सिन्धी - प्रकरण १४ | Sindhi prakaran 14
तीन प्रकरण सिंधी के हिन्दुस्तानी में किए हैं
आसिक के गुनाह
सुनो रूहें अर्स की, जो अपनी बीतक । जो हमसे लटी भई, ऐसी करे न कोई मुतलक ॥१॥
कहूं तिनका बेवरा, सुनियो कानों दोए । ए देख्या मैं सहूर कर, तुम भी सहूर कीजो सोए ॥२॥
पीछे जो दिल में आवे साथ के, आपन करेंगे सोए । भूली रोवे तेहेकीक, गए हाथ पटकते रोए ॥३॥
तिस वास्ते क्यों भूलिए, हाथ आए अवसर । जो पीछे जाए पछतावना, क्यों आगे देख न चलें नजर ॥४॥
अपनी गिरो आसिक, कहावत हैं मिने इन । चलना देख के केहेत हों, ए अकल दई तुमें किन ॥५॥
लेनी हकीकत हक की, और देनी इन लोकन । आसिक को ए उलटी, जो करत हैं आपन ॥६॥
मीठा गुझ मासूक का, काहूं आसिक कहे न कोए । पड़ोसी पण ना सुनें, यों आसिक छिपी रोए ॥७॥
आसिक कहिए तिन को, जो हक पर होए कुरबान । सौ भांतें मासूक के, सुख गुझ लेवे सुभान ॥८॥
जो पड़े कसाला कोटक, पर कहे न किन को दुख । किसी सों ना बोलहीं, छिपावे हक के सुख ॥९॥
गुझ सुख लेवे हक के, रहे सोहोबत मोमिन । अपना गुझ मासूक का, कबूं कहें न आगे किन ॥१०॥
तिन आगे भी ना कहे, जो हक के खबरदार । पर कहा कहूं मैं तिनको, जो बाहेर करें पुकार ॥११॥
हक बोलावें सरत पर, आपन रेहेने चाहें इत । लेवें गुझ मासूक का, कहें दुनियां को हकीकत ॥१२॥
ऐसी आसिक कबूं ना करे, पीछे रहे बुलावते हक । दुख कुफर में पड़ के, सुख बका छोड़े इस्क ॥१३॥
प्यारा जिनको मासूक, तिनके प्यारे लगें वचन । सो कबूं न केहेवे और को, मासूक प्यारा जिन ॥१४॥
आसिक कबूं ना करे, ऐसी उलटी बात । केहेने सुख लोकन को, पाए विछोहा हक जात ॥१५॥
आसिक गुझ मासूक का, सो लेवत है रोए रोए । ऐसी उलटी अकल आसिक की, सुख कहे औरों को सोए ॥१६॥
ए निपट बातें रिजालियां, सो आपन करी दिल धर । जैसी हुई हमसे खेल में, तैसी हुई न किनके सिर ॥१७॥
आसिक कहावे आपको, फेरे बोलावना भरतार । जाए न बोलाई खसम की, सो औरत बे-एतबार ॥१८॥
गुझ मासूक का आसिक, सो केहेना न कासों होए । जो कई पड़ें कसाले, तो बाहेर माहें रोए ॥१९॥
एक तो गुझ जाहेर किया, और गैयां न बोलावते सोए । ऐसी एक भी कोई न करे, सो आपन करी दोए ॥२०॥
रूहों को ऐसी न चाहिए, अर्स की कहावें हम । सहूर करके देखिया, तो हम किया बड़ा जुलम ॥२१॥
हम कहें झूठी दुनियाँ, तिनमें ऐसी करे न कोए । जो उलटी हम सांचों से भई, ऐसी झूठों से न होए ॥२२॥
मैं देख तकसीर अपनी, पेहेले देख डरी एक बार । देख डरी सामी हक, तब मैं किया पुकार ॥२३॥
मैं देखें गुनाह अपने, हक के देखे एहसान । उमर गई पुकारते, बीच हलाकी जहान ॥२४॥
कबहूं किनहूं न किए, ऐसे काम अधम । देख गुनाह अपने, फेर किए जुलम ॥२५॥
स्यानी जोरू क्यों करे, जान के गुनाह ए । खावंद जाने त्यों करे, हुआ बस हुकम के ॥२६॥
जो फेर देखें आपन, तो ए हुई हाथ धनी । और किसी का ना चले, कोई करे स्यानप घनी ॥२७॥
मैं देख्या इलम हक का, तो ए सब हुकम के ख्याल । और ना कोई कहूं, बिना हुकम नूरजमाल ॥२८॥
ए गुनाह देखे अपने, जब देख्या दिल धर । ए भी गुनाह खुदीय का, जब फेर देख्या सहूर कर ॥२९॥
गुन्हे भी अपने तब देखे, जब मैं हुई हुसियार । देखी हुसियारी ए भी खुदी, डरी हुई खबरदार ॥३०॥
गुन्हे किए अजान में, गुन्हें देखे सो भी अजान । दम न ले बीच हुकमें, जब हकें पूरी दई पेहेचान ॥३१॥
पेहेचान लई सो भी खुदी, मैं न्यारी हुई तिनसे । न्यारी होत सो भी खुदी, ए खुदी निकलत नाहीं मैं ॥३२॥
महामत कहे ए मोमिनों, कोई नाहीं हक बिगर । लाख बेर मैं देखिया, फेर फेर सहूर कर ॥३३॥
॥ प्रकरण ॥१४॥ चौपाई ॥५५७॥
