सिनगार - प्रकरण १६ | Singaar prakaran 16
हक मासूक की जुबान की सिफत
जाको नामै रसना, होसी कैसी मीठी हक । जिन की जैसी बुजरकी, जुबां होत है तिन माफक ॥१॥
केहेनी में न आवहीं, विचार देखें मोमिन । होए जाग्रत अरवा अर्स की, कछू सो देखे रसना रोसन ॥२॥
अति मीठी जुबां मासूक की, देत आसिक को सुख । कछू अर्स सहूरें सुख लीजिए, पर कह्यो न जाए या मुख ॥३॥
ए याद किए हक रसना, आवत है इस्क । जिन इस्कें अर्स देखिए, सुख पाइए हक मुतलक ॥४॥
और सुख हक दिल में, जाहेर होत रसनाए । एह सिफत किन बिध कहूं, जो रेहेत हक मुख मांहें ॥५॥
बोहोत सुख हक तन में, जाहेर करें हक नैन । सब पूरा सुख तब पाइए, जब कहे रसना मुख बैन ॥६॥
हर अंग सुख दें हक के, ऊपर जाहेर सुख जुबान । बड़ा सुख रूहों होत है, जब हक मुख करें बयान ॥७॥
ए बेवरा पाइए बीच खेल के, कम ज्यादा अर्स में नाहें । समान अंग सब हक के, ए विचार नहीं अर्स मांहें ॥८॥
बोहोत बातें सुख अर्स के, सो पाइयत हैं इत । सुख उमत को अर्स में, ए जानती न थीं निसबत ॥९॥
सुख जानें न हक पातसाही, सुख जानें न हक इस्क । सुख जानें ना रूहें लाड़ के, तो इत इलम दिया बेसक ॥१०॥
तो हक अंग सुख खेल में, बेवरा करत हुकम । अजूं न आवे नजरों सरूप, ना तो क्यों वरनवाए खसम ॥११॥
हकें हम रूहों वास्ते, अनेक वचन कहे मुख । सो रूहें जागे हक इस्क का, आपन लेसी अर्स में सुख ॥१२॥
सुख अनेक दिए हक रसनाएँ, और सुख अलेखे अनेक । सो जागे रूहें सब पावहीं, ताथें रसना सुख विसेक ॥१३॥
हकें खेल देखाया याही वास्ते, सुख देखावने अपने अंग । सुख लेसी बड़ा इस्क का, रूहें ले विरहा मिलसी संग ॥१४॥
दायम इस्क सबों अपना, रूहें केहेती अपनी जुबान । याही रसना बल वास्ते, खेल देखाया सुभान ॥१५॥
एक हुकम जुबां के सब हुआ, तिन हुकमें चले कई हुकम । सो जेता सब्द दुनीय में, ए सब हम वास्ते किया खसम ॥१६॥
हक जुबान की बुजरकी, किया खेल में बड़ा विस्तार । सो सुख लेसी हम अर्स में, जिन को नहीं सुमार ॥१७॥
जेती चीज जरा कोई खेल में, सो हक हुकमें हलत चलत । सो सुख दिए हक रसनाएं, हम केती करें सिफत ॥१८॥
कलाम अल्ला या हदीसें, सास्त्र पुरान या वेद । ए सब सुख लेवे मोमिन, हक रसना के भेद ॥१९॥
खेल किया याही वास्ते, हकें सुख दिए जुबान । सो मेरी इन जुबान सों, क्यों कर होए बयान ॥२०॥
ए बयान होसी बीच अर्स के, हम रूहें मिल जासी जब । हक जुबान का बेवरा, हम लेसी अर्स में तब ॥२१॥
बड़े बयान बातें कई, जो हक जुबांएँ दिए इत । इत बेवरा कर जाए अर्स में, लेसी लज्जत बीच खिलवत ॥२२॥
ए बारीक सुख अर्स के, हक जुबांएँ दई न्यामत । और न कोई पावहीं, बिना हक निसबत ॥२३॥
हक रूहों को बुलाए के, नजीक बैठाई ले । ए जाहेर करत है रसना, ए जो अन्तर का सनेह ॥२४॥
मीठी जुबां बोलत मासूक, रूहें प्यारी आसिक सों । ऐसा मीठा अर्स खावंद, जाके बोल चुभें हिरदे मों ॥२५॥
प्यारी रसना सों अनेक, प्यारी बातें करें बनाए । प्यारे प्यारी रूह बीच में, ए गुन जुबां किने न गिनाए ॥२६॥
मीठी जुबां मीठे वचन, मीठा हक मीठा रूहों प्यार । मीठी रूह पावे मीठे अर्स की, जो मीठा करे विचार ॥२७॥
प्यारी खिलवत में प्यारी रसना, होत वचन कदीम । सो इन जुबां प्यार क्यों कहूं, जो हक हादी रूहें हलीम ॥२८॥
सब अंग जिनके इस्क के, तिनकी कैसी होसी जुबान । अर्स रूहें जानें जाग्रत, जो रहें सदा कदमों सुभान ॥२९॥
मेरी रूह देखे सहूर कर, जाके नख सिख लग इस्क । जुबां कैसी तिन होएसी, और बानी बका अर्स हक ॥३०॥
हक रसना बोले जो अर्स में, जिन किन को वचन । सो सब कारन जानियो, वास्ते सुख रूहन ॥३१॥
खेलावत हक बोलाए के, या पंखी या पसुअन । सो सब रूहों वास्ते, सब को एह कारन ॥३२॥
खेलते बोलते नाचते, या देखें खेल लराए । सो सब वास्ते रूहन के, कई विध खेल कराए ॥३३॥
कहूं केती बातें हक रसना, निपट बड़ो विस्तार । क्यों कहूं जो किए रूहों सों, हक जुबां के प्यार ॥३४॥
हक रसना गुन खेल में, पाव हरफ को होए न सुमार । तो जो गुन रसना अर्स में, ताको क्यों कर पाइए पार ॥३५॥
ए बेवरा जानें रूहें अर्स की, जा को हुआ हक दीदार । जाए सिफायत हुई महंमद की, याको जाने सोई विचार ॥३६॥
हक रसना गुन जानें रूहें, जा को निस दिन एही ध्यान । ए खेल कबूतर क्या जानहीं, हक रसना के बयान ॥३७॥
जो कछू बोले हक रसना, सो सब वास्ते रूहन । और जरा हक दिल में नहीं, ए जानें दिल अर्स मोमिन ॥३८॥
जो कछू बोलें हक जुबांन, सो सब रूहों के हेत । अर्स बोल खेल या चलन, या जो कछू लेत देत ॥३९॥
हुकम कहावे मेरी रूह पे, जो हुई मुझमें बीतक । सो कहूं अर्स रूहों को, जो दिए सुख रसना हक ॥४०॥
हक रसना के सुख जो, आवे ना गिनती मांहें । कई सुख अलेखे अपार, क्यों कहे जाएँ जुबांएँ ॥४१॥
मीठी मीठी मांहें मीठी मीठी, रस रसीली रसना बान । सुख सुखके मांहें कई सुख, सुख क्यों कहूं रसना सुभान ॥४२॥
मोहे इलम दिया आए अपना, तासों प्यार दिया मुझको । चौदे तबक कायम किए, केहेलाए मेरी रसना सों ॥४३॥
एक नुकते इलम अपने, दुनी बका कराई मुझसे । तो गंज अंबार जो सागर, कैसे होसी हक दिल में ॥४४॥
जो कोई सब्द बीच दुनियां, सो उठे हुकम के जोर । ए गुझ सुख हक रसना, कछू मोमिन जानें मरोर ॥४५॥
बका करी जो दुनियां, दिया सब को हक इलम । सो इलम सिफत करे हमारी, हुकमें किया वास्ते हम ॥४६॥
ए जो बका किए हम वास्ते, जाने कायम होए सिफत । सिफत फना की ना रहे, ए हुकमें हम को दई न्यामत ॥४७॥
मेहेर करी हक रसनाएं, सो किन विध कहूं विस्तार । बका सब्द जो उचरे, सो देने रूहों सुख अपार ॥४८॥
सब के हक हमको किए, हक रसनाएं बीच बका । ए सुख इन मुख क्यों कहूं, जो दिया हादी रूहों को भिस्त का ॥४९॥
अर्स के सुख तो हमेसा, घट बढ़ इत नाहें । पर ए नया सुख नई साहेबी, कायम कर दिया भिस्त मांहें ॥५०॥
अर्स सुख और भिस्तका सुख, ए खेल में दिए सुख दोए । इन दोऊ में दिए सुख खेलके, ए हक रसना बिना क्यों होए ॥५१॥
दई भिस्त चौदे तबक को, सबों पूरा इस्क इलम । सो सब सेवें हम को, सबों बल रसना खसम ॥५२॥
पेहेले प्यार दिया मुझे इलम सों, सो मुझपे इलम दिवाए । सब दुनियां को आरिफ कर, मुझ आगे सबपे कथाए ॥५३॥
ए सब हक रसनाएं किया, इलम प्यारा लग्या सबन । सो इलमें आरिफ पूजें मोहे, असल अर्स में हमारे तन ॥५४॥
प्यार लग्या मोहे जिनसों, हकें बड़ा किया सोए । सो सबपे केहेलाए हुकमें, सब विध सुख दिया मोहे ॥५५॥
ए सुध नहीं अजूं मोमिनों, जो सुख दिए हक रसनाएँ । हकें सुख दिए आप माफक, सो कह्या जाए न इन जुबांएँ ॥५६॥
कर कायम हक रसना रस, सचराचर दिए पोहोंचाए । यों रसना के रस हम को, सुख कई विध दिए बनाए ॥५७॥
सबों इलम पढ़ाए आलम किए, जिनसों था मेरा प्यार । सो सुख हक रसनाएं दिया, करके बका विस्तार ॥५८॥
ए कायम सुख हक तरफ के, हक इलम इस्क हुकम । सुख लाड़ लज्जत हुज्जत के, दिए कायम मेरे खसम ॥५९॥
सुध न हुती हक साहेबी, ना सुध इलम वाहेदत । सुध ना हुज्जत निसबत, सो सुध दई जुबां खिलवत ॥६०॥
हक बका सुख कई विध, अर्स में नहीं सुमार । बिन बूझे सुख हम लेते, हुते न खबरदार ॥६१॥
सो आठों भिस्त कायम कर, दिए अर्स पट खोल मारफत । तिनमें पुजाए सुख दिए, कर जाहेर हक निसबत ॥६२॥
हक रसना सुख दिए देत हैं, और सुख देंगे आगूं जे । सो इतथें सब हम देखत, सुख केते कहूं रसना के ॥६३॥
हक रसनाएं ऐसी सुध दई, हुआ है होसी बका मांहें । यों खोली अंतर रूह नजर, ऐसी हुई ना रूहों सों क्यांहें ॥६४॥
कहूं केते सुख हक रसना, जैसे आप अलेखे अपार । सो सब सुख बका में रूहों, जा को होए न काहूं सुमार ॥६५॥
ए नेक कह्या बीच खेल के, हक रसना के गुन । ए सब बातें मिल करसी, आगूं हक बका वतन ॥६६॥
सुनो महामत रसना रस, और सुनाइयो मोमिन । जो हुकम कहे तोहे हेत कर, हक रसना के गुन ॥६७॥
॥ प्रकरण ॥१६॥ चौपाई ॥८८२॥
