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विषय-सूची

सिनगार - प्रकरण १२ | Singaar prakaran 12

खभे कण्ठ मुखारविंद सोभा समूह

॥ मंगला चरन ॥

मुख मेरे मेहेबूब का, रंग अति उज्जल गुलाल । क्यों कहूं सलूकी नाजुकी, नूर तजल्ली नूरजमाल ॥१॥

बांहें मेरे मासूक की, प्यारी लगें मेरी रूह । हक हुकम यों कहावत, सो वाही जाने हकहू ॥२॥

अंग रंग सलूकी सुभान की, चकलाई उज्जल गौर । नाम सुनत इन अंग के, जीवरा न होत चूर चूर ॥३॥

ए छबि अंग अर्स के, जोत अंग हक मूरत । ए केहेनी में आवे क्यों कर, जो कही अमरद सूरत ॥४॥

खभे देत दोऊ खूबियां, रूह देख देख होए खुसाल । जो नेक आवे अर्स की लज्जत, तो रोम रोम लगे रूह भाल ॥५॥

खभे मच्छे कोनिया, और कलाइयां काड़न । पोहोंचे हथेली अंगुरी, नूर क्यों कर कहूं नखन ॥६॥

जोत नखन की क्यों कहूं, अवकास रहयो भराए । तामें जोत नखन की, नेहेरें चलियां जाए ॥७॥

ज्यों ज्यों हाथ की अंगुरी, होत है चलवन । त्यों त्यों नख जोत आकास में, नेहेरें चीर चली रोसन ॥८॥

एक अंग जो निरखिए, तो निकस जाए उमर । एक अंग बरनन ना होवहीं, तो होए सरूप बरनन क्यों कर ॥९॥

अति गौर हस्त कमल, अति नरम अति सलूक । ए हस्त चकलाई देखके, जीवरा होत नहीं टूक टूक ॥१०॥

काड़े कलाई कोनियां, इन अंग रंग सलूक । फेर मच्छे खभे लग देखिए, रूह क्यों न होए भूक भूक ॥११॥

ए अंग सारे रस भरे, सब संधों संध इस्क । सहूर किए जीवरा उड़े, अर्स अंग वाहेदत हक ॥१२॥

जीवरा न समझे अर्स को, ना सहूर करे वाहेदत । रूहें भूल गई लाड़ लज्जत, ना सुध रही निसबत ॥१३॥

॥ मंगला चरन तमाम ॥

अब कहूं कण्ठ सोभा मुख की, और इस्क सबों अंग । आसिक दिल छबि चुभ रही, मासूक रूप रस रंग ॥१४॥

ए जो कोमलता कण्ठ की, क्यों कहूं चकलाई गौर । नेक कह्या जात ख्वाब में, जो हकें दिया सहूर ॥१५॥

गौर केहेती हों मुखसे, सो देख के अंग इतका । ए जुबां दृष्ट इत फना की, सोभा क्यों कहे कण्ठ बका ॥१६॥

कण्ठ गौर कई सुख देवहीं, जो कछू खोले रूह नजर । सो होत हक के हुकमें, जिन ने करी नजीक फजर ॥१७॥

ए जो लज्जत लाड़ की, सोभी हुई हाथ इजन । जिन निसबतें बेसक करी, ताए क्यों न आवे लज्जत तन ॥१८॥

ना तो बेसक जब निसबत, तब रूह क्यों करे फरामोस । ए देह जो सुपन की, खिन में उड़ावे हक जोस ॥१९॥

ए जो देखो सहूर करके, भई आड़ी हक आमर । ना तो बल करते धनी बेसक, ए देह ख्वाब रहे क्यों कर ॥२०॥

प्रीत रीत इस्क की, इस्कै सहज सनेह । निस दिन बरसत इस्क, नख सिख भीगे सब देह ॥२१॥

भौं भृकुटी पल पापण, मुसकत लवने निलवट । इन विध जब मुख निरखिए, तब खुलें हिरदे के पट ॥२२॥

छब फब नई एक भांत की, श्रवन गाल मुसकत । लाल अधुर मुख नासिका, जानों गौर हरवटी हँसत ॥२३॥

हाथ पांउं पेट हैयड़ा, कण्ठ हार भूखन वस्तर । ए सब अंग हक के मुसकत, और नाचत हैं मिलकर ॥२४॥

बल बल जांउं मुख हक के, सोभा अति सुन्दर । ए छबि हिरदे तो आवहीं, जो रूह हुकमें जागे अंदर ॥२५॥

हक मुख छब हिरदे मिने, जो आवे अंतस्करन । तिन भेली लज्जत लाड़ की, आवे अर्स के अंग वतन ॥२६॥

गौर मुख लाल अधुर, ए जो सलूकी सोभित । एह जुबां तो केहे सके, जो कोई होए निमूना इत ॥२७॥

कहे जांए न गौर गलस्थल, और अधुर लालक । मुख चकलाई हक की, सब रस भरे नूर इस्क ॥२८॥

लाल जुबां दंत अधुर, हरवटी गौर हँसत । जब बातून नजरों देखिए, तब रूह सुख पावत ॥२९॥

अधुर हरवटी बीच में, क्यों कहूं लांक सलूक । एही अचरज मोहे होत है, दिल देख न होत भूक भूक ॥३०॥

दोऊ छेद्र चकलाई नासिका, गौर रंग उज्जल । तिलक निलाट कई रंगों, नए नए देखत मांहें पल ॥३१॥

नैन रस भरे रंगीले, चंचल चपल भरे सरम । ए अरवाहें जानें अर्स की, जो मेहेरम बका हरम ॥३२॥

नेत्र अनियां अति तीखियां, रस इस्क भरे पूरन । ए खैंचें जिन रूह ऊपर, ताए सालत हैं निस दिन ॥३३॥

स्याम सेत भौंह लवने, नेत्र गौर गिरदवाए । स्याह पुतली बीच सुपेत में, जंग जोर करत सदाए ॥३४॥

सोभा धरत अति श्रवनों, मोती उज्जल बीच लाल । ए मुख रूह जब देखहीं, बल बल जाऊं तिन हाल ॥३५॥

प्यारी बातें करे जब आसिक, हेतें सुनत हक कान । क्यों कहूं सुख तिन रूह के, जो प्यार कर सुनें सुभान ॥३६॥

रूह बात करे एक हक सों, हक देत पड़उत्तर चार । कुरबान जाऊं हक हादी की, जासों हक करें यों प्यार ॥३७॥

ए छबि अंग अर्स के, जो अंग हक मूरत । ए केहेनी में आवे क्यों कर, जो कही अमरद सूरत ॥३८॥

कांध केस पेच पगरी, पीठ लीक रूप रंग । हाए हाए जीवरा ना उड़े, केहेते अर्स रेहेमानी अंग ॥३९॥

पाग सोभित सिर हक के, बनी हक दिल चाहेल । सो इन जुबां क्यों केहे सके, जाकी दृष्ट अंग इन खेल ॥४०॥

दुगदुगी सोभा तो कहूं, जो पगड़ी सोभा होए और । जोत करे हक दिल चाही, कोई तरफ बनी इन ठौर ॥४१॥

ए क्यों आवे जुगत जुबां मिने, क्यों कहूं एह सलूक । जो ए तरह आवे रूह दिल में, तो तबहीं होवे टूक टूक ॥४२॥

इन पागै में है दुगदुगी, बनी पागै में कलंगी । ए जंग करे जोत जोत सों, ए बनायल हक दिल की ॥४३॥

कई जिनसें कई जुगतें, कई तरह भांत सलूकी ए । कई रंग नंग तेज रोसनी, नूर छायो अंबर जिमी जे ॥४४॥

जित चाहिए ठौर दुगदुगी, सब बनी पाग पर तित । ठौर कलंगी के कलंगी, सिफत न जुबां पोहोंचत ॥४५॥

कई सुख सलूकी इन पाग में, मैं तो कहूं बिध एक । दिल चाही रूह देखत, एक खिन में रूप अनेक ॥४६॥

ना कछु खोली ना फेर बांधी, इन पागै में कई गुन । पल पल में सुख दिल चाहे, नए नए देत रूहन ॥४७॥

या विध के सुख देत हैं, वस्तर या भूखन । सुख हक सरूप सिनगार के, किन विध कहूं मुख इन ॥४८॥

तिलक नासिका नेत्र की, केस लवने कांन गाल । मुख चौक देख नैन रूह के, रोम रोम छेदे ज्यों भाल ॥४९॥

मुख सुन्दरता क्यों कहूं, नूरजमाल सूरत । ए बयान दुनी में क्यों करूं, ए जो आई अर्स न्यामत ॥५०॥

ए मुख देख सुख पाइए, उपजत है अति प्यार । देख देख जो देखिए, तो रूह पावे करार ॥५१॥

जो देखूं मुख सलूकी, तो चुभ रहे रूह मांहें । जो सुख मुख अर्स का, केहे ना सके जुबांएँ ॥५२॥

गौर निलवट रंग उज्जल, जाऊं बल बल मुखारबिंद । ए रस रंग छबि देखिए, काढ़त विरहा निकन्द ॥५३॥

जो मुख सोभा देखिए, तो उपजत रूह आराम । आठों पोहोर आसिक, एही मांगत है ताम ॥५४॥

जो गौर रंग देखिए, जुबां कहा कहे हक मान । और कछू न देवे देखाई, आगूं अर्स सुभान ॥५५॥

हँसत सोभित मुख हरवटी, अति सुन्दर सुखदाए । हाए हाए रूह नजर यासों बांधके, क्यों टूक टूक होए न जाए ॥५६॥

अति गौर सुन्दर हरवटी, और अतंत सोभा सलूक । बड़ा अचरज ए देखिया, जीवरा सुनत न होए टूक टूक ॥५७॥

हरवटी अधुर बीच लांक जो, मुख अधुर दोऊ लाल । ए लाली मुख देखे पीछे, हाए हाए लगत न हैड़े भाल ॥५८॥

सोभित हँसत हरवटी, बड़ी अचरज सलूकी मुख । रूह देखे अन्तर आंखां खोलके, तो उपजे अर्स सुख ॥५९॥

क्यों कहूं गौर गालन की, सोभित अति सुन्दर । जो देखूं नैना भरके, तो सुख उपजे रूह अन्दर ॥६०॥

क्यों कहूं गाल की सलूकी, क्यों कहूं गाल का रंग । अनेक गुन गालन में, ज्यों जोत किरन रंग तरंग ॥६१॥

बारीक सुख सरूप के, कोई जाने रूह मोमिन । इस्क इलम जोस याही को, जाके होसी अर्स में तन ॥६२॥

ए मुख अचरज अदभुत, गुन केते कहूं गालन । ए रूहें जाने सुख बारीक, हर गुन अनेक रोसन ॥६३॥

रूह के नैना खोल के, देखूं दोऊ गाल । आसिक को मासूक का, कोई भेद गया रंग लाल ॥६४॥

गाल रंग अति उज्जल, गेहेरा अति कसूंबाए । मेहेबूब मुख देखे पीछे, रूह खिन न सहे अंतराए ॥६५॥

ए अंग अर्स सरूप के, क्यों होए बरनन जिमी इन । ए अचरज अदभुत हकें किया, वास्‍ते अरवा अर्स के तन ॥६६॥

महामत हुकमें केहेत हैं, हक बरनन किया नेक । और भी कहूं हक हुकमें, अब होसी सब विवेक ॥६७॥

॥ प्रकरण ॥१२॥ चौपाई ॥७०८॥

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