सागर - प्रकरण १४
सागर सातमा निसबत का
अब कहूं दरिया सातमा, जो निसबत भरपूर । याको वार न पार काहूं, जो नूर के नूर को नूर ॥१॥
बेसुमार ल्याए सुमार में, ए जो करत हों मजकूर । क्यों आवे बीच हिसाब के, जो हक अंग सदा हजूर ॥२॥
खूबी क्यों कहूं निसबत की, वास्ते निसबत खुली हकीकत । तो पाई हक मारफत, जो थी हक निसबत ॥३॥
निसबत असल सबन की, जित निसबत तित सब । सब निसबत के वास्ते, इलमें जाहेर किए अब ॥४॥
निसबत हक की जात है, निसबत में इस्क । निसबत वास्ते इलम, इत आया बेसक ॥५॥
ए हकें किया इस्क सों, कई बंध बांधे जहूर । सो जानत हैं निसबती, जो खिलवत हुई मजकूर ॥६॥
हकें निसबत वास्ते, कई बंध बांधे माहें खेल । सब सुख देने निसबत को, तीन बेर आए माहें लैल ॥७॥
अव्वल देखाया लैल में, निसबत जान इस्क । दूसरी बेर देखाइया, गुझ इस्क मुतलक ॥८॥
वास्ते निसबत बेर तीसरी, खेल देखाया हक । इलम बड़ाई इस्क, देख्या गुझ बका का बेसक ॥९॥
निसबत वास्ते इस्क, निसबत वास्ते इलम । खुसाली निसबत वास्ते, आखिर ल्याए खसम ॥१०॥
ए इलम अन्दर यों केहेत है, ए जो निसबत देखत दुख । इन दुख में बका अर्स के, हैं हक दिल के कई सुख ॥११॥
ए सुख सागर निसबत का, तिनका सुमार न आवे क्यांहें । सब हकें मपाए सागर, पर निसबत तौल कोई नाहें ॥१२॥
मापे गेहेरे सागर, जिनको थाह न देखे कोए । तिन हक दिल अन्दर पैठ के, मापे इस्क सागर सोए ॥१३॥
जो हक काहूं न पाइया, ना किन सुनिया कान । पाया न वा के अर्स को, जो कौन ठौर मकान ॥१४॥
सब बुजरकों ढूंढ़या, किन पाई न बका तरफ । दुनियां चौदे तबक में, किन कह्या न एक हरफ ॥१५॥
तिन हक दिल अन्दर पैठ के, माप्या सागर इस्क । इन हक के इलमें रोसनी, सब मापे सागर बेसक ॥१६॥
सो इस्क इलम सुख सागर, वास्ते आए निसबत । इन निसबत के तौल कोई, ल्याऊं कहां से हक न्यामत ॥१७॥
ए निसबत जो सागर, जानें निसबती मोमिन । कहूं थाह न गेहेरा सागर, कोई पावे न निसबत बिन ॥१८॥
तो क्यों कहूं जोड़ निसबत की, जो दीजे निसबत मान । निसबत हक की जात हैं, जो हक वाहेदत सुभान ॥१९॥
बोहोत लेहेरी इन सागर की, मेहेर इस्क इलम । सोभा तेज सुख कई बका, इन निसबत में जात खसम ॥२०॥
एह इलम ए इस्क, और निसबत कही जो ए । ए तीनों सिफत माहें मोमिनों, निसबत हक की जे ॥२१॥
किन पाया न इन इलम को, किन पाया ना ए इस्क । तो क्यों पावे ए निसबत, पेहेलें सूरत न पाई हक ॥२२॥
ए गुझ भेद हक रूहन के, हक दिल की भी और । ए जानें हक निसबती, जाको हक कदम तले ठौर ॥२३॥
जब देखों हक निसबत, तब एकै हक निसबत । और हक का हुकम, कछू ना हुकम बिना कित ॥२४॥
जो कोई हक के हुकम का, ताए जो इलम करे बेसक । लेवे अपनी मेहेर में, तो नेक दीदार कबूं हक ॥२५॥
पर कबूं दीदार ना निसबत का, ना काहूं को एह न्यामत । ए जुबां इन निसबत की, कहा करसी सिफत ॥२६॥
ए जो सरूप निसबत के, काहूं न देवें देखाए । बदले आप देखावत, प्यारी निसबत रखें छिपाए ॥२७॥
निमूना इन निसबत का, कोई नाहीं इन समान । ज्यों निमूना दूसरा, दिया न जाए सुभान ॥२८॥
क्यों दीजे निमूना इन का, जो कही हक की जात । निसबत इस्क इलम, ज्यों बिरिख फल फूल पात ॥२९॥
सब लगे हैं निसबत को, इस्क इलम हुकम । ना तो कैसे इत जाहेर होंए, हम तुम इस्क इलम ॥३०॥
ए सब निसबत वास्ते, जो कछू सब्द उठत । ए जो नजरों देखत, या जो कानों सुनत ॥३१॥
ज्यों हाथ पांउं सूरत के, मुख नेत्र नासिका कान । त्यों सब मिल एक सूरत, यों वाहेदत अंग सुभान ॥३२॥
अब कहा कहूं निसबत की, दिया न निमूना जात । और सब्द ना इन ऊपर, अब कहा कहूं मुख बात ॥३३॥
सिफत अलेखे निसबत, ज्यों सिफत अलेखे हक । सब्दातीत न आवे सब्द में, मैं कही इन बुध माफक ॥३४॥
कहिए सारी उमर लग, तो सिफत न आवे सुमार । ए दरिया निसबत का, याकी लेहेरें अखंड अपार ॥३५॥
ए बात बड़ी हक निसबत, सो झूठे खेल में नाहें । ए बात होत बका मिने, हक खिलवत के माहें ॥३६॥
जो खेल में खबर ना हक की, तो निसबत खबर क्यों होए । हक आसिक निसबत मासूक, वाहेदत में ना दोए ॥३७॥
ए बात सुने जो खेल में, बड़ा अचरज होवे तिन । किन पाई ना तरफ हक की, ए तो हक मासूक वतन ॥३८॥
तीन सूरत महंमद की, गुझ हक का जानें सोए । हक जानें या निसबती, और कोई जानें जो दूसरा होए ॥३९॥
वाहेदत की ए पेहेचान, अर्स दिल कह्या मोमिन । मासूक कह्या महंमद को, जो अर्स में याके तन ॥४०॥
महामत कहे ए मोमिनों, ए निसबत इस्क सागर । ल्यो प्याले हक हुकमें, पिओ फूल भर भर ॥४१॥
॥ प्रकरण ॥१४॥ चौपाई ॥१०८३॥
