सागर - प्रकरण २
सागर दूसरा रूहों की सोभा
हक बैठे रूहों मिलाए के, खेल देखावन काज । बड़ी भई रदबदल, रूहें बड़ी रूहसों राज ॥१॥
देखन खेल जुदागीय का, दिल में लिया रूहन । हक आप बैठे तखत पर, खेल रूहों को देखावन ॥२॥
देहेसत सबों जुदागीय की, पर खेल देखन की चाह । देखें पातसाही हककी, देखें इस्क बड़ा किन का ॥३॥
एह जोत जो जोत में, बैठियां ज्यों सब मिल । क्यों कहूं सोभा इन जुबां, बीच सुन्दर जोत जुगल ॥४॥
सुन्दर साथ भराए के, बैठियां सरूप एक होए । यों सबे हिल मिल रहीं, सरूप कहे न जावें दोए ॥५॥
एक सरूप होए बैठियां, माहें वस्तरों कई रंग । क्यों ए बरनन होवहीं, रंग रंग में कई तरंग ॥६॥
देखो अंतर आंखें खोल के, तो आवे नजरों विवेक । बरनन ना होवे एक को, गलगल सों लगी अनेक ॥७॥
एक सागर कहयो तेज जोत को, दूजो सोभा सुन्दर । कई तरंग उठें इन रंगों के, खोल देखो आँख अंदर ॥८॥
ए मेला बैठा एक होए के, रूहें एक दूजी को लाग । आवे ना निकसे इतथें, बीच हाथ न अंगुरी माग ॥९॥
गिरदवाए तखत के, कई बैठियां तले चरन । जानों जिन होवें जुदियां, पकड़ रहे हम सरन ॥१०॥
चबूतरे लग कठेड़ा, रहियां चारों तरफों भराए । ज्यों मिल बैठियां बीच में, योंही बैठियां गिरदवाए ॥११॥
एक दूजी को अंक भर, लग रहियां अंगों अंग । दिल में खेल देखन का, है सबों अंगों उछरंग ॥१२॥
जाने जिन कोई जुदी पड़े, ए डर दिल में ले । मिल कर बैठियां एक होए, बड़ी अचरज बैठक ए ॥१३॥
अतंत सोभा लेत हैं, कबूं ना बैठियां यों कर । यों बैठियां भर चबूतरे, दूजा सोभा अति सागर ॥१४॥
माहें ऊँची नीची कोई नहीं, सब बैठियां बराबर । अंग सकल उमंग में, खेल देखन को चाह कर ॥१५॥
सोभा सुन्दरता अति बड़ी, हक बड़ी रूह अरवाहें । ए सोभा सागर दूसरा, मुख कहयो न जाए जुबांए ॥१६॥
अर्स अरवाहों मुख की, जुबां कहा करे बरनन । नैन श्रवन मुख नासिका, सोभा सुन्दर अति घन ॥१७॥
गौर रंग लालक लिए, सोभा सुन्दरता अपार । जो एक अंग बरनन करूँ, वाको भी न आवे पार ॥१८॥
मुख चौक छबि की क्यों कहूं, सोभा हरवटी दंत अधूर । बीच लांक मुसकनी कहां लग, केहे केहे कहूं मुख नूर ॥१९॥
साड़ी चोली चरनी, जड़ाव रंग झलकार । कई जवेर केते कहूं, सोभा सागर सुखकार ॥२०॥
रूहें बैठी हिल मिल के, याके जुदे जुदे वस्तर । केते रंग कहूं साड़ियों, निपट बैठियां मिल कर ॥२१॥
कई साड़ी रंग सेत की, कई साड़ी रंग नीली । कई साड़ी रंग लाल हैं, कई साड़ी रंग पीली ॥२२॥
एक लाल माहें कई रंग, और कई रंग नीली माहें । कई रंग पीली कई सेत में, कई रंग क्यों कहूं जुबांए ॥२३॥
मैं नाम लेत रंगों के, कहूं केते लाल माहें एक । एक नाम नीला कहूं, माहें नीले रंग अनेक ॥२४॥
इन बिध कई रंग वस्तरों, ए बरन्यो क्यों जाए । तिन में भी जुदियां नहीं, सब बैठियां अंग मिलाए ॥२५॥
अनेक रंगों साड़ियां, माहें कई बिरिख बेली पात । फल फूल नकस कटाव कई, ताथें बरन्यो न जात ॥२६॥
कई रंग कहूं वस्तरों, के कहूं जवेरों रंग । इन बिध रंग अनेक हैं, ताके उठें कई तरंग ॥२७॥
कई किरने उठें कंचन की, कई किरने हीरन । पाच पांने मोती मानिक, किरने जाए न कही जवेरन ॥२८॥
सो किरने लगे जाए ऊपर, और द्वार दिवालों थंभन । आवें उतथें किरने सामियां, माहों माहें जंग करें रोसन ॥२९॥
और चोली जो चरनियां, सब अंग में रहे समाए । बरनन न होए एक अंग को, तामें बैठियां सब लपटाए ॥३०॥
हेम हीरा मोती मानिक, कई रंगों के हार । पाच पांने नीलवी लसनिए, कई जवेरों अंबार ॥३१॥
सोभा अतंत है भूखनों, स्वर बाजत हाथ चरन । मीठी बानी अति नरमाई, खुसबोए और रोसन ॥३२॥
वस्तर भूखन सब अंगों, क्यों कहूं केते रंग । एक एक नंग के अनेक रंग, तिन रंग रंग कई तरंग ॥३३॥
निलवट श्रवन नासिका, सिर कंठ उर कई हार । हाथ पांउं चरन भूखन, अति अलेखे सिनगार ॥३४॥
जो होवें अरवा अर्स की, सो लीजो कर सहूर । अंग रंग नंग सब जंग में, होए गयो एक जहूर ॥३५॥
महामत कहे बैठियां देख के, हक हँसत हैं हम पर । कहें देखो इन बिध खेल में, भेलियां रहें क्यों कर ॥३६॥
॥ प्रकरण ॥२॥ चौपाई ॥१५८॥
