सिन्धी - प्रकरण १५ | Sindhi prakaran 15
मैं खुदी की पेहेचान
मैं लाखों विध देखिया, कहूं खुदी क्योंए न जाए । ए क्यों जावे पेड़ से, जो दूजी हकें दई देखाए ॥१॥
जो मैं मांगों इस्क को, तो इत भी आप देखाए । ए भी खुदी देखी, जब इलमें दई समझाए ॥२॥
हक पेहेचान किनको हुई, इत दूसरा कौन केहेलाए । ऐसी काढ़ी बारीकी खुदियां, हक भी पेहेचान कराए ॥३॥
तन तो अपने अर्स में, सो तो सोए नींद में । जागत हैं एक खावंद, ए नींद दई जिनने ॥४॥
दे कर नींद रूहन को, खेल देखावत नजर । तो ए खेल कौन देखत, कोई है बिना हुकम कादर ॥५॥
आपन सोए हैं अर्स में, तले हक कदम । ए जो खेल खेलावे खेलमें, कोई है बिना हक हुकम ॥६॥
इत हुकम एक हक का, और हकै का इलम । हुकम इलम या खेल को, देखो सोइयां तले कदम ॥७॥
कहे इलम तुमहीं पट, तुमहीं कुंजी पट की । कुल्ल अकल दई तुम को, देखो उलटी या सीधी ॥८॥
बीच खेल और खावंद, पट तुमारा वजूद । पीठ दे हक को ए देखत, जो ना कछू है नाबूद ॥९॥
ए खेल हुकम इलम का, हमें नींदमें देखावत । करने हाँसी अर्स में, खेल में भुलावत ॥१०॥
इत दूसरा कोई कहूं नहीं, सब देख्या हुकम इलम । जो ए उड़े नाबूद हुकमें, तो देखो बैठे आगे खसम ॥११॥
हकें द्वार दिया हाथ अपने, और दई इलम पूरी पेहेचान । तो क्यों सहें आड़ा पट, क्यों न खोलें द्वार सुभान ॥१२॥
जो पट खोलों हुकम बिना, लगत खुदी गुन्हे डर । ना तो हाथ कुंजी दई आसिक के, हक बिछोहा सहें क्यों कर ॥१३॥
जो होए मुझपे इस्क, तो देखों न खुदी हुकम । एक नाहीं मोपे इस्क, तो आड़ा देखों हुकम इलम ॥१४॥
ना तो द्वार खोल के, आगे देखें न अर्स रेहेमान । इत क्यों देखों राह हुकम की, हकें दई कुंजी पेहेचान ॥१५॥
गोते न खांऊं बिना जल, जो आवे इस्क । तो हुकम खुदी न कछू गुना, पट दम न रखे बेसक ॥१६॥
इस्क मांगूं तो भी गुना, और खुदी ए भी गुनाह होए । जो देखों हुकम इलम को, मोहे बांध लई बिध दोए ॥१७॥
ए देखो सहूर खुदी मांगना, ए दोऊ तले हुकम । तो खोल दरवाजा अपना, क्यों न मिलों अपने खसम ॥१८॥
खुदी गुना सब हुकमें, मांगूं बोलूं सब हुकम । पट खोलूं या जो करूं, सब हुकम कहे इलम ॥१९॥
इत खुदी न गुनाह किन सिर, या ढांप खोल तेरे हाथ । देख खावंद या खेल को, हुकम इलम तेरे साथ ॥२०॥
सब मोमिनों को सौंपिया, कह्या मोमिन दिल अर्स । देख आप दिल विचार के, दिल मोमिन अरस-परस ॥२१॥
दिल मोमिन का अर्स है, जो देखे अर्स मोमिन । हक चाहें बैठाया अर्स में, तो तेरे आगे ही नहीं ए तन ॥२२॥
महामत कहे ए मोमिनों, हकें हाँसी करी पूरन । देख खावंद या खेल को, ए कुंजी तेरा दिल मोमिन ॥२३॥
॥ प्रकरण ॥१५॥ चौपाई ॥५८०॥
