सागर - प्रकरण ४
सागर तीसरा एक दिली रूहन की
अब कहूं सागर तीसरा, मूल मेला बिराजत । रूह की आंखों देखिए, तो पाइए इनों सिफत ॥१॥
अर्स की अरवाहें जेती, जुदी होए ना सकें एक खिन । ए माहें क्यों होएं जुदियां, असल रूहें एक तन ॥२॥
इन सबन की एक अकल, एक दिल एक चित्त । एक इस्क इनों का, सनेह कायम हित ॥३॥
इनों दिल सागर तीसरा, एक सागर सबों दिल । देखो इनों दिल पैठ के, किन विध बैठियां मिल ॥४॥
हाँस विलास सुख एक है, एक भांत एक चाल । तो इन वाहेदत की क्यों कहूं, कौल फैल जो हाल ॥५॥
तो कहया वाहेदत इनको, अर्स अरवा हक जात । ज्यों जोतें जोत उद्दोत है त्यों, सूरत की सूरत सिफात ॥६॥
इन एक दिली रूहन की, ए क्यों कर कही जाए । एक रूह कहे गुझ हक का, दूजी अंग न उमंग समाए ॥७॥
वह सुख केहेवे अपना, जो किया है हक से । दिल दूजी के यों आवत, ए सब सुख लिया मैं ॥८॥
एकै बात के वास्ते, सुख दूजी को उपज्या यों । यों सबन की एक दिली, जुदा बरनन होवे क्यों ॥९॥
एक रूह बात करे हक सों, सुख दूजी को होए । जब देखिए मुख बोलते, तब सुख पावें दोए ॥१०॥
अरस-परस यों हक सों, आराम लेवें सब कोए । अति सुख पावें बड़ी रूह, ए तिनके अंग सब सोए ॥११॥
जो सुख पावत बड़ी रूह, सब तिनके सुख सनकूल । ज्यों जल मूल में सींचिए, पोहोंचे पात फल फूल ॥१२॥
त्यों सुख जेता हक का, पोहोंचत है बड़ी रूह को । बड़ी रूह का सुख रूहन, आवत है सब मों ॥१३॥
या भूखन या वस्तर, सिनगार के बखत । एक पेहेने सुख दूजी को यों, सबों सुख होत अतंत ॥१४॥
या जो बखत आरोगने, या कोई अर्स लज्जत । सो एक रूह से दूसरी, सुख देख केहे पावत ॥१५॥
ए सुख बातें अर्स की, अलेखे अखंड । क्यों बरनों मैं इन जुबां, बीच बैठ इन इंड ॥१६॥
मैं नेक कही इन बिध की, सो अर्स में बिध बेसुमार । इन मुख बानी क्यों कहूं, जाको वार न पार ॥१७॥
तो कहया रसूल ने, अर्स में वाहेदत । सो कहया इन माएनो, ए रूहें एक दिल एक चित्त ॥१८॥
एक रूह सुख लेत है, सुख पावत बारे हजार । तो कही जो चीज अर्स की, सो चीजें चीज अपार ॥१९॥
जो कोई चीज अर्स में, बाग जिमी जानवर । ताको सुख बल इस्क का, पार न आवे क्यों ए कर ॥२०॥
या पसु या बिरिख कोई, अपार तिनों की बात । तो रूहों के सुख क्यों कहूं, ए तो हैं हक की जात ॥२१॥
जिन किन को संसे उपजे, खेल देख के यों । ए जो रूहें अर्स की, तिनका इस्क न रहया क्यों ॥२२॥
इस्क रूह दोऊ कायम, और कायम अर्स के माहें । क्यों इस्क खोवे आवे क्यों, उत कमी कोई आवत नाहें ॥२३॥
उत कमी क्यों आवहीं, और रूहें आवें क्यों इत । और इस्क जाए क्यों इनों का, जिन की एती बड़ी सिफत ॥२४॥
जात हक की कहावहीं, और कहावें माहें वाहेदत । जो इलम विचारे हक का, ता को इस्क बढ़त ॥२५॥
ए केहेती हों मैं तिन को, कोई संसे ल्यावे जिन । ए अनहोनी हकें करी, वास्ते हाँसी ऊपर रूहन ॥२६॥
ना तो ए कबहूं नहीं, जो हक रूहें देखें सुपन । एक जरा अर्स का, उड़ावे चौदे भवन ॥२७॥
ए हकें हिकमत करी, खेल देखाया झूठ रूहन । पट दे झूठ देखाइया, नैनों देखें बका वतन ॥२८॥
आड़ा पट दे झूठ देखाइया, पट न आड़े हक । सो हक को हक देखत, हुई फरामोसी रंचक ॥२९॥
इन बिध खेल देखाइया, ना तो रूहें झूठ देखें क्यों कर । अपने तन हकें जान के, करी हाँसी रूहों ऊपर ॥३०॥
सोभी किया सुख वास्ते, पर अब सुध किनको नाहें । खेल देसी सुख बड़े, जब जागें अर्स के माहें ॥३१॥
हादी नूर है हक का, और रूहें हादी अंग नूर । इन विध अर्स में वाहेदत, ए सब हक का जहूर ॥३२॥
महामत कहे ए तीसरा, ए जो रूहों दिल सागर । अब कहूं चौथा सागर, पट खोल देखो अन्तर ॥३३॥
॥ प्रकरण ॥४॥ चौपाई ॥२०८॥
