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सागर - प्रकरण ८

श्री राजजी को सिनगार दूसरो

॥ मंगला चरण ॥

अर्स तुमारा मेरा दिल है, तुम आए करो आराम । सेज बिछाई रूच रूच के, एही तुमारा विश्राम ॥१॥

अर्स कहया दिल मोमिन, अर्स में सब बिसात । निमख न्यारी क्यों होए सके, रूह निसबत हक जात ॥२॥

इस्क सुराही ले हाथ में, पिलाओ आठों जाम । अपनी अंगना जो अर्स की, ताए दीजे अपनों ताम ॥३॥

इलम दिया आए अपना, भेजी साहेदी अल्ला कलाम । रूहें त्रिखावंती हक की, सो चाहें धनी प्रेम काम ॥४॥

फुरमान ल्‍याया दूसरा, जाको सुकजी नाम । दई तारतम ग्वाही ब्रह्मसृष्ट की, जो उतरी अव्वल से धाम ॥५॥

खिलवत खाना अर्स का, बैठे बीच तखत स्यामा स्याम । मस्ती दीजे अपनी, ज्यों गलित होऊं याही ठाम ॥६॥

तुम लिख्या फुरमान में, हक अर्स मोमिन कलूब । सो सुकन पालो अपना, तुम हो मेरे मेहेबूब ॥७॥

और भी लिख्या समनून को, हक दोस्ती में पातसाह । सो कौल पालो अपना, मैं देखूं मेहेबूब की राह ॥८॥

कहूं अबलों जाहेर ना हुई, अर्स बका हक सूरत । हिरदे आओ तो कहूं, इत बैठो बीच तखत ॥९॥

ए वजूद न खूबी ख्वाब की, ए कदम हक बका के । ढूंढ़या बुजरकों इप्तदाए से, इत जाहेर न हुए कबूं ए ॥१०॥

उज्जल लाल तली पांउं की, रंग रस भरे कदम । छब सलूकी अंग अर्स की, रूह से छूटे क्यों दम ॥११॥

मिहीं लीकें चरनों तली, रूह के हिरदे से छूटत नाहें । ए निसबत भई अर्स की, लिखी रूह के ताले माहें ॥१२॥

नख अंगूठे अंगुरियां, सिफत न पोहोंचे सुकन । आसमान जिमी के बीच में, रूह याही में देखे रोसन ॥१३॥

एक छोटे नख की रोसनी, ऐसा तिन का नूर । आसमान जिमी के बीच में, जिमी जरे जरा भई सब सूर ॥१४॥

देख सलूकी अंगूठों, और अंगुरियों सलूकी । उतरती छोटी छोटेरी, जो हिरदे में छबि फबी ॥१५॥

लाल नरम उज्जल अंगुरी, फना टांकन घूंटी काड़ों । आठों जाम रस बका, पोहोंचे रूह के तालू मों ॥१६॥

लाल लांकें लाल एड़ियां, पांउं तली अति उज्जल । ए पांउं बसत जिन हैयड़े, सोई आसिक दिल ॥१७॥

बसत सुखाले नरमाई में, आसमान लग रोसन । ए पांउं प्यारे मासूक के, जो कोई आसिक मोमिन ॥१८॥

आसिक बसत अर्स तले, या बसे अर्स के माहें । ए खुसबोए मस्ती अर्स की, निसदिन पीवे ताहें ॥१९॥

सुन्दर सलूकी छब सोभित, रंग रस प्यार भरे । सोई मोमिन अर्स दिल, जित इन हकें कदम धरे ॥२०॥

ए सुख देत अर्स के, कोई नाहीं निमूना इन । ए सुख जानें अरवा अर्स की, निसबत हक सों जिन ॥२१॥

रूहें इस्क मांगें धनी पे, पकड़ धनी के कदम । जो छोड़े इन कदम को, सो क्यों कहिए आसिक खसम ॥२२॥

नरम तली लाल उज्जल, आसिक एही जीवन । धनी जिन छोड़ाइयो कदम, जाहेर या बातन ॥२३॥

प्यारे कदम राखों छाती मिने, और राखों नैनों पर । सिर ऊपर लिए फिरों, बैठो दिल को अर्स कर ॥२४॥

तखत धरया हकें दिल में, राखूं दिल के बीच नैनन । तिन नैनों बीच नैना रूह के, राखों तिन नैनों बीच तारन ॥२५॥

तिन तारों बीच जो पुतली, तिन पुतलियों के नैनों माहें । राखूं तिन नैनों बीच छिपाए के, कहूं जाने न देऊँ क्याहें ॥२६॥

जाथें चरन जुदे होंए, सो आसिक खोले क्यों नैन । ए नैन कायम नूरजमाल के, जासों आसिक पावे सुख चैन ॥२७॥

एक अंग छोड़ दूजे अंग को, क्यों आसिक लेने जाए । ए कदम छोड़े मासूक के, सो आसिक क्यों केहेलाए ॥२८॥

एक रूह लगी एक अंग को, सो क्यों पकड़े अंग दोए । मासूक अंग दोऊ बराबर, क्यों छोड़े पकड़े अंग सोए ॥२९॥

जो कोई अंग हलका लगे, और दूजा भारी होए । एक अंग छोड़ दूजा लेवहीं, पर आसिक न हलका कोए ॥३०॥

दूजा अंग आया नहीं, तो लों एक अंग क्यों छूटत । यों और अंग ले ना सके, एकै अंग में गलित ॥३१॥

जो आसिक भूखन पकड़े, सो भी छूटे न आसिक सें । देख भूखन हक अंग के, आसिक सुख पावे यामें ॥३२॥

हक के अंग के सुख जो, सो जड़ भी छोड़े नाहें । तो क्यों छोड़े अरवा अर्स की, हक अंग आया हिरदे माहें ॥३३॥

हेम नंग सब चेतन, अर्स जिमी जड़ ना कोए । दिल चाहया होत सब चीज का, चीज एकै से सब होए ॥३४॥

सब रंग गुन एक चीज में, नरम जोत खुसबोए । सब गुन रखे हक वास्ते, सुख लेवें हक का सोए ॥३५॥

आसिक एक अंग अटके, तिनको एह कारन । दोऊ अंग मासूक के, किन छोड़े लेवें किन ॥३६॥

नूर बिना अंग कोई ना देख्या, और सब अंगों बरसत नूर । अंबर में न समाए सके, इन अंगों का जहूर ॥३७॥

एक अंग मासूक के कई रंग, तिन रंग रंग कई तरंग । एक लेहेर पोहोंचावे उमर लग, यों छूटे न आसिक से अंग ॥३८॥

जो कदी मेहेर करें मासूक, तो दूजा अंग देवें दिल आन । तो सुख लेवे सब अंग को, जो सब सुख देवे सुभान ॥३९॥

जो कदी आसिक खोले नैन को, पेहेले हाथों पकड़े दोऊ पाए । ए नैन अंग नूरजमाल के, सो इन आसिक से क्यों जाए ॥४०॥

॥ मंगला चरण सम्पूर्ण ॥

इजार जो नीली लाहि की, नेफा लाल अतलस । नेफे बेल मोहोरी कांगरी, क्यों कहूं नंग जरी अर्स ॥४१॥

काड़ों पर पीड़ी तले, मिहीं चूड़ी सोभित इजार । जोत करे माहें दावन, झाईं उठे झलकार ॥४२॥

इजार बंध नंग कई रंग, और कई कांगरी बेल माहें । फूल पात कई नकस, सब्द न पोहोंचे ताहें ॥४३॥

कई रंग नंग माहें रेसम, रंग नंग धागा न सूझत । हाथ को कछू लगे नहीं, नरम जोत अतंत ॥४४॥

अतंत नाड़ी फुन्दन, जोत को नाहीं पार । एही जानों भूल अपनी, सोभा ल्याइए माहें सुमार ॥४५॥

रंग नीला कहया इजार का, कई रंग नंग इन मों । तेज जोत जो झलकत, और कछू लगे ना हाथ कों ॥४६॥

सब अंग पीछे कहूंगी, पेहेले कहूं पाग बांधी जे । सिफत न पोहोंचे अंग को, तो भी कहया चाहे रूह ए ॥४७॥

हाथों पाग बांधी तो कहिए, जो हुकमें न होवे ए । कई कोट पाग बनें पल में, जिन समें दिल चाहे जे ॥४८॥

पर हकें बांधी पाग रुच के, नरम हाथों पेच फिराए । आसिक देखे बांधते, अतंत रूह सुख पाए ॥४९॥

इन विध सब सिनगार, कहियत इन जुबांए । तो कहया फना का सब्द, बका को पोहोंचत नाहें ॥५०॥

चुप किए भी ना बने, जाको ए ताम दिया खसम । ताथें ज्यों त्यों कहया चाहिए, सो कहावत हक हुकम ॥५१॥

बांधी पाग समार के, हाथ नरम उज्जल लाल । इन पाग की सोभा क्यों कहूं, मेरा साहेब नूरजमाल ॥५२॥

लाल पाग बांधी लटकती, कछू ए छबि कही न जाए । पेच दिए कई विध के, हिरदे सों चित्त ल्याए ॥५३॥

पाग बनाई कोई भांत की, बीच में कटाव फूल । बीच बेली बीच कांगरी, रूह देख देख होए सनकूल ॥५४॥

जो आधा फूल एक पेच में, आवे दूजे पेच का मिल । यों बनी बेल फूल पाग की, देख देख जाऊं बल बल ॥५५॥

कई रंग नंग फूल पात में, ए जिनस न आवे जुबांए । न आवे मुख केहेनी मिने, जो रूह देखे हिरदे माहें ॥५६॥

पाग बांधी कोई तरह की, जो तरह हक दिल में ल्याए । बल बल जाऊं मैं तिन पर, जिन दिल पेच फिराए ॥५७॥

पाग ऊपर जो दुगदुगी, ए जो बनी सब पर । जोत हीरा पोहोंचे आकास लों, पीछे पाच रहे क्यों कर ॥५८॥

मानिक तहां मिलत है, पोहोंचत तित पुखराज । नीलवी तो तेज आसमानी, उत पांचों रहे बिराज ॥५९॥

कांध पीछे केस नूर झलके, लिए पाग में पेच बनाए । गौर पीठ सुध सलूकी, जुबां सके ना सिफत पोहोंचाए ॥६०॥

कण्ठ खभे दोऊ बांहोंड़ी, पेट पांसली बीच हैड़ा । रूह मेरी इत अटके, देख छबि रंग रस भरया ॥६१॥

मच्छे दोऊ बाजूअ के, सलूकी अति सोभित । रंग छब कोमल दिल की, आसिक हैड़े बसत ॥६२॥

हस्त कमल की क्यों कहूं, पोहोंचे हथेली कई रंग । लाल उज्जल रंग केहेत हों, इन रंग में कई तरंग ॥६३॥

कोनी काड़े कलाइयां, रंग नरमाई सलूक । ऐसा सखत मेरा जीवरा, और होवे तो होए टूक टूक ॥६४॥

ना तेहेकीक होवे रंग की, ना छबि होए तेहेकीक । क्यों कहूं बीसों अंगुरियां, और मिंहीं हथेलियां लीक ॥६५॥

नरम अंगुरियां पतली, लगें मीठी मूठ वालत । ए कोमलता क्यों कहूं, जिन छबि अंगुरी खोलत ॥६६॥

क्यों देऊं निमूना नख का, इन अंगों नख का नूर । देत न देखाई कछुए, जो होवे कोटक सूर ॥६७॥

अब देखो पेट पांसली, और लांक चलत लेहेकत । ए सोभा सलूकी लेऊं रूह में, तो भी उड़े न जीवरा सखत ॥६८॥

देख हरवटी अति सुन्दर, और लाल गाल गौर । लांक अधुर बीच हरवटी, क्यों कहूं नूर जहूर ॥६९॥

गाल सोभा अति देत हैं, क्यों कहूं इन मुख छब । उज्जल लाल रंग सुन्दर, क्यों कहूं सलूकी फब ॥७०॥

कानन की किन विध कहूं, जो सुने आसिक के बैन । सो सुन देवें पड़उत्तर, ज्यों आसिक पावे सुख चैन ॥७१॥

मुख दंत लाल अधुर छब, मधुरी बोलत मुख बान । खैंच लेत अरवाह को, ए जो बानी अर्स सुभान ॥७२॥

नैन अनियारे बंकी छब, चंचल चपल रसाल । बान बंके मारत खैंच के, छाती छेद निकसत भाल ॥७३॥

लाल तिलक निलवट दिए, अति सुन्दर सुखदाए । असल बन्या ऐसा ही, कई नई नई जोत देखाए ॥७४॥

नैन कान मुख नासिका, रंग रस भरे जोवन । हाथ पांउं कण्ठ हैयड़ा, सब चढ़ते देखे रोसन ॥७५॥

नख सिख बन्ध बन्ध सब अंग, मानों सब चढ़ते चंचल । छब फब सोभा सुन्दर, तेज जोत अंग सब बल ॥७६॥

सुन्दर ललित कोमल, देख देख सब अंग । तेज जोत नूर सब चढ़ते, सब देखत रस भरे रंग ॥७७॥

कटि कोमल दिल हैयड़ा, अति उज्जल छाती सुन्दर । चढ़ते इस्क अंग अधिक, ऐसा चुभ्या रूह के अन्दर ॥७८॥

इतथें रूह क्यों निकसे, जो इन मासूक की आसिक । छोड़ छाती आगे जाए ना सके, मार डारत मुतलक ॥७९॥

जिन बिध की ए इजार, तापर लग बैठा दावन । सेत रंग दावन देखिए, आगूं इजार रंग रोसन ॥८०॥

गौर रंग जामा उज्जल, जुड़ बैठा अंग ऊपर । अति बिराजत इन विध, ए खूबी कहूं क्यों कर ॥८१॥

ए जुगत जामें की क्यों कहूं, झलकत है चहुं ओर । बाहें चोली और दावन, सोभा देत सब ठौर ॥८२॥

पीछे कटाव जो कोतकी, रंग नंग जरी झलकत । चीन मोहोरी दोऊ हाथ की, ए सुन्दर जोत अतन्‍त ॥८३॥

बेल नकस दोऊ बगलों, और बेल गिरवान बन्ध । चूड़ी समारी बाहन की, क्यों कहूं सोभा सनन्ध ॥८४॥

छोटी बड़ी न जाड़ी पतली, सबे बनी एक रास । उतरती मिहीं मिहीं से, जुबां क्या कहे खूबी खास ॥८५॥

पीला पटुका कमरें, रंग नंग छेड़े किनार । बेल पात फूल नकस, होत आकास उद्दोत कार ॥८६॥

लाल नीले सेत स्याम रंग, किनार बेल कटाव । सात रंग छेड़ों मिने, क्यों कहूं जुगत जड़ाव ॥८७॥

पाच पाने मोती नीलवी, हीरे पोखरे मानिक नंग । बेल कटाव कई नकस, कहूं गरभित केते रंग ॥८८॥

जामें में झांई झलकत, हरे रंग इजार । लाल बन्ध और फुन्दन, कई रंग नंग अपार ॥८९॥

कहूं अंगों का बेवरा, जुदे जुदे भूखन । ए जो जवेर अर्स के, कहूं पेहेले भूखन चरन ॥९०॥

चारों जोड़े चरन के, नरमाई सुगन्ध सुखकार । बानी मधुरी बोलत, सोभा और झलकार ॥९१॥

भूखन मेरे धनी के, किन विध कहूं जो ए । के कहूं खूबी नरमाई की, के कहूं अम्बार तेज के ॥९२॥

एक नंग के कई रंग, सोभे झन बाजे झांझर । पांच नंग रंग एक के, अति मीठी बोले घूंघर ॥९३॥

नाके वाले जवेर के, माहें नरम जोत गुन दोए । तीसरी बानी माधुरी, चौथा गुन खुसबोए ॥९४॥

सोई पांच रंग एक नंग में, तिनकी बनी जो कड़ी । देत देखाई रंग नंग जुदे, जानों किन घड़ के जड़ी ॥९५॥

कांबी एक जवेर की, तामें झीने रंग नंग दस । दिल चाहे भूखन सब बने, सो हक भूखन ए अर्स ॥९६॥

मैं देखे जवेर अर्स के, ज्यों हेम भूखन होत इत । कई रंग नंग मिलाए के, बहु बिध भूखन जड़ित ॥९७॥

किन जड़े घड़े ना समारे, भूखन आवत दिल चाहे । अर्स जवेर कंचन ज्यों, जानों असल ऐसे ही बनाए ॥९८॥

दस रंग के जवेर की, माहें कई नकस मुंदरी । दोए अंगूठी अंगूठों, आठों जिनस आठ अंगुरी ॥९९॥

ए नरम अंगुरियां अतन्त, नख सोभित तेज अपार । ए देखो भूल अकल की, सोभा ल्याइए माहें सुमार ॥१००॥

पोहोंचे और हथेलियां, केहे न सकों सलूकी ए । छबि देख रंग हाथन की, बल बल जाऊं इनके ॥१०१॥

कड़ियां दोऊ काड़ो सोहे, सोभा तेज धरत । लाल नंग नीले आसमानी, जोत अवकास भरत ॥१०२॥

पोहोंची पांचों नंग की, जुबां केहे न सके जिनस । पाच पांने मोती नीलवी, लरें हीरे अति सरस ॥१०३॥

बाजूबंध की क्यों कहूं, जो बिराजे बाजू पर । कई मिहीं नकस कटाव, जोत भरी जिमी अम्बर ॥१०४॥

एक नंग एक रंग का, एक रंगे नंग अनेक । इन बिध के अर्स भूखन, सो कहां लो कहूं विवेक ॥१०५॥

पांच रंग जरी फुन्दन, सोभा लेत अतंत । पांच रंग जवेर झलके, फुन्दन सोहे लटकत ॥१०६॥

नरम जोत खुसबोए, दिल चाही सोभाए । कई विध सुख लेवे हक के, सुख भूखन कहे न जाए ॥१०७॥

बीच हार मानिक का, और हीरों हार उज्जल । पाच मोती और नीलवी, लसनियां अति निरमल ॥१०८॥

और निरमल मांहें दुगदुगी, तामें नंग करत अति बल । बीच हीरा छे गिरदवाए, जोत आकास किया उज्जल ॥१०९॥

गौर गलस्थल धनी के, उज्जल लाल सुरंग । झांई उठे इन नूर में, करन फूल के नंग ॥११०॥

निरख नासिका धनी की, लटके मोती पर लाल । लेत अमी रस अधुर पर, रस अमृत रंग गुलाल ॥१११॥

करन फूल की क्यों कहूं, उठत किरन कई रंग । तिन नंग रंग कई भासत, रंग रंग में कई तरंग ॥११२॥

करत मानिक माहें लालक, हीरे मोती सेत उजास । और पाच करत है नीलक, लेत लेहेरी जोत आकास ॥११३॥

तेज भी मानिक तित मिले, पोहोंचत तित पुखराज । नीलवी तो तेज आसमानी, रहे रंग नंग पांचों बिराज ॥११४॥

पाँच फूल कलंगी पर, उपरा ऊपर लटकत । कोई ऐसी कुदरत नूर की, लेहेरी आकास में झलकत ॥११५॥

एता इन कलंगी मिने, एकै हीरे का नूर । आसमान जिमी के बीच में, मानों कोटक ऊगे बका सूर ॥११६॥

जंग जवेर करत हैं, आसमान देखिए जब । लरत बीच आकास में, नजरों आवत है तब ॥११७॥

कहे महामत अरवा अर्स से, जो कोई आई होए उतर । सो इन सरूप के चरन लेय के, चलिए अपने घर ॥११८॥

॥ प्रकरण ॥८॥ चौपाई ॥६५०॥

इसी सन्दर्भ में देखें-