सिन्धी - प्रकरण १६ | Sindhi prakaran 16
हुकम की पेहेचान
ताला द्वार न कुंजी खोलना, समझाए दई सबों आप । दिल अपने में हक बसें, ज्यों जाने त्यों कर मिलाप ॥१॥
सेहेरग से नजीक, आड़ा पट न द्वार । खोली आँखे समझ कीं, देखती न देखे भरतार ॥२॥
हुकम इलम खेल एकै, और कोई न कहूं दम । इत रूह न कोई रूहन की, जो कछू होए सो हुकम ॥३॥
अपनी सुरतें हुकम, खेलावत हुकम । खेलत सामी हुकमें, ए देखावत तले कदम ॥४॥
अरवाहें जो कोई अर्स की, सो सब हक आमर । हम हुज्जत लई सिर अर्स की, बैठी आगूं हक नजर ॥५॥
अरवा हमारी आमर, गुन अंग इंद्री आमर । हम देखें सब आमर, खेल देखावत पट कर ॥६॥
जो इत अरवा होए अर्स की, तो उड़ावे चौदे तबक । रूहें नाम धराए हम, ऐसा हुकमें कर दिया हक ॥७॥
झूठ न आवे अर्स में, सांच नजरों रहे न झूठ । देख्या अंतर माहें बाहेर, कछू जरा न हुकमें छूट ॥८॥
देख्या देखाया हुकमें, और हम भी भए हुकम । ना हुआ ना है ना होएगा, बिना हुकम खसम ॥९॥
हुकमें देखाया हुकम को, तिन हुकमें देख्या हुकम । भिस्त दोजख उन हुकमें, आखिर सुख सब दम ॥१०॥
जिन नाम धराया हुकमें, रूहें फरिस्ते सिर पर । पोहोंचे अपनी निसबतें, द्वार बका खोल कर ॥११॥
हम उठ बैठे अर्स में, हमको हुकमें दिया सब याद । हुकमें हुकम खेल देखाया, सो हुकमें हुकम आया स्वाद ॥१२॥
यों मिहीं बाते कई हुकम की, हुआ हुकम सबमें एक । अर्समें हम सिर ले उठे, सब सिर ले कहे विवेक ॥१३॥
हम जुदे न हुए अर्स से, और जुदे हुए बेसक । हम रूहें खेल देख्या नहीं, और खेल की बातें करी मुतलक ॥१४॥
इन विध सब हुकमें कर, खेल देखाया खिलवत अंदर । बातें खिलवत की करीं खेलमें, जो गुझ हक के दिल भीतर ॥१५॥
और खेल की बातें सब, होसी बीच खिलवत । लेसी खेलका सुख खिलवत में, लिया खेलमें सुख निसबत ॥१६॥
छोड़या नहीं अर्स को, और खेलमें भी गैयां । अंतराए भी हुई अर्स से, और जुदियां भी न भैयां ॥१७॥
ए विध सब हुकम की, हुकमें किए बनाए । वास्ते इस्क रब्द के, दोऊ ठौर दिए देखाए ॥१८॥
और साहेबी अपनी, देखाई नीके कर । क्यों कहूं बड़ाई हक की, मेरा खसम बड़ा कादर ॥१९॥
महामत कहे ए मोमिनों, हकें बैठाए तले कदम । करसी हाँसी बीच अर्स के, जो करी हुकमें इलम ॥२०॥
॥ प्रकरण ॥१६॥ चौपाई ॥६००॥
प्रकरण तथा चौपाइयों का संपूर्ण संकलन
प्रकरण ४८४, चौपाई १६९७६
॥ सिंधी सम्पूर्ण ॥
