सागर - प्रकरण ३
ढाल दूसरा इसी सागर
लेहेरी सुख सागर की, लेसी रूहें अर्स । याके सरूप याको देखसी, जो हैं अरस परस ॥१॥
ए जो सरूप सुपन के, असल नजर बीच इन । वह देखें हमको ख्वाब में, वह असल हमारे तन ॥२॥
उनों अंतर आंखें तब खुलें, जब हम देखें वह नजर । अंदर चुभे जब रूह के, तब इतहीं बैठे बका घर ॥३॥
सुरत उनों की हम में, ए जुदे जुदे हुए जो हम । ए जो बातें करें हम सुपन में, सो करावत हक हुकम ॥४॥
इन बिध हक का इलम, हमको जगावत । इलम किल्ली हमको दई, तिनसे बका द्वार खोलत ॥५॥
बीच असल तन और सुपने, पट नींदै का था । सो नींद उड़ाए सुपना रख्या, ए देखो किया हक का ॥६॥
ना तो नींद उड़े पीछे सुपना, कबलों रेहेवे ए । इन विध सुपना ना रहे, पर हुआ हाथ हुकम के ॥७॥
हुकमें खेल देखाइया, जुदे डारे फरामोसी दे । खेल में जगाए इलमें, अब हुकम मिलावे ले ॥८॥
बात पोहोंची आए नजीक, अब जो कोई रेहेवे दम । उमेदां तुमारी पूरने, राखी खसमें तुम हुकम ॥९॥
जो रूहें अर्स अजीम की, सो मिलियो लेकर प्यार । ए बानी देख फजर की, सबे हूजो खबरदार ॥१०॥
अब फरामोसी क्यों रहे, जब खुल्या बका द्वार । रूबरू किए हमको, तन असल नूर के पार ॥११॥
बैठी थीं डर जिनके, सब हिल मिल एक होए । हुकम हक के कौल पर, उलट तुमको जगावे सोए ॥१२॥
ना तो सुपन के सरूप जो, सो तो खेलै को खैंचत । सो हुकमें तुमें सुपना, हक को मिलावत ॥१३॥
यों सीधी उलटीय से, कौन करे बिना इलम । इत जगाए उमेदां पूरन कर, खैंचत तरफ खसम ॥१४॥
ए होत किया सब हुकम का, ना तो इन विध क्यों होए । जाग सुपना मूल तन का, जगाए हुकम मिलावे सोए ॥१५॥
सो सुध आपन को नहीं, जो विध करत मेहेरबान । ना तो कई मेहेर आपन पर, करत हैं रेहेमान ॥१६॥
महामत कहे मेहेर की, रूहों आवे एक नजर । तो तबहीं रात को मेट के, जाहेर करें फजर ॥१७॥
॥ प्रकरण ॥३॥ चौपाई ॥१७५॥
