सागर - प्रकरण १३
सागर छठा खुदाई इलम का
सागर छठा है अति बड़ा, जो खुदाई इलम । जरा सक इनमें नहीं, जिनमें हक हुकम ॥१॥
जेता तले हुकम के, ए जो कादर की कुदरत । ए सब बेसक तोलिया, सक न पाइए कित ॥२॥
आसमान जिमी के बीच में, बेसक हुता न कोए । जब लग सक दुनियां मिने, तो कायम क्यों कर होए ॥३॥
अव्वल से आखिर लग, इत जरा न कहूं सक । रूहअल्ला के इलम से, हुए कायम चौदे तबक ॥४॥
इस्क काहूं ना हुता, तो नाम आसिक कह्या हक । सो बल इन कुंजीय के, पाया इस्क चौदे तबक ॥५॥
ए दुनियां पैदा किन करी, हुती न काहूं खबर । सो सक मेटी सबन की, इलम खुदाई आखिर ॥६॥
वेद और कतेब में, कहूं सुध न हुती मुतलक । खोल हकीकत मारफत, किन काढ़ी न सुभे सक ॥७॥
बड़े सात निसान आखिर के, जासों पाइए कयामत । खिताब हादी जाहेर कर, दई सबों को नसीहत ॥८॥
आजूज माजूज लेसी सबों, ऊगे सूरज मगरब । ईसा मारे दज्जाल को, एक दीन करसी सब ॥९॥
दाभा होसी जाहेर, मेंहेंदी मोमिनों इमामत । उड़ावे सूर असराफील, बेसक पाया बखत ॥१०॥
काफर और मुनाफक, हँसते थे महंमद पर । सोई दिन अब आए मिल्या, जो महंमदें कही थी आखिर ॥११॥
बसरी मलकी और हकी, कही महंमद तीन सूरत । करें सिफायत आखिर, खासल खास उमत ॥१२॥
करम-कांड और सरीयत, किन किन लई तरीकत । दुनियां चौदे तबक में, किन खोली ना हकीकत ॥१३॥
नासूत मलकूत लाए की, ना सुध थी जबरूत । नाम पढ़े जानत हैं, कहें बका लाहूत ॥१४॥
ए सुध न पाई काहूं ने, क्यों है कहां ठौर विध किन । खोज खोज चौदे तबक का, दिल हुआ न किन रोसन ॥१५॥
सो इलम खुदाई लदुन्नी, पोहोंच्या चौदे तबक । सो इतथें मेहेर पसरी, सबे हुए बेसक ॥१६॥
अव्वल कह्या फुरमान में, इत काजी होसी हक । करसी कायम सबन को, ऐसी मेहेर होसी मुतलक ॥१७॥
ए खेल किया किन वास्ते, और हुआ किनके हुकम । ए सुध काहूं ना परी, कहां अर्स बका खसम ॥१८॥
गिरो रूहें फरिस्ते लैल में, किन वास्ते आए उतर । कुंन केहेते खेल पैदा किया, ए किनने किन खातिर ॥१९॥
किन कौल किया बीच अर्स के, अरवाहें जो मोमिन । सो पढ़े वेद कतेब को, ए खोली ना हकीकत किन ॥२०॥
ए इलमें सब विध समझे, सांचा इलम जो हक । सब मर मर जाते हुते, किए इलमें बका मुतलक ॥२१॥
क्यों सदर-तुल-मुन्तहा, क्यों है अर्स अजीम । क्यों कौल फैल हकके, क्यों हक सूरत हलीम ॥२२॥
क्यों अर्स आगूं जोए है, क्यों अर्स ढ़िग है ताल । क्यों पसु पंखी अर्स के, क्यों बाग लाल गुलाल ॥२३॥
क्यों खासल खास उमत, बीच नूरतजल्ला जे । क्यों खास उमत दूसरी, जो कही बीच नूर के ॥२४॥
ए नाम निसान सब लिखे, खुसबोए जिमी उज्जल । और कहया पानी दूध सा, ताल जोए का जल ॥२५॥
जोए किनारे जरी दयोहरी, पूर जवेर दरखत । ए नाम निसान सबे लिखे, पर कोई पावे ना हकीकत ॥२६॥
नेक नेक निसान केहेत हों, वास्ते साहेदी महंमद । ए पट खुल्या नूर पार का, कहों कहां लग कहूं न हद ॥२७॥
इलम खुदाई लदुन्नी, रूह अल्ला ल्याए इत। उमियों पट खोल बका मिने, बैठाए कर निसबत ॥२८॥
ए बल इन कुंजीय का, काहूं हुता न एते दिन । रूहअल्ला पैगाम उमत को, द्वार खोल्या बका वतन ॥२९॥
ए कायम अर्स अपार है, जो कहावत है वाहेदत । कोई पोहोंचे न अर्स रूहों बिना, जिनकी ए निसबत ॥३०॥
ए बल देखो कुंजीय का, जिन बेवरा किया बेसक । ए भी बेवरा देखाइया, जो गैब खिलवत का इस्क ॥३१॥
ए बल देखो कुंजी का, जिन देखाई निसबत । ए जो रूहें जात हक की, जिन बेसक देखी वाहेदत ॥३२॥
ए बल देखो कुंजीय का, खूब देखी हक सूरत । हक के दिल के भेद जो, सो इलमें देखी मारफत ॥३३॥
कहा कहूं बल कुंजीय का, रूहें बड़ी रूह निसबत । और हक बड़ी रूह रूहन की, इन इलमें देखी खिलवत ॥३४॥
ए बल देखो कुंजीय का, नीके देख्या हक इस्क । जुदे बैठाए लिखी इसारतें, जासों समझे रूह बेसक ॥३५॥
ए बल देखो इन कुंजीय का, बातें छिपी हक दिल की । सो सब समझी जात हैं, हैं अर्स की गुझ जेती ॥३६॥
देखो बल इन कुंजीय का, ए जो लिखी रमूजें हक । आखिर रसूल होए आवहीं, दे इलम खोलावें बेसक ॥३७॥
ए बल देखो कुंजीय का, रूहें बैठाई जुदी कर । आप केहे संदेसे कहावहीं, आप ल्यावें जुदे नाम धर ॥३८॥
बल क्यों कहूं इन कुंजीय का, जो हक दिल गुझ इस्क । तिन दरियाव की नेहेरें, उतरी नासूत में बेसक ॥३९॥
बल कहा कहूं कुंजीय का, ए जो झूठा खेल रंचक । सो रूहों सांच कर देखाइया, बन्ध बांधे कई बुजरक ॥४०॥
ए बल देखो कुंजीय का, रूहें बीच चौदे तबक के आए । सो इलमें देखाया झूठ कर, बीच अर्स के बैठाए ॥४१॥
इन हक का इस्क दुनी मिने, न पाइए लदुन्नी बिन । बिना इस्क न इलम आवहीं, दोऊ तौले अरस परस बजन ॥४२॥
ए कुंजी बल अपार है, जिनसों पाया अपार । लिया हक दिल गुझ इस्क, जिनको काहूं न सुमार ॥४३॥
ए इलम कुंजी अर्स की, रूह अल्ला ल्याए हकपें । माहें कई गुझ हक दिल की, सो सब देखी इन कुंजी सें ॥४४॥
आसमान जिमी के बीच में, बातें बिना हिसाब । तिनमें बातें जो हक की, सो लिखी मिने किताब ॥४५॥
या जाहेर या बातून, रमूजें या इसारत। सो खोल्या सब इन कुंजिएं, हकीकत या मारफत ॥४६॥
अव्वल से आखिर लग, किया कुंजिएं सब का काम । हैयाती चौदे तबकों, दई कायम भिस्त तमाम ॥४७॥
कहूं दुनियां चौदे तबक में, कह्या न हक का एक हरफ । तो हक सूरत क्यों केहेवहीं, किन पाई न बका तरफ ॥४८॥
तिन हक के दिल का गुझ जो, सो कुंजिएं खोल्या इन । तो बात दुनी की इत कहां रही, कुंजी ऐसी नूर रोसन ॥४९॥
सदर-तुल-मुंतहा अर्स अजीम, जबरूत या लाहूत । इत जरा सक कहूं ना रही, ए बल कुंजी कूवत ॥५०॥
अर्स अजीम के बाग जो, हौज जोए जानवर । इत सक जरा न काहू में, मोहोलात या अन्दर ॥५१॥
इन अर्सों की भी क्या कहूं, इन कुंजी अतन्त बूझ । और बात इत कहां रही, काढ़या हक के दिल का गुझ ॥५२॥
महामत कहे ए मोमिनों, ए ऐसी कुंजी इलम । ए मेहेर देखो मेहेबूब की, तुमको पढ़ाए आप खसम ॥५३॥
॥ प्रकरण ॥१३॥ चौपाई ॥१०४२॥
