सागर - प्रकरण ७
चौसठ थंभ चौक खिलवत का बेवरा
इन बिध साथजी जागिए, बताए देऊं रे जीवन । स्याम स्यामाजी साथजी, जित बैठे चौक वतन ॥१॥
याद करो सोई साइत, जो हंसने मांग्या खेल । सो खेल खुसाली लेय के, उठो कीजे केलि ॥२॥
सुरत एकै राखिए, मूल मिलावे माहें । स्याम स्यामाजी साथजी, तले भोम बैठे हैं जाहें ॥३॥
चौसठ थंभ चबूतरा, इत कठेड़ा बिराजत । तले गिलम ऊपर चन्द्रवा, चौसठ थंभों भर इत ॥४॥
कठेड़ा किनार पर, चबूतरे गिरदवाए । सोले थंभों लगता, ए जुगत अति सोभाए ॥५॥
चार द्वार चारों तरफों, और कठेड़ा सब पर । चौसठ थंभों के बीच में, गिलम बिछाई भर कर ॥६॥
कहूं चौसठ थंभों का बेवरा, चार धात बारे नंग । बने चारों तरफों जुदे जुदे, भए सोले जिनसों रंग ॥७॥
चारों तरफ एक एक रंग के, तैसी तरफों चार । नए नए रंग एक दूजे संग, चारों तरफों चौसठ सुमार ॥८॥
ए चार नाम कहे धात के, हेम कंचन चांदी नूर । ए चार रंग का बेवरा, लिए खड़े जहूर ॥९॥
और बारे जवेरों का बेवरा, पाच पांने हीरे पुखराज । मानिक मोती गोमादिक, रहे पिरोजे बिराज ॥१०॥
नीलवी और लसनियां, और परवाली लाल । और रंग कपूरिया, ए रंग बारे इन मिसाल ॥११॥
चार द्वार चार रंग के, आठ थंभ भए जो इन । पाच मानिक और नीलवी, द्वार पुखराज चौथा रोसन ॥१२॥
और थंभ दोए पाच के, दोऊ तरफों नीलवी संग । द्वार नीलवी संग दोए पाच के, करें साम सामी जंग ॥१३॥
दो थंभ द्वार मानिक के, दोए पुखराज तिन पास । दोए थंभ द्वार पुखराज के, ता संग मानिक करे प्रकास ॥१४॥
थंभ बारे भए इन बिध, साम सामी एक एक । यों बारे बने साम सामी, तरफ चारों इन विवेक ॥१५॥
हीरा लसनियां गोमादिक, मोती पाने परवाल । हेम चांदी थंभ नूर के, थंभ कंचन अति लाल ॥१६॥
पिरोजा और कपूरिया, याके आठ थंभ रंग दोए । गिन छोड़े दोए द्वार से, बने हर रंग चार चार सोए ॥१७॥
ए सोले थंभों का बेवरा, थंभ चार चार एक रंग के । सो चारों तरफों साम सामी, बने मिसल चौसठ ए ॥१८॥
चारों तरफों चंद्रवा, चौसठ थंभों के बीच । जोत करे सब जवेरों, जेता तले दुलीच ॥१९॥
माहें बिरिख बेली कई कटाव, कई फूल पात नकस । देख जवेर जुगत कई चंद्रवा, जानों के अति सरस ॥२०॥
इन चौक बिछाई गिलम, ता पर सिंघासन । चारों तरफों झलकत, जोत लेहेरी उठत किरन ॥२१॥
झलकत सुन्दर गिलम, अति सोभित सिंघासन । यों जोत जमी जवेरन की, बीच जुगल जोत रोसन ॥२२॥
लाल तकिए ऊपर सोभित, धरे बराबर एक दोर । नरमों में अति नरम हैं, पसम भरे अति जोर ॥२३॥
जेता एक कठेड़ा, सब में सुन्दर तकिए । तिन तकियों साथ भराए के, बैठे एक दिली ले ॥२४॥
जिन बिध बैठियां बीच में, याही बिध गिरदवाए । तरफ चारों लग कठेड़े, बीच बैठा साथ भराए ॥२५॥
किरना उठें नई नई, सिंघासन की जोत । कई तरंग इन जोत के, नूर नंगों से होत ॥२६॥
पाइए इन तखत के, उत्तम रंग कंचन । छे डांडे छे पाइयों पर, अति सुन्दर सिंघासन ॥२७॥
दस रंग डांडों देखत, नए नए सोभित जे । हर तरफों रंग जुदे जुदे, दसो दिस देखत ए ॥२८॥
एक तरफ देखत एक रंग, तरफ दूजी दूजा रंग । यों दसो दिस रंग देखत, तिन रंग रंग कई तरंग ॥२९॥
तीन डांडे जो पीछले, दो तकिए बीच तिन । कई रंग बिरिख बेली बूटियां, ए कैसे होए बरनन ॥३०॥
चारों किनारे चढ़ती, दोरी बेली चढ़ती चार । चारों तरफों फूल चढ़ते, करत अति झलकार ॥३१॥
तिन डांडों पर छत्रियां, अति सोभित हैं दोए । माहें कई दोरी बेली कांगरी, क्यों कहूं सोभा सोए ॥३२॥
दोए कलस दोए छत्रियों, छे कलस ऊपर डांडन । आठों के अवकास में, करत जंग रोसन ॥३३॥
नकस फूल कटाव कई, कई तेज जोत जुगत । देख देख के देखिए, नैनां क्योंए न होए तृपित ॥३४॥
चाकले दोऊ पसमी, जोत जवेर नरम अपार । बैठे सुन्दर सरूप दोऊ, देख देख जाऊं बलिहार ॥३५॥
जरे जिमी की रोसनीं, भराए रही आसमान । क्यों कहूं जोत तखत की, जित बैठे बका सुभान ॥३६॥
बरनन करूं मैं इन जुबां, रंग नंग इतके नाम । ए सब्द तित पोहोंचे नहीं, पर कहे बिना भाजे न हाम ॥३७॥
ए जवेर कई भांत के, सोभित भांत रूप कई । सो पल पल रूप प्रकासहीं, यों सकल जोत एक भई ॥३८॥
गिलम जोत फूल बेलियां, जोत ऊपर की आवे उतर । जोतें जोत सब मिल रहीं, ए रंग जुदे कहूं क्यों कर ॥३९॥
ए मूल मिलावा अपना, नजर दीजे इत । पलक न पीछी फेरिए, ज्यों इस्क अंग उपजत ॥४०॥
जो मूल सरूप हैं अपने, जाको कहिए परआतम । सो परआतम लेय के, विलसिए संग खसम ॥४१॥
महामत कहे ए मोमिनों, करूं मूल सरूप बरनन । मेहेर करी मासूक ने, लीजो रूह के अन्तस्करन ॥४२॥
॥ प्रकरण ॥७॥ चौपाई ॥५३२॥
