न पाइए पार । ए लेहेरी इस्क सागर की, हक देवें सोहागिन नार ॥२३॥
जो हक तोहे अन्तर खोलावहीं, तो आवे हक लज्जत । और बड़े सुख कई अर्स के, पर ए निपट बड़ी न्यामत ॥२४॥
लेहेरी इस्क सागर की, जो तूं लेवे रूह इत । तो तूं देखे सुख इस्क के, ए होए ना बिना निसबत ॥२५॥
और सुख इन लेहेरन को, आवत खिलवत याद । इन हक इस्क सागर की, कई नेहेरें सुख स्वाद ॥२६॥
यों सुख इस्क सागर को, धनी प्यारें देत रूहन । सो इत देखाए मेहेर कर, जो इस्कें किए रोसन ॥२७॥
जो सुख इस्क सागर को, माहें हेत प्रीत तरंग । ए जो अर्स अरवाहों को, आए खिलवत के रस रंग ॥२८॥
जो हक तोहे देवें हिंमत, तो रूह तूं पी सराब । ए कायम मस्ती अर्स की, जो साकी पिलावे आब ॥२९॥
सुख हक इस्क के, जिनको नाहीं सुमार । सो देखन की ठौर इत है, जो रूह सों करो विचार ॥३०॥
जेते सुख इस्क के, लेते अर्स के माहें । सो देखन की ठौर एह है, और ऐसा न देख्या क्यांहें ॥३१॥
कबूं अर्स में न होए जुदागी, ना जुदागी ए न्यामत । ए बातें दोऊ अनहोनिया, सो हक हम वास्ते करत ॥३२॥
इस्क पाइए जुदागिएं, सो तुम पाई इत । वतन हकीकत सब दई, ऐसा दाव न पाइए कित ॥३३॥
फेर कब जुदागी पाओगे, छोड़ के हक अर्स । बैठे खेल में पिओगें, हक इस्क का रस ॥३४॥
याद करो इस्क को, कायम अर्स में लेते जो सुख । अलेखे अनगिनती, सो देत लज्जत माहें दुख ॥३५॥
जो सहूर करो तुम दिल से, खेल में किए बेसक । तो फुरसत न पाओ दम की, सुख इस्क गिनती हक ॥३६॥
ए किया तुमारे वास्ते, जो धनी खोले नजर एह । तो कई देखो माहें बातून, हक का प्रेम सनेह ॥३७॥
ए नजर तुमें तब खुले, जो पूरन करें हक मेहेर । तो एक हक के इस्क बिना, और देखो सब जेहेर ॥३८॥
हकें मेहेर बिध बिध करी, पर किन किन खोली न नजर । सो भी वास्ते इस्क के, करसी बातें हाँसी कर ॥३९॥
खेल बनत याही बिध, एक भागे एक लरे । इनकी हाँसी बड़ी होएसी, जब घरों बैठ बातां करे ॥४०॥
ए खेल सोई हाँसी सोई, और सोई हक का इस्क । सो सब वास्ते हाँसीय के, जो इत तुमें किए बेसक ॥४१॥
जो देखे इत आंखां खोल के, तो देखे हक का इस्क अपार । सोई हाँसी देखे आप पर, तो क्यों कहूं औरों सुमार ॥४२॥
मैं बोहोत हाँसी देखी आप पर, अनगिनती हक इस्क । इलम धनी के देखाइया, मैं दोऊ देखे बेसक ॥४३॥
मोको धनिएँ देखाइया, सब इस्क चौदे तबक । इत जरा न बिना इस्क, अपना ऐसा देखाया हक ॥४४॥
जो जागो सो देखियो, मेरी तो निसां भई । रूह देखे सो दिल लग न आवहीं, तो क्यों सके जुबां कही ॥४५॥
ए तो केहेती हों खेल का, और कहा कहूं अर्स की इत । अर्स का इस्क तो कहों, जो ठौर जरे की पाऊं कित ॥४६॥
मोमिन होए सो समझियो, ए बीतक कहे महामत । अब बात न रही बोलन की, कहया चलते जान निसबत ॥४७॥
॥ प्रकरण ॥१२॥ चौपाई ॥९८९॥
