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सागर - प्रकरण ९

श्री ठकुरानी जी का सिनगार दूसरा

॥ मंगला चरण ॥

बरनन करूं बड़ी रूह की, जो हक नूर का अंग । रूहें नूर इन अंग के, जो हमेसा सब संग ॥१॥

हक जात अंग अर्स का, क्यों कर बरनन होए । इन सरूप को सुपन भोम का, सब्द न पोहोंचे कोए ॥२॥

किन देख्या सुन्या न तरफ पाई, तो क्यों दुनियां सुन्या जाए । जो अरवा होसी अर्स की, सो सुन के सुख पाए ॥३॥

मेरी रूह चाहे वरनन करूं, होए ना बिना अर्स इलम । वस्तर भूखन अर्स के, इत पोहोंचे ना सुपन का दम ॥४॥

पेहेने उतारे इन जिमी, नाहीं अर्स में चल विचल । इत नकल कोई है नहीं, अर्स वाहेदत सदा असल ॥५॥

घट बढ़ अर्स में है नहीं, मिटे न कबूं रोसन । तिन सरूप को इन मुख, क्यों कर होए बरनन ॥६॥

एक पेहेर दूजा उतारना, तब तो घट बढ़ होए । जब जैसा जित चित्त चाहे, तब तित तैसा बनत सोए ॥७॥

अर्स अरवा चाहे दिल में, सो होए माहें पल एक । जिन अंग जैसा वस्तर, होए खिन में कई अनेक ॥८॥

सुन्दर सरूप सोभा लिए, सिनगार वस्तर भूखन । रस रंग छबि सलूकी, चाहे रूह के अन्तस्करन ॥९॥

वस्तर भूखन अंग अर्स के, सो सबे हैं चेतन । सब सुख देवें रूह को, तो क्यों न देवें नैन श्रवन ॥१०॥

नया सिनगार साजत, तब तो नया पेहेन्या कहया जात । नया पुराना अर्स में नहीं, पर पोहोंचे न इतकी बात ॥११॥

जो सिफत बड़ी चित्त लीजिए, बड़ी अकल सो जान । फना बका को क्या कहें, ताथें पोहोंचत नहीं जुबान ॥१२॥

तो भी रूह मेरी ना रहे, हक बरनन किया चाहे । हक इलम आया मुझ पे, सो या बिन रहयो न जाए ॥१३॥

ना तो बैठ झूठी जिमी में, ए बका बरनन क्यों होए । इलम हुकम खैंचे रूह को, अकल जुबां कहे सोए ॥१४॥

यासों रूह सुख पावत, अर्स रूहें पावें आराम । कहूं सिखाई रूहअल्ला की, ले साहेदी अल्ला कलाम ॥१५॥

हक इलम सिर लेय के, वरनन करूँ हक जात । रूह मेरी सुख पावहीं, हिरदे बसो दिन रात ॥१६॥

मोमिन दिल अर्स कहया, सो अर्स बसे जित हक । निसबत मेहेर जोस हुकम, और इस्क इलम बेसक ॥१७॥

ए बरकत हक अर्स में, तो दिल अर्स कहया मोमिन । तो बरनन होए अर्स का, जो यों दिल होए रोसन ॥१८॥

बारीक बातें अर्स की, सो जानें अर्स के तन । जीवत लेसी सो सुख, जिनका टूट्या अन्तस्करन ॥१९॥

छाती मेरी कोमल, और कोमल तुमारे चरन । बासा करो तिन पर, तुम सों निसबत अर्स तन ॥२०॥

मेरी छाती दिल की कोमल, तिन पर राखो नरम कदम । इतहीं सेज बिछाए देऊं, जुदे करो जिन दम ॥२१॥

रूह छाती इनसे कोमल, तिनसे पाँउं कोमल । इत सुख देऊँ मासूक को, सुख यों लेऊँ नेहेचल ॥२२॥

मेरी रूह नैन की पुतली, बीच राखूं तिन तारन । खिन एक न्यारी जिन करो, ए चरन बसें निस दिन ॥२३॥

चरन तली अति कोमल, मेरी रूह के नैन कोमल । निस दिन राखों इन पर, जिन आवने देऊं बीच पल ॥२४॥

या रूह नैन की पुतली, तिन नैनों बीच तारन । इत रहे सेज्या निस दिन, धरो उज्जल दोऊ चरन ॥२५॥

मेरा दिल तुमारा अर्स है, माहें बहुबिध की मोहोलात । कई सेज हिंडोले तखत, रूह नए नए रंगों बिछात ॥२६॥

आसा पूरो सुख देओ, नए नए कराऊं सिनगार । दयो पूरी मस्ती ना बेहोसी, सुख लेऊं सब अंग समार ॥२७॥

अर्स तुमारा मुझ दिल, माहें अर्स की सब बिसात । खाना पीना सुख सिनगार, माहें सब न्यामत हक जात ॥२८॥

सब गुझ तुमारे दिल का, जिन मेरा दिल किया रोसन । जेता मता बीच अर्स के, सब आया दिल मोमिन ॥२९॥

तो कहया अर्स दिल मोमिन, हक बैठें उठें खेलाए । सुख बका हक अर्स रूहें, सिफत क्यों कहे दिल जुबांए ॥३०॥

पर दिल के जो अंग हैं, धनी अर्स तुमारा सोए । तुमें देखें कहे बातें सुने, लेवे तुमारी बानी की खुसबोए ॥३१॥

पिए तुमारी सुराही का, कई स्वाद फूल सराब । ऐसी लेऊं मस्ती मेहेबूब की, ज्यों उड़ जावे ख्वाब ॥३२॥

एक स्वाद दिल देखे तुमको, सुने तुमारी बानी की मिठास । लेऊं खुसबोए बोलूं तुम सों, और क्यों कहूं दुलहा विलास ॥३३॥

जेता सुख तुमारे अर्स में, सो सब हमारे दिल । ए सुख रूह मेरी लेवहीं, जो दिए इन अर्स में मिल ॥३४॥

रूह बरनन करे क्या होए, जोलों स्वाद न ले निसबत । इस्क इलम जोस हुकम, ए सब मेहेरें पाइए न्यामत ॥३५॥

दिल के अंगों बिना हक के, इत स्वाद लीजे क्यों कर । देखे सुने बोले बिना, तो क्या अर्स नाम धरया धनी बिगर ॥३६॥

जो मासूक सेज न आइया, देख्या सुन्या न कही बात । सुख अंग न लियो इन सेज को, ताए निरफल गई जो रात ॥३७॥

अर्स तुमारा मुझ दिल, माहें अर्स की सब बिसात । सब न्यामतें इनमें, अर्स बका हक जात ॥३८॥

पेहेले बरनन करूं सिर राखड़ी, पीछे बरनन करूं सब अंग । अखंड सिनगार अर्स को, मेरी रूह हमेसा संग ॥३९॥

॥ मंगला चरण सम्पूर्ण ॥

सिर पर बनी जो राखड़ी, कहूं किन बिध सोभा ए । आसमान जिमी के बीच में, एकै जोत खड़ी ले ॥४०॥

गिरदवाए मानिक बने, बीच हीरे की जोत । किनार ऊपर जो नीलवी, हुई जिमी अंबर उद्दोत ॥४१॥

सेंथे भी सिर कांगरी, और सिर कांगरी पांन । इन सिर सोभा क्यों कहूं, अलेखे अमान ॥४२॥

माहें हारें खजूरे बूटियां, बीच फूल करत हैं जोत । जुदे जुदे रंगों जवेर, ठौर ठौर रोसनी होत ॥४३॥

लाल सेंथे जोत जवेर की, दोए पटली समारी सिर । बनी नंगन की कांगरी, बल बल जाऊं फेर फेर ॥४४॥

निलवट पर सर मोतिन की, ऊपर नीलवी बीच मानिक । दोऊ तरफों तीनों सरें, तीनों बराबर माफक ॥४५॥

इन तीनों पर कांगरी, बनी सेंथे बराबर । पांन कटाव सेंथे पर, ए जुगत कहूं क्यों कर ॥४६॥

मानिक मोती नीलवी, हेम हीरा पुखराज । इन मुख सोभा क्यों कहूं, सिर खूबी रही बिराज ॥४७॥

बीच फूल कटाव कई, राखड़ी के गिरदवाए । ए जुगत बनी मूल लग, गूंथी नंग मोती बेनी बनाए ॥४८॥

तीन नंग रंग गोफने, तिन एक एक में तीन रंग । हीरा मानिक नीलवी, सोभित कंचन संग ॥४९॥

तीनों गोफने घूंघरी, बेनी गूंथी नई जुगत । बल बल जाऊं देख देख के, रूह होए नहीं तृपित ॥५०॥

चारों बंध बेंनी तले, नीले पीले सोभित । सोभे नरम बंध चोलीय के, खूबी साड़ी तले देखत ॥५१॥

बेनी सोभित गौर पीठ पर, चोली और बंध चोली के । सब देत देखाई साड़ी मिने, सब सोभा लेत सनंध ए ॥५२॥

लाल साड़ी कई नकस, माहें अनेक रंग के नंग । मिहीं नकस न होवे गिनती, करें जवेर माहें जंग ॥५३॥

सिर पर साड़ी सोभित, नीली पीली सेत किनार । तिन पर सोहे कांगरी, करें पांच नंग झलकार ॥५४॥

साड़ी कोर किनार पर, नंग कांगरी सोभित । फूल बेल कई खजूरे, कई छेड़ों मिने झलकत ॥५५॥

कई छापे बूटी नकस, नंग साड़ी बीच अपार । कई नंग रंग झलके बीच में, सोभा न आवे माहें सुमार ॥५६॥

मुख उज्जल गौर लालक लिए, छबि जाए न कही जुबांए । देख देख सुख पावत, रूह हिरदे के माहें ॥५७॥

मुख चौक नेत्र नासिका, ए छबि अंग अर्स के । असलें सिफत न पोहोंचहीं, बुध माफक कही ए ॥५८॥

मुखारबिन्द स्यामाजीय को, रूह देख देख सुख पाए । निलवट सोहे चांदलो, रूह बलिहारी ताए ॥५९॥

रंग नीले जोत पाच में, रूह इतथें क्यों निकसाए । जो जोत देखूं मानिक, तो वाही में डूब जाए ॥६०॥

करे आकास मोती उज्जल, जोत लटके लेवे तरंग । आसिक रूह क्यों निकसे, क्योंए न छूटे लग्यो दिल रंग ॥६१॥

श्रवनों सोहे पानड़ी, मानिक के रंग सोए । और रंग माहें नीलवी, जोत करत रंग दोए ॥६२॥

मोती पांने पुखराज, लरें लटकत इन । तरंग उठत आकास में, किरना करत रोसन ॥६३॥

मुरली सोभित मुख नासिका, लटके मोती नंग लाल । निरख देखूं माहें नीलवी, तो तबहीं बदले हाल ॥६४॥

न्यारी गति नैनन की, अति अनियारे लोचन । उज्जल माहें लालक लिए, अतंत तेज तारन ॥६५॥

भौं भृकुटी अति सोभित, रंग स्याम अंग गौर । केहेनी जुबां न आवत, कछू अर्स रूहें जानें जहूर ॥६६॥

सोभा लेत हैं टेढ़ाई, नैना रंग रस भरे । ए सोई रूहें जानहीं, जाकी छाती छेद परे ॥६७॥

मीठे नैन रसीले निरखत, माहें सरम देत देखाए । प्यार पूरा देखत, मेहेर भरे सुखदाए ॥६८॥

अनेक गुन इन नैन में, गिनती न होवे ताए । सुख देत अलेखे सब अंगों, नैना गुन क्यों ए ना गिनाए ॥६९॥

सनकूल मुख अति सुंदर, गौर हरवटी सलूक । लांक अधुर दंत देखत, जीव होत नहीं टूक टूक ॥७०॥

मुख चौक अति सुन्दर, अति सुन्दर दोऊ गाल । कही न जाए छबि सलूकी, निपट उज्जल माहें लाल ॥७१॥

सात रंग माहें झलकत, लेहेरें लेत दोऊ झाल । दोऊ फूल सोभित मुख झालके, जुबां क्या कहे इन मिसाल ॥७२॥

फिरते मोती सोभित, माहें मानिक पाच कुंदन । हीरे लसनिए नीलवी, सातों अम्बर करे रोसन ॥७३॥

हेम नंग नाम लेत हों, जानों के पेहेने बनाए । ए बिध अर्स में है नहीं, जुबां सके न सिफत पोहोंचाए ॥७४॥

कई रंग करे एक खिन में, नई नई जुगत देखाए । सोहे हमेसा सब अंगों, पेहेने सोभित चित्त चाहे ॥७५॥

चीज सबे अर्स चेतन, वस्तर या भूखन । सुख लेत हक के अंग का, यों करत अति रोसन ॥७६॥

हर नंग में सब रंग हैं, हर नंग में सब गुन । सो नंग ले कछू न बनावत, सब दिल चाहया होत रोसन ॥७७॥

वस्तर भूखन केते कहूं, हेम रेसम रंग नंग । ना पेहेन्या ना उतारिया, ए दिल चाहया सोभित अंग ॥७८॥

यों दिल चाहया वस्तर, और दिल चाहया भूखन । जब जिन अंग दिल जो चाहे, आगूं रोसन होए माहें खिन ॥७९॥

सुन्दर सरूप छबि देख के, फेर फेर जाऊं बल बल । जो रूह होवे अर्स की, सो याही में जाए रल गल ॥८०॥

नरम लांक अति बारीक, पेट पांसली अति गौर । ए छबि रूह रंग तो कहे, जो होवे अर्स सहूर ॥८१॥

बल बल जाऊं मुख सलूकी, बल बल जाऊं रंग छब । बल बल जाऊं तेज जोत की, बल बल जाऊं अंग सब ॥८२॥

स्याम चोली अंग गौर पर, सोभा लेत अतंत । सोहे बेली कटाव, जुबां कहा कहे सिफत ॥८३॥

मोहोरी पेट और खड़पे, चोली नकस कटाव । बाजू खभे उर ऊपर, मानो के फूल जड़ाव ॥८४॥

पांच हार अति सुन्दर, हीरे मानिक मोती लसन । नीलवी हार आसमान लों, जंग पांचों करें रोसन ॥८५॥

इन नंगों जोत तब पाइए, जब नजर दीजे आसमान । सब जोत जंग करत हैं, कोई सके न काहू भान ॥८६॥

जो नंग पेहेले देखिए, पीछे देखिए आकास । तब याही की जोत बिना, और पाइए नहीं प्रकास ॥८७॥

बीच हारों के दुगदुगी, पाच पांने हीरे नंग । माहें लसनिए नीलवी, करें पांचों आपुस में जंग ॥८८॥

पांचों हारों के ऊपर, दोरा देखत जड़ाव । कई बेल फूल पात नकस, कहयो न जाए कटाव ॥८९॥

मोती मानिक पांने लसनिएं, पाच हेम पुखराज । और भूखन कई सोभित, रहया सब पर डोरा बिराज ॥९०॥

कांठले ऊपर चोलीय के, बेल धरत अति जोत । और भी मानिक मोती नीलवी, डोरा तिन पर करे उद्दोत ॥९१॥

चार सरें इत चीड़की, हर सर में रंग दस । सो रंग इन जुबां न आवहीं, रंग रूह चाहिल अर्स ॥९२॥

कण्ठ-सरी इन ऊपर, रही कण्ठ को मिल । न आवे निमूना इनका, जाने आसिक रूह का दिल ॥९३॥

नाम नंगों का लेत हों, केहेत हों जड़ाव जुबांए । सब्दातीत तो कहावत, जो सिफत इत पोहोंचत नाहें ॥९४॥

दोऊ बाजू बन्ध बिराजत, तामें केहेत जड़ाव । माहें रंग नंग कई आवत, ए जड़ाव कहया इन भाव ॥९५॥

जो सोभा बाजू-बन्ध में, हिस्सा कोटमा कहया न जाए । मैं कहूं इन दिल माफक, वह पेहेनत हैं चित्त चाहे ॥९६॥

स्याम सेत लाल नीलवी, बाजू-बंध और फुमक । तिन फुन्दन जरी झलकत, लेत लेहेरी जोत लटकत ॥९७॥

मोहोरी तले जो कंकनी, स्वर मीठे झन बाजत । नंग कटाव ए कांगरी, चूड़ पर जोत अतन्‍त ॥९८॥

चूड़ कोनी काड़े लग, चूड़ी चूड़ी हर नंग । नंग नंग कई रंग उठें, तिन रंग रंग में कई तरंग ॥९९॥

इन विध के रंग इन जुबां, क्यों कर आवे सुमार । न आवे सुमार रंग को, ना कछू जोत को पार ॥१००॥

चूड़ आगूं डोरे दो सोभित, और कंकनी सोभे ऊपर । दोऊ तरफों तेज जोत के, कंकनी बोलत मीठे स्वर ॥१०१॥

डोरे कंचन नंग के, तिन आगूं नवघरी । नव रंग नवघरी मिने, रही आकास जोत भरी ॥१०२॥

पोहोंचे हथेली हाथ के, अतन्त रंग उज्जल । बलि जाऊं छबि लीकों पर, निपट अति कोमल ॥१०३॥

दोऊ हाथ की अंगुरी, पतलियां कोमल । चरन न छूटे आसिक से, इतथें न निकसे दिल ॥१०४॥

पांच पांच अंगुरी जुदी जुदी, अति कोमल छबि अंगुरी । दोऊ अंगूठों आरसी, और आठों रंग आठ मुन्दरी ॥१०५॥

पाच पांने कंचन के, नीलवी और हीरे । लसनिएं और गोमादिक, रंग पीत पोखरे ॥१०६॥

दरपन रंग दोऊ अंगूठी, और नंगों के दरपन । कर सिनगार तामें देखत, नख सिख लग होत रोसन ॥१०७॥

आगूं इन नख जोत के, होवें सूर कई कोट । सो सूर न आवे नजरों, एक नख अनी की ओट ॥१०८॥

ए झूठ निमूना इत का, हक को दिया न जाए । चुप किए भी ना बने, केहे केहे रूह पछताए ॥१०९॥

नीली अतलस चरनियां, कई बेल कटाव नकस । चीन किनारे जो देखों, जानों एक पे और सरस ॥११०॥

माहें बेल फूल कई खजूरे, नंगै के वस्तर । नरम सखत जो दिल चाहे, जोत सुगंध सब पर ॥१११॥

नव रंग इन नाड़ी मिने, ताना बाना सब नंग । जानों बने जवेरन के, नकस रेसम या रंग ॥११२॥

अचरज अदभुत देखत, वस्तर या भूखन । नरम खूबी खुसबोए, भरया आसमान में रोसन ॥११३॥

अर्स में नकल है नहीं, ज्यों अंग त्यों वस्तर भूखन । जब जिन अंग जो चाहिए, तिन सौ बेर होए मिने खिन ॥११४॥

जैसा सुख दिल चाहे, वस्तर भूखन तैसे देत । सब गुन अर्स चीज में, सब सुख इस्क समेत ॥११५॥

ए चरन अंग अर्स के, सब्द न पोहोंचे इत । लाल उज्जल रंग सलूकी, मुख कही न जाए सिफत ॥११६॥

मैं कहूं सिफत सलूकी, पर केहे न सकों क्योंए कर । पूरा एक अंग केहे ना सकों, जो निकस जाए उमर ॥११७॥

जो कदी कहूं नरमाई की, और लीकों सिफत । आए जाए आरबल, सब्द न इत पोहोंचत ॥११८॥

जो कहूं खूबी रंग की, जोत कहूं लाल उज्जल । ए क्यों आवे सब्द में, जो कदम बका नेहेचल ॥११९॥

रंग उज्जल नरमाई क्यों कहूं, और चरन की खुसबोए । ए जुबां अर्स चरन की, क्यों कर बरनन होए ॥१२०॥

फना टाकन घूटियां, और काड़े अति कोमल । रंग सोभा सलूकी छोड़के, आगूं आसिक न सके चल ॥१२१॥

अब कहूं भूखन चरन के, कांबी कड़ली घूंघरी । झलके नंग जुदे जुदे, इन पर झन बाजे झांझरी ॥१२२॥

एक हीरे की झांझरी, दिल रूचती रंग अनेक । नकस कटाव बूटी ले, ए किन विध कहूं विवेक ॥१२३॥

पांच नंग की घूंघरी, दिल रूचती बोलत । दिल चाहे रंग देखावत, दिल चाही सोभित ॥१२४॥

कई रंग कड़ी में देखत, जानों के हेम नंग जड़ित । सो सोभित सब दिल चाहे, नित नए रूप धरत ॥१२५॥

कई बेल कड़ी में पात फूल, सब नंग नकस कटाव । मानो हेम मिलाए के, कियो सो मिहीं जड़ाव ॥१२६॥

या विध कांबी सनंध, या नंग या धात । जैसा दिल में आवत, तैसा तित सोभात ॥१२७॥

घड़े जड़े ना किन किए, दिल चाहया सब होत । दिल चाहया मीठा बोलत, दिल चाही धरे जोत ॥१२८॥

कहूं अनवट पाच के, माहें करत आंभलिया तेज । निरखत नखसिख सिनगार, झलकत रेजा रेज ॥१२९॥

और अंगुरियों बिछिए, करे स्वर रसाल । हीरे और लसनिएं, मानिक रंग अति लाल ॥१३०॥

माहें और रंग हैं कई, कई नकस करें चित्र । सोभा पर बलि जाइए, देख देख एह विचित्र ॥१३१॥

जो सलूकी फनन की, और अंगुरी फनों तली । ए बका बरनन कबूं न हुई, गई अव्वल से दुनी चली ॥१३२॥

सलूकी नखन की, और छबि अंगुरियों । खूबी सिफत चरन की, कही न जाए जुबां सों ॥१३३॥

जोत धरत आकास रोसनी, क्यों कर कहूं नख जोत । मानों सूरज अर्स के, कोटक हुए उद्दोत ॥१३४॥

दोऊ अंगूठे चरन के, और खूबी अंगुरियों । सोभा सुन्दर फनन की, आवत ना सिफत मों ॥१३५॥

मिहीं लीकां देखूं लांक में, इतहीं करूं विश्राम । बल बल जाऊं देख देख के, एही रूह मोमिनों ताम ॥१३६॥

चरन तली लांक एड़ियां, उज्जल रंग अति लाल । केहेते छबि रंग चरन की, अजूं लगत न हैड़े भाल ॥१३७॥

दिल चाही खूबी सलूकी, दिल चाही नरम छब । दिल चाहया रंग खुसबोए, रही दिल चाही अंग फब ॥१३८॥

यों दिल चाहे वस्तर, और दिल चाहे भूखन । जब जिन अंग दिल जो चाहे, सो आगूंहीं बन्यो रोसन ॥१३९॥

जिन अंग जैसा भूखन, दिल चाहया सब होत । खिन में दिल और चाहत, आगूं तैसी करे जोत ॥१४०॥

खिन में सिनगार बदले, बिना उतारे बदलत । रंग तित भूखन नए नए, रंग जो दिल चाहत ॥१४१॥

दिल चाही सोभा धरे, दिल चाही खुसबोए । दिल चाही करे नरमाई, जोत करे जैसी दिल होए ॥१४२॥

रूहें बसत इन कदमों तले, जासों पाइए पेहेचान । सब रूहें नूर इन अंग को, ए नूर अंग रेहेमान ॥१४३॥

ए जो अरवाहें अर्स की, पड़ी रहें तले कदम । खान पान इनों इतहीं, रूहें रहें तले कदम ॥१४४॥

याही ठौर रूहें बसत, रात दिन रहें सनकूल । हक अर्स मोमिन दिल, तिन निमख न पड़े भूल ॥१४५॥

हक कदम हक अर्स में, सो अर्स मोमिन का दिल । छूटे ना अर्स कदम, जो याही की होए मिसल ॥१४६॥

ए चरन राखूं दिल में, और ऊपर हैड़े । लेके फिरों नैनन पर, और सिर पर राखों ए ॥१४७॥

भी राखों बीच नैन के, और नैनों बीच दिल नैन । भी राखों रूह के नैन में, ज्यों रूह पावे सुख चैन ॥१४८॥

महामत कहे इन चरन को, राखों रूह के अन्तस्करन । या रूह नैन की पुतली, बीच राखों तिन तारन ॥१४९॥

॥ प्रकरण ॥९॥ चौपाई ॥७९९॥

इसी सन्दर्भ में देखें-