सिनगार - प्रकरण १९ | Singaar prakaran 19
जोबन जोस मुख बीड़ी छबि
फेर फेर पट खोलें हुकम, निसबत जान रूहन । हक मुख अंग इस्क के, ले देखिए अर्स अंग तन ॥१॥
हक बरनन जिमी सुपने, हुकमें कह्या नेक सोए । हक इस्क एक तरंग से, रूह निकस न सके कोए ॥२॥
सुन्दर मुख मासूक का, और अंग सबे सुन्दर । सो क्यों छूटे आसिक से, जब चुभे हैड़े अन्दर ॥३॥
क्यों कहूं मुख की सलूकी, और क्यों कहूं सुन्दरता । ए आसिक जाने मासूक की, जिन घट लगे ए घा ॥४॥
मुख चौक सलूकी क्यों कहूं, कछू जानें रूह के नैन । ए सुख सोई जानहीं, जासों हक करें सामी सैन ॥५॥
सुख पाइए देखें हरवटी, मुख लांक लाल अधुर । दन्त जुबां बीच तंबोल, मुख बोलत मीठा मधुर ॥६॥
मुख मूंदे अधुर बोलत, बानी प्रेम रसाल । आसिक को छबि चुभ रही, जानों हैड़े निस दिन भाल ॥७॥
सहूर कीजे हक अंग रंग, कई तरंग लाल उज्जल । देत गौर सुख सलूकी, सोभा क्यों कहूं बिना मिसल ॥८॥
हक मुखथें बोलें वचन, स्वर मीठा निकसत । सो सुनत अर्स रूहों को, दिल उपजे हक लज्जत ॥९॥
हक स्वर कैसा होएसी, और कैसी होसी मुख बान । सुख बातें क्यों कहूं रसना, चाहे दिल सुनने सुभान ॥१०॥
हक नेक नैन मरोरत, होत रूहों सुख अपार । तो बात कहें सुख हक के, सो क्यों कहूं सुख सुमार ॥११॥
एक रोम रोम हक अंग के, सब सुखै के अम्बार । तो सुख सरूप नख सिखलों, रूहें कहा करें दिल विचार ॥१२॥
ज्यों रोम सुपन के अंग को, त्यों रोम न अर्स अंग पर । सब अंग इस्क वास्ते, रोम रोम कहे यों कर ॥१३॥
अर्स पसु या जानवर, रोम होत तिन अंग । रोम न रूहों अंग पर, रूहें अंग जानें अर्स नंग ॥१४॥
जवेर पैदा जिमीय से, यों अर्स में पैदा न होत । ए खूबी हक जहूर की, सो लिए खड़ी सदा जोत ॥१५॥
याको नंग निमूना न दीजिए, अर्स रूहें वाहेदत । इने मिसाल न कोई लागहीं, जाकी हक हादी जात निसबत ॥१६॥
जो देऊं निमूना अर्स का, तो रूहों लगत न कोई बात । रूहें अंग हादीय को, हादी अंग हक जात ॥१७॥
तिरछा नेक जो मुसकत, तो मार डारत मुतलक । जो कदी सनमुख होए यों रूह सों, तो क्यों जीवे रूह आसिक ॥१८॥
आसिक अटके सब अंगों, देख देख रूप सलूक । एक नेक अंग के सुख में, रूह हो जात टूक टूक ॥१९॥
सब अंग देखे रस भरे, प्रेम के सुख पूरन । रूह सोई जाने जो देखहीं, ए पीवत रस मोमिन ॥२०॥
गौर गाल मुख उज्जल, मांहें गेहेरी लालक ले । ए जुबां सुख सोभा क्यों कहे, अर्स अंग हक के ॥२१॥
रूह आसिक जिन अंग अटकी, छूटत नहीं क्यों ए सोए । ए किसी बातों आसिक सों, अंग मासूक जुदे न होए ॥२२॥
जेते अंग मासूक के, रूह आसिक रहे तिन मांहें । रूह आसिक और कहूं ना टिके, अपने अंग में भी नाहें ॥२३॥
करते बातें प्यारी मासूक, हाथ करें चलवन । नेत्र भी वाही तरह, चूभ रेहेत रूह के तन ॥२४॥
सब अंग हक के इस्क भरे, क्यों कर जाने जांए । होए रूह जाग्रत अर्स की, ताए हुकम देवे बताए ॥२५॥
जब बात करें हक रूह सों, तब अंग सबे उलसत । करते बातें छिपे नहीं, हक अंगों इस्क सिफत ॥२६॥
नेत्र कहे और नासिका, हाथ कहे और मुख । और अंग सबे याही विध, केहेते बातें दे सब सुख ॥२७॥
सब अंग करत इसारतें, हक अंग रूह सों लगन । ए बारीक बातें अर्स की, कोई जाने जाग्रत मोमिन ॥२८॥
हक अंग जोत की क्यों कहूं, जो नूर नूर का नूर । अंग मीठे प्यारे सुख सलूकी, दे हक हुकम सहूर ॥२९॥
कैसी मीठी बानी हक की, कहे प्रेम वचन श्री मुख । निसबत जान रमूज के, देत रूहों को सुख ॥३०॥
हक प्रेम वचन मुख बोलते, जोर आवत है जोस । ए बानी रूह को विचारते, हाए हाए अजूं उड़े ना फरामोस ॥३१॥
जब जोस आवे हक बोलते, प्रेम सों गलित गात । तिन समें मुख मासूक का, मार डारत निघात ॥३२॥
हक अंग सब नाचत, जोस आवत है जब । करें बातें रूह सों उमंगें, मुख छबि देखी चाहिए तब ॥३३॥
जोस हमेसा हक को, रेहेत सदा पूरन । पर आसिक देखे इन विध, रंग चढ़ता रस जोबन ॥३४॥
सरूप मुख नख सिखलों, जोबन जिनस जुगत । ए आसिक अंग अर्सके, चढ़ती जोत देखत ॥३५॥
जोत तेज धात रंग रस, रूह बढ़ता देखे दायम । अंग अर्स इसी रवेस, यों देखे सूरत कायम ॥३६॥
चढ़ता रंग रस तो कहूं, जो होए नहीं पूरन । पर आसिक जाने मासूक की, नित चढ़ती देखे रोसन ॥३७॥
एही लछन आसिक के, सब चढ़ते देखे रंग । तेज जोत रस धात गुन, और सब पख इंद्री अंग ॥३८॥
हक रस रंग जोस जोबन, चढ़ता सदा देखत । अर्स अरवा रूहन को, हक प्रेमें देत लज्जत ॥३९॥
घट बढ़ अर्स में है नहीं, हक पूरन हमेसा । हम इस्कें लें यों अर्स में, सब सुख पूरनता ॥४०॥
बीड़ी लई जिन हाथ सों, सोभित पतली अंगुरी । तिन बीच जोत नंगन की, अति झलकत हैं मुंदरी ॥४१॥
बीड़ी मुख में मोरत, सुन्दर हरवटी हँसत । सोभा इन मुख क्यों कहूं, जो बीच में बात करत ॥४२॥
एक लालक तंबोल की, क्यों कहूं अधुर दोऊ लाल । दंत सोभित मुख मोरत, खूबी ना इन मिसाल ॥४३॥
लाल उज्जल दोऊ रंग लिए, बीड़ी लेत मुख अंगुरी नरम । नेक मुख मूंदे बोलत, अति सुन्दर मुख सरम ॥४४॥
नेक खोलें अधुर मुख बोलत, करें प्यारी बातें कर प्यार । सो सुख देत आसिकों, जिन को नहीं सुमार ॥४५॥
सुख देत सब अंग मिल, नैन नासिका श्रवन अधुर । हँसत हरवटी भौं भृकुटी, सब दें सुख बोल मधुर ॥४६॥
अदभुत सलूकी इन समें, आसिक पावत आराम । आठों जाम हिरदे रूह के, जानों नकस चुभ्या चित्राम ॥४७॥
फेर फेर ए मुख निरखिए, फेर फेर जाऊं बलिहार । ए खूबी खुसाली क्यों कहूं, इन सुख नाहीं सुमार ॥४८॥
अधबीच आरोगते, मेवा काढ़ देत मुख थें । सरस मेवा केहे देत हैं, आप हाथ मेरे मुख में ॥४९॥
रंग रस यों केहेत हों, ए जो मेहेर करत मेहेरबान । ए भूल गैयां हम लाड़ सबे, ना तो क्यों रहे खिन बिन प्रान ॥५०॥
और काम हक को कोई नहीं, देत रूहों सुख बनाए । वाहेदत बिना हक दिल में, और न कछुए आए ॥५१॥
सुख देना लेना रूहों सों, और रूहों सों वेहेवार । ए अर्स बातें इन जिमिएँ, कोई बिना रूह न लेवनहार ॥५२॥
कोई काम न और रूहों को, एक जानें हक इस्क । आठों जाम चौसठ घड़ी, बिना प्रेम नहीं रंचक ॥५३॥
हक जात वाहेदत जो, छोड़े ना एक दम । प्यार करें मांहों-मांहें, वास्ते प्यार खसम ॥५४॥
हक अंग चलत मुख बोलते, तब जान्या जात गुझ प्यार । ए अरवा अर्स की जानहीं, जा को निसदिन एह विचार ॥५५॥
हक नरम पांउं उठाए के, और धरत जिमी पर । ए अर्स बीच मोमिन जानहीं, जिन को खुसबोए आई फजर ॥५६॥
हक धरत पांउं उठावत, तब जानी जात चतुराए । सो समझें हक इसारतें, जो होए अर्स अरवाए ॥५७॥
कैसे लगें पांउं चलते, वह कैसी होसी भोम । चलते देखे हक चातुरी, हाए हाए घाए न लगे रोम रोम ॥५८॥
इजार देखत पांउं में, लेत झांई जामें पर । हाए हाए खूबी इन चाल की, ए जुबां कहे क्यों कर ॥५९॥
स्वर भूखन मधुरे सोहे, ए तरह चलत जो हक । ए जो देखे रूह नजर भर, तो चाल मार डारत मुतलक ॥६०॥
नख अंगूठे अंगुरियां, चलते अति सोभित । चाल विचारते अर्स की, हाए हाए अरवा क्यों न उड़त ॥६१॥
अर्स दिल मोमिन कह्या, ठौर बड़ी कुसाद । हक हादी रूहें मांहें बसें, असल अर्स जो आद ॥६२॥
जेता मता हक का, सो सब अर्स में देख । सो सब मोमिन दिल में, पाइए सब विवेक ॥६३॥
हक हादी रूहें खेलैं, उठें बैठें दौड़ें करें चाल । ए जानें अरवाहें अर्स की, जो रेहेत हमेसा नाल ॥६४॥
जो तोहे कहे हक हुकम, सो तूं देख महामत । और कहो रूहन को, जो तेरे तन वाहेदत ॥६५॥
॥ प्रकरण ॥१९॥ चौपाई ॥१०६४॥
