सिनगार - प्रकरण १० | Singaar prakaran 10
श्री राजजी की इजार
असल इजार एक पाच की, एकै रस सब ए । कई बेल पात फूल बूटियां, रंग केते कहूं इनके ॥१॥
बेल मोहोरी इजार की, जानों एही भूखन सुन्दर । अतंत सोभा सब से, एही है खूबतर ॥२॥
इजार बंध नंग कई रंग, कई बूटी कई नकस । निरमान न होए इन जुबां, ए वस्तर अजीम अर्स ॥३॥
अति सोभा अति नरमाई, नंग सोभित नरम पसम । अर्स चीज न आवे सब्द में, ए नेक केहेत हुकम ॥४॥
बेल पात फूल कई विध के, कई विध कांगरी इत । जोत न नरमाई सुमार, जुबां क्या कहे सिफत ॥५॥
नेफा रंग कसूंब का, अति खूबी अतलस । बेल भरी मोती कांगरी, जानों ए भूखन से सरस ॥६॥
ताना बाना रंग रेसम, जवेर का सब सोए । बेल फूल बूटी तो कहूं, जो मिलाए समारे होए ॥७॥
॥ प्रकरण ॥१०॥ चौपाई ॥५५५॥
