सिनगार - प्रकरण २ | Singaar prakaran 2
हुकमें इस्क का द्वार खोल्या है
अब हुकमें द्वारा खोलिया, लिया अपने हाथ हुकम । दिल मोमिन के आए के, अर्स कर बैठे खसम ॥१॥
हक अर्स दिल मोमिन, और अर्स हक खिलवत । वाहेदत बीच अर्स के, है अर्स में अपार न्यामत ॥२॥
ए साहेदी जाहेर सुनो, जो लिखी मांहें फुरमान । अर्स कह्या दिल मोमिन, अर्स में सब पेहेचान ॥३॥
हक हादी रूहें अर्स में, इस्क इलम बेसक । जोस हुकम मेहरबानगी, हकीकत मारफत मुतलक ॥४॥
दिल मोमिन अर्स कह्या, सब अर्स में न्यामत । सो क्यों न करे दिल बरनन, जाकी हक सों निसबत ॥५॥
सब बातें हैं अर्स में, और अर्स में वाहेदत । हौज जोए बाग अर्स में, अर्स में हक खिलवत ॥६॥
सो अर्स कह्या दिल मोमिन, सो काहे न करे बरनन । जिन दिल में ए न्यामत, सो मुतलक अर्स रोसन ॥७॥
हम सिर हुकम आइया, अर्स हुआ दिल हम । एही काम हक इलम का, तो सुख काहे न लेवें खसम ॥८॥
कह्या अर्स हमारे दिल को, हैं हमहीं हक हुकम । क्यों न आवे इस्क हक का, यों बेसक हैयाती इलम ॥९॥
चरन बासा हमारे दिल में, रहे रूह के नैनों मांहें । क्यों न्यारे हम से रहें, हम बसें हक हैं जांहें ॥१०॥
मेरे सब अंगों हक हुकम, बिना हुकम जरा नाहें । सोई हुकम हक में, हक बसें अर्स में तांहें ॥११॥
हम अरस-परस हैं हक के, ए देखो मोमिनों हिसाब । हम हकमें हक हममें, और हक बिना सब ख्वाब ॥१२॥
हक हुकमें सब मिलाइया, अर्स मसाला पूरन । हादी रूहों जगावने, करावने हक बरनन ॥१३॥
आखिर मोमिन आकिल, कह्या जिनका दिल अर्स । तो हक दिल का जो इस्क, सो मोमिन पीवें रस ॥१४॥
विचार करें दिल मोमिन, जो अर्स मता दिल हम । तो हक दिल होसी कौन न्यामत, जो हक वाहेदत खसम ॥१५॥
देखो मोमिनों के दिल में, कही केती अर्स बरकत । विचार देखो हक दिल में, क्या होसी हक न्यामत ॥१६॥
हक हादी अर्स मोमिन, सो तो पेहेले हक दिल मांहें । जो चीज प्यारी रूह को, तो हक पल छोड़ें नाहें ॥१७॥
जो मता कह्या दिल मोमिन, सो मोमिन दिल समेत । सो बसत हक के दिल में, सो हक दिल मता रूह लेत ॥१८॥
जो रूह पैठे हक दिल में, सो मगन मांहें न्यामत । जो तित पड़ी कदी खोज में, तो छूटे ना लग कयामत ॥१९॥
जो सुराही हक की पीवना, सो इस्क हक दिल मिने । सो मोमिन पीवे कोई पैठके, और पिया न जाए किने ॥२०॥
कुलफ था एते दिन, द्वार इस्क न खोल्या किन । सो खोल दिया हकें मेहेर कर, अपने हाथ मोमिन ॥२१॥
गंज खोलसी इस्क का, मोहोर हुती जिन पर । लेसी अछूत प्याले मोमिन, हकें खोली मोहोर फजर ॥२२॥
ए पिएँ प्याले मोमिन, हक सुराही सराब । लाड़ लज्जत लें अर्स की, ए मस्ती मांहें आब ॥२३॥
हक सुराही ले हाथ में, दें मोमिनों भर भर । सुख मस्ती देवें अपनी, और बात न इन बिगर ॥२४॥
अमल ऐसा इन मद का, अर्स रूहें रही छकाए । छाके ऐसे नींद सुपन में, जानों अर्स में दिए जगाए ॥२५॥
पेहेले एक ए हक के दिल में, रूहों लाड़ कराऊं निस दिन । बेसुमार बातें हक दिल में, सब इस्क वास्ते मोमिन ॥२६॥
ए खेल किया वास्ते इस्क, वास्ते इस्क पेहेचान । जुदे किए इस्क वास्ते, देने इस्क सुख रेहेमान ॥२७॥
मोमिन उतरे इस्क वास्ते, वास्ते इस्क ल्याए ईमान । ईमान न ल्याए सो भी इस्कें, इस्कें न हुई पेहेचान ॥२८॥
कम ज्यादा सब इस्कें, इस्कें दोऊ दरम्यान । इस्कें बंदगी या कुफर, सब वास्ते इस्क सुभान ॥२९॥
छोटी बड़ी या जो कछू, ए जो चौदे तबक की जहान । ए भी हक इस्क तो पाइए, जो होए बेसक पेहेचान ॥३०॥
जो न्यामत हक के दिल में, तिन का क्योंए ना निकसे सुमार । सो सब इस्क हक का, रूहों वास्ते इस्क अपार ॥३१॥
ए इलम आया जब रूह को, तब पेहेचान आई मुतलक । जो हरफ निकसे दुनी का, सो सब देखे इस्क हक ॥३२॥
जब ए इलम रूहों पाइया, इस्क हो गया चौदे तबक । और देखे न कछुए नजरों, सब देखे इस्क हक ॥३३॥
रूह देखे अपने इस्क सों, होसी कैसा हक इस्क । कैसा इलम तो को भेजिया, जामें सक नहीं रंचक ॥३४॥
त्रिलोकी त्रैगुन में, कहूं नाहीं बेसक इलम । सो हकें भेज्या तुम ऊपर, ए देखो इस्क खसम ॥३५॥
किए चौदे तबक तुम वास्ते, इनमें मता है जे । ए भी हक इस्क तो पाइए, जो देखो हक इलम ले ॥३६॥
फुरमान भेज्या हकें इस्कें, इस्कें लिखी इसारत । तुमें कुन्जी दई हकें इस्कें, खोलनें हक मारफत ॥३७॥
फुरमान कोई न खोल सके, सो भी इस्क कारन । खिताब दिया सिर एक के, सो भी वास्ते इस्क मोमन ॥३८॥
सब दुनियां हक इस्क हुआ, तो देखो अर्स में होसी कहा । ए आया इलम रूहन पर, हकें भेज्या ए तोफा ॥३९॥
विचार किए इत पाइए, हुआ एही अर्स सहूर । वाको लिख्या कुरान में, ए जो कह्या नूर का नूर ॥४०॥
ए जाहेर कही हक वाहेदत, हक हादी उमत बातन । सो करूं जाहेर बरकत हादियों, पर अव्वल नफा लेसी मोमिन ॥४१॥
चरन ग्रहों नूर जमाल के, जिनने अर्स किया मेरा दिल । सो बयान करत है हुकम, हक सुख लेसी मोमिन मिल ॥४२॥
अर्स हमेसा कायम, जो हक का हुआ तखत । सो कायम दिल मोमिन का, जित है हक खिलवत ॥४३॥
कदमों लाग करूं सिजदा, पकड़ के दोऊ पाए । हुकम करत हैं मासूक, बीच आसिक के दिल आए ॥४४॥
मासूक तुमारी अंगना, तुम अंगना के मासूक । ए हुकमें इलम दृढ़ किया, अजूं रूह क्यों न होत टूक टूक ॥४५॥
इतहीं सिजदा बंदगी, इतहीं जारत जगात । इतहीं जिकर हक दोस्ती, इतहीं रोजा खोलात ॥४६॥
दिल को तुम अर्स किया, तुम आए बैठे दिल मांहें । हम अर्स समेत तुम दिल में, अजूं क्यों जोस आवत नाहें ॥४७॥
दिल अर्स हुआ हुकमें, तुम आए अपने हुकम । इस्क इलम सब हुकमें, कहू जरा न बिना खसम ॥४८॥
बुध जाग्रत इलम हक का, और हकै का हुकम । जोस अर्स का दिल में, ए सब मिल दिल में हम ॥४९॥
अब दिल में ऐसा आवत, ए सब करत चतुराए । फेर देखूं इन चतुराई को, तो हक बिन हरफ न काढ़यो जाए ॥५०॥
हक चतुराई ना चौदे तबकों, हक बका कही न किन तरफ । ला मकान सुन्य छोड़ के, किन सीधा कह्या न एक हरफ ॥५१॥
हक चतुराई हक इलम, और हकै का हुकम । ए तीनों मिल केहेत हैं, है बात बड़ी खसम ॥५२॥
ला मकान सुन्य के परे, हुआ नूर अछर । कोट ब्रह्मांड उपजे खपे, एक पाउ पल की नजर ॥५३॥
अछरातीत नूरजमाल, ए तरफ जानें अछर नूर । एक या बिना त्रैलोक को, इन तरफ की न काहू सहूर ॥५४॥
तो कह्या आगूं हक बुध के, चौदे तबकों सुध नाहें । सो बुध जाग्रत महंमद रूहअल्ला, दई मेरे हिरदे मांहें ॥५५॥
पातसाही एक खावंद की, बीच साहेबियां दोए । ए वाहेदत की हकीकत, बिना मारफत न जाने कोए ॥५६॥
सो बुध दोऊ अर्सों की, दोऊ सरूप थें जो गुझ । ए सुख कायम अर्स रूहन के, सो कायम कुंजी दई मुझ ॥५७॥
और सुख बारीक ए सुनो, कहे नूर नूरतजल्ला दोए । नूरतजल्ला के अंदर की, सुध नहीं नूर को सोए ॥५८॥
जित चल न सके जबराईल, कहे आगूं जलत मेरे पर । जलावत नूर तजल्ली, मैं चल सकों क्यों कर ॥५९॥
सो सुध बातून नूरजमाल की, अर्स अजीम के अन्दर । दोऊ हादियों मेहेर कर, पट खोल दिए अंतर ॥६०॥
जो सुध नहीं नूर जाग्रत, नूरजमाल का बातन । सो बेसक सुध हके मोहे दई, सो मैं पाई वजूद सुपन ॥६१॥
रूहें अंदर अर्स अजीम के, जो अरवा बारे हजार । हक ऊपर बैठ देखावत, ए जो खेल कुफार ॥६२॥
सो भिस्त दई हम सबन को, कर जाहेर बका अर्स इत । करें त्रैलोकी त्रिगुन कायम, ब्रह्मसृष्ट की बरकत ॥६३॥
ए बात बारीक अति बुजरक, दोऊ सरूपों सुख बातन । करी परीछा इस्क साहेबी, सुख होसी नूर रूहन ॥६४॥
करसी कायम खाकीबुत को, करके नूर सनमुख । इन से अछर और मोमिन, लेसी कायम अर्स के सुख ॥६५॥
ए सुख जानें नूरजमाल, या जानें नूर अछर । या हम रूहें जानहीं, कहे महामत हुकमें यों कर ॥६६॥
॥ प्रकरण ॥२॥ चौपाई ॥१३१॥
