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सिनगार - प्रकरण २० | Singaar prakaran 20

हक मासूक का मुख सागर

॥ मंगला चरण ॥

हक इलम के जो आरिफ, मुख नूरजमाल खूबी चाहें । चाहें चाहें फेर फेर चाहें, देख देख उड़ावें अरवाहें ॥१॥

एही काम आसिकन का, हक इलम एही काम । नूरजमाल का जमाल, छोड़ें न आठों जाम ॥२॥

खाते पीते उठते बैठते, सोवत सुपन जाग्रत । दम न छोड़ें मासूक को, जा को होए हक निसबत ॥३॥

हक बरनन फेर फेर करें, फेर फेर एही बात । एही अर्स रूहों खाना पीवना, एही वतन बिसात ॥४॥

जेती रूहें आसिक, रेहेत हक खूबी के मांहें । रूह को छोड़ के वजूद, कोई जाए न सके क्यांहे ॥५॥

एही हक इलम को लछन, आसिकों एही लछन । एही इलम इस्क के आरिफ, सोई अर्स रूह मोमिन ॥६॥

॥ मंगला चरण सम्पूर्ण ॥

बरनन करो रे रूहजी, मासूक मुख सुन्दर । कोमल सोभा अलेखे, खोल रूह के नैन अंदर ॥७॥

ललित लाल मुख सागर, कहूं अचरज के अदभूत । क्यों कर आवे बानीय में, ए बका सूरत लाहूत ॥८॥

मुख गौर झरे कसूंबा, सोभा क्यों कहूं बड़ो विस्तार । रंग कहूं के सलूकी, ए न आवे मांहें सुमार ॥९॥

कहूं सागर मुख जोत का, के कहूं मेहेर सागर । के कहूं सागर कलाओं का, जुबां केहे न सके क्योंए कर ॥१०॥

मुख चौक कहूं के चकलाई, के सीतल सागर सुख । के कहूं सागर रस का, जो नूरजमाल का मुख ॥११॥

के कहूं सागर तेज का, के कहूं सागर सरम । के नूर सागर कहूं बिलंद, के चंचल गुन नरम ॥१२॥

कहूं सज्जनता के सनकूली, दोस्ती कहूं के प्यार । जो जो देखूं नजर भर, सों सब सागर अपार ॥१३॥

सागर कहूं पाक साफ का, के कहूं आबदार । हक मुख सागर क्यों कहूं, सब विध पूरन अपार ॥१४॥

मोमिन दिल कोमल कह्या, तो अर्स पाया खिताब । तो दिल मोमिन रूह का, तिन कैसा होसी मुख आब ॥१५॥

तिन रूह के नैन को, किन विध कहूं नूर तेज । जो हक नैनों हिल मिल रहे, जाके अंग इस्क रेजा रेज ॥१६॥

और हक कदम अति कोमल, पांउं तली जोत अतंत । सो रहें रूह नैनों बीच में, सो क्या करे जुबां सिफत ॥१७॥

केहेवत हुकम इन जुबां, पर ए खूबी कही न जाए । ए कहे बिना भी ना बने, बिन कहें रूह बिलखाए ॥१८॥

इन नैनों सुख बका न देख्या, सुन्या हादियों के मुख । सुनी बानी जुबां केहे ना सके, जुबां कहे देख्या सुख ॥१९॥

कहूं नूर तेज रोसनी, याकी जोत गई अंबर लों चल । मांहें गुन गरभित कई सागर, क्यों कहे बिना अंतर बल ॥२०॥

किन विध कहूं मुख मांडनी, कहूं सनकूली के सुख पुंज । के कहूं आनंद सागर पूरन, गरूआ गंभीर नूर गंज ॥२१॥

ए सागर सरूपी मुख मासूक, कई खूबी खुसाली अनेक । कई रंग तरंग किरने उठें, ए वेही जानें गिनती विवेक ॥२२॥

इन मुख सागर में कई सागर, सुख आनंद अपार । कई सागर सुख सलूकियां, मांहें कई गंज अपार अंबार ॥२३॥

कोई मोमिन केहेसी ए क्यों कह्या, हक मुख सोभा सागर । सुच्छम सरूप अति कोमल, ललित किसोर सुन्दर ॥२४॥

जो अरवा होए अर्स की, सो लीजो दिल धर । सुच्छम सूरत सोभा बड़ी, सो सुनियो पड़उत्तर ॥२५॥

कह्या निमूना एक भांत का, अंग खूबी इस्क सागर । खुसबोए नरम चकलाइयां, सब सागर कहे यों कर ॥२६॥

जो रंग कहूं गौर का, तो सागर मेर तरंग । जो कहूं लाल मुख अधुर, हुए सागर लाल सुरंग ॥२७॥

हक के मुख का नूर जो, सो नूरै सागर जान । तेज जोत या सलूकियां, सोभा सागर भरया आसमान ॥२८॥

सोभा हक सूरत की, सागर भी कहे न जांए । ए सोभा अति बड़ी है, पर सो आवे नहीं जुबांएँ ॥२९॥

सागर कहे यों जान के, कहे दुनियां में बड़े ए । पड़या सागर से ना निकसे, कही अंग सोभा इन वास्ते ॥३०॥

यों लग्या आसिक एक अंग को, सो तहां ही हुआ गलतान । इनसें कबूं ना निकसे, तो कहे सागर अंग सुभान ॥३१॥

ए रस रंग उपले केते कहूं, कई विध जिनस जुगत । फेर फेर देख देख देखहीं, रूह क्योंए न होए तृपित ॥३२॥

सेहेज अन्दर के पाइए, मुख देखे हक सूरत । रस बस एक हो रहीं, जो रूहें मांहें खिलवत ॥३३॥

जो गुन हक के दिल में, सो मुख में देखाई देत । सो देखें अरवाहें अर्स की, जो इत हुई होए सावचेत ॥३४॥

मुख बोले पीछे पाइए, जो दिल अन्दर के गुन । पर मुख देखे पाया चाहे, जो अन्दर गुझ रोसन ॥३५॥

जो गुन हिरदे अन्दर, सो मुख देखे जाने जांए । ऊपर सागरता पूरन, ताथें दिल की सब देखाए ॥३६॥

मुख मीठा सागर पूरन, मुख मीठा सागर बोल । मेहेर सागर दृष्ट पूरन, लई इस्क सागर मांहें खोल ॥३७॥

यों गुन सागर केते कहूं, जो देखत सुख के रंग । कई सुख नेहेरें किरना चलें, कई सागर सुख तरंग ॥३८॥

कई रस रंग एक गौर में, एक रंग मांहें कई रस । क्यों बरनों आगे मोमिनों, ए मुख मासूक अजीम अर्स ॥३९॥

एक सलूकी में कई चकलाइयां, एक चकलाइएँ कई सलूक । ए सरूप केहेते आगे मोमिन, दिल होत नहीं टूक टूक ॥४०॥

दोऊ तरफ सोभा कान भूखन, बीच नासिका सोभे दोऊ नैन । तिलक निलाट अति उज्जल, दोऊ अधुर मधुर मुख बैन ॥४१॥

सिर मुकट एक भांत का, क्यों कहूं जुबां रंग नंग । ना देख सकों नूर नजरों, कई किरने उठें तरंग ॥४२॥

केहे केहे जुबां एता कहे, जो जोत भरया अवकास । आसमान जिमी भर पूरन, अब किन विध कहूं प्रकास ॥४३॥

इन विध सोभा मुकट की, ए जुबां क्यों करे बरनन । सिर सोभे नूरजमाल के, नीके देखें रूह मोमिन ॥४४॥

ए नंग जवेर केहेत हों, सो सब्द सुपन जिमी ले । ए अर्स जवेर भी क्यों कहिए, जो सिनगार हक बका के ॥४५॥

होत जवेर पैदा जिमी से, नंग अर्स में इन विध नाहें । जोत पूरन अंग ले खड़ी, रूह जैसी चाहे दिल मांहें ॥४६॥

असल तन जिनों अर्स में, सो कर लीजो दिल विचार । हक के सिर का मुकट, सो सोभा क्यों आवे मांहें सुमार ॥४७॥

यों ही है बीच अर्स के, जिनों जो सोभा प्यारी लगत । हर रूह अर्स अजीम की, दिल माफक देखत ॥४८॥

तुम इत भी माफक इस्क के, देखियो कर सहूर । हिसाब न सोभा मुकट की, ए जुबां क्या करे मजकूर ॥४९॥

हक सूरत सलूकी क्यों कहूं, महंमदें कही अमरद । किसोर कही मसीय ने, सोभा कही न जाए मांहें हद ॥५०॥

अति सुन्दर सूरत अर्स की, ताके क्यों कहूं वस्तर भूखन । जामा पटुका इजार, मांहें सिफत न आवे सुकन ॥५१॥

केहे केहे मुख एता कहे, नूरै के वस्तर । मैं केहेती हों बुध माफक, ज्यादा जुबां चले क्यों कर ॥५२॥

सोभा सलूकी मुख की, और सलूकी भूखन । और सलूकी वस्तर की, ए जानें अरवा अर्स के तन ॥५३॥

रंग वस्तरों तो कहूं, जो दस बीस रंग होए । इन सुपन जिमी जो वस्तर, तामें कई रंग देखत सोए ॥५४॥

तो अर्स वस्तर क्यों रंग गिनों, और करके दिल अटकल । बेसुमार ल्याऊं सुमार में, यों मने करत अकल ॥५५॥

है बड़ी लड़ाई इन बात में, जब सहूर करत अर्स दिल । रूह तो मेरी इत है नहीं, हुकम केहेवत ऊपर मजल ॥५६॥

जामा अंग को लग रह्या, हार दुगदुगी हैड़े पर । ऊपर अति झीनी झलकत, जुड़ बैठी चादर ॥५७॥

जामें ऊपर जो भूखन, जो कण्ठ पेहेरे हैं हार । सो कई नंग जंग करत हैं, अवकास न माए झलकार ॥५८॥

याही जिनस बाजू बंध, और फुंदन लटकत । ए सबे हैं एक रस, पर रंग कई विध जंग करत ॥५९॥

हस्त कमल काड़ों कड़े, मांहें कई रंग कई बल । सो रूह लेवे विचार के, आगूं चले न जुबां अकल ॥६०॥

याही विध हैं पोहोंचियां, तिनमें कई रंग नंग कंचन । रंग गिनती केहेते सकुचों, जानों क्यों कहूं सुमार सुकन ॥६१॥

किन विध कहूं हथेलियां, अति उज्जल रंग लाल । केहेते लीकां दिल लरजत, ए अंग नूरजमाल ॥६२॥

अंगुरियां हस्त कमल की, याको दिया न निमूना जाए । वचन कहूं विचार के, तो भी रूह पीछे जाए पछताए ॥६३॥

हर एक अंगुरी मुंदरी, हर मुंदरिएँ कई रंग । सो जोत भरत आकास को, कहूं किन विध कई तरंग ॥६४॥

जो जोत नख अंगुरी, जुबां आगे चल न सकत । फेर फेर वचन एही कहूं, अंबर जोत भरत ॥६५॥

याही विध नख चरनों के, नख जोत एही सब्द । एही खूबी फेर फेर कहूं, क्या करों छूटे न जुबां हद ॥६६॥

कोमलता चरन अंगुरी, और चरन तली कोमल । ए दिल रोसन देख के, हाए हाए खाक न होत जल बल ॥६७॥

चारों भूखन चरन के, मांहें रंग जोत अपार । दिल न लगे बिना गिनती, जानों क्यों ल्याऊं मांहें सुमार ॥६८॥

सुमार कहे भी ना बने, दिल में न आवे बिना सुमार । ताथें मुस्किल दोऊ पड़ी, पड़या दिल मांहें विचार ॥६९॥

चरन हक सूरत के, तिन अंगों के भूखन । रूह लेसी सोभा विचार के, जाके होसी अर्स में तन ॥७०॥

याही वास्‍ते कहे सागर, सोभा न आवे मांहें सुमार । सागर सोभा भी ना लगे, सब्द में न आवे सोभा अपार ॥७१॥

जो सोभा कही हक की, ऐसी हादी की जान । हकें मासूक कह्या अपना, सो जाहेर लिख्या मांहें फुरमान ॥७२॥

और सोभा जुगल किसोर की, रूह अल्ला ने कही इत । उसी इलम से मैं केहेत हों, जो कहावत हुकम सिफत ॥७३॥

गौर गाल सुन्दर हरवटी, फेर फेर देखों मुख लाल । अर्स कर दिल मोमिन, मांहें बैठे नूरजमाल ॥७४॥

क्यों कहूं सागर चातुरी, कई सुख अलेखे उतपन । कई पैदा होत एक सागरें, नए नए सुख नौतन ॥७५॥

हक मुख सब विध सागर, सुख अलेखे अपार । ए सुख जानें निसबती, जिन निस दिन एही विचार ॥७६॥

सब सागर सुख मई, सब सुख पूरन परमान । अति सोभित मुख सुन्दर, ए जो वाहेदत का सुभान ॥७७॥

अंग देखे जेते सूरत के, सो तो सारे इस्क सागर । गुन हक बाहेर देखावत, इन बातों मोमिन कादर ॥७८॥

इस्क देखावें चढ़ता, सब कलाओं सुखदाए । घट बढ़ अर्स में है नहीं, पर इस्कें देत देखाए ॥७९॥

केहेना सुनना देखना, अर्स चीज न इस्क बिन । जो कछू सुख अखंड, सो सब इस्क पूरन ॥८०॥

जो कोई अर्स जिमीय में, पसु या जानवर । सो सरूप सारे इस्क के, एक जरा ना इस्क बिगर ॥८१॥

दुनी पंखी बिछोहा न सहे, वह आगे ही उड़े अरवा । गिरत है आकास से, होत है पुरजा पुरजा ॥८२॥

ए पंखी प्रीत दुनीय की, होसी अर्स के कैसे जानवर । ए निमूना इत ना बने, और बताइए क्यों कर ॥८३॥

पूर असल जिमी बराबर, और उज्जल जोत प्रकास । कहूं कम ज्यादा न देखिए, और जोत भरयो अवकास ॥८४॥

पसु पंखी सब में पूरन, दिल चाह्या पूरन बन । इन जिमी पसु पंखियों, जिकर करे रोसन ॥८५॥

और आसिक वाहेदत के, इनहूं बड़ी पेहेचान । एही खूब खेलौनें हक के, मुख मीठी सुनावें बान ॥८६॥

खूबी खुसाली पूरन, सुन्दर सोभा चित्रामन । नैन श्रवन या चोंच मुख, गान करें निस दिन ॥८७॥

इस्क इनों के क्यों कहूं, जो हक के पिलायल । कोई केहे न सके इनों बड़ाई, ए अर्स जिमी असल ॥८८॥

सब गुन इनों में पूरन, नरम खूबी खुसबोए । मुख बानी जोत चित्रामन, ए हकें रिझावें सोए ॥८९॥

हाल चाल सब इस्क की, खान पान सब साज । सोभा सिनगार सब इस्क के, अर्स इस्क को राज ॥९०॥

सोभा क्यों कहूं हक सूरत की, जा को नामै नूरजमाल । ए दिल आए इस्क आवत, याको सहूरैं बदलें हाल ॥९१॥

हक सूरत अति सोहनी, अति सुन्दर सोभा कमाल । बैठे हक इस्क छाया मिने, दूजे इस्क लगे दिल झाल ॥९२॥

और कछुए दिल है नहीं, बिना हक वाहेदत । और जरा कित कहूं नहीं, वाहेदत इस्क निसबत ॥९३॥

जित रहे आग इस्क की, तित देह सुपन रहे क्यों कर । बिना मोमिन दुनी न छूटहीं, दुनी ज्यों बिन जलचर ॥९४॥

ब्रह्मसृष्ट घर इस्क में, और दुनियां घर कुफर । मोमिन जलें न आग इस्कें, दुनी जाए जल बर ॥९५॥

आग इस्कें जलें ना मोमिन, आसिकों इस्क घर । इनों लगे जुदागी आग ज्यों, रूहें भागें देख कुफर ॥९६॥

रूहें आइयां अर्स अजीम से, दई नुकते इलमें जगाए । और उमेदां सब छोड़ाए के, हकें आपमें लैयां लगाए ॥९७॥

वस्तर भूखन सब इस्क के, इस्क सेज्या सिनगार । इस्क हक खिलवत, रूहें हादी हक भरतार ॥९८॥

जुगल सरूप जब बैठत, इस्क जानें दिल की सब । इस्क बोल काढ़ें जिन हेत को, उत्तर पावे दूजा दिल तब ॥९९॥

जुगल सरूप इत बैठत, दोऊ दिल की पावें मोमिन । एक वचन मुख बोलते, पावें पड़उत्तर आधे सुकन ॥१००॥

इस्क बोले सुनें इस्क, सब इस्कै की बिसात । जो गुझ दिल मासूक की, सो आसिक से जानी जात ॥१०१॥

मोमिन आसिक हक के, सो हक की जानें दें खबर । हकें तो किया अर्स अपना, जो थे मोमिन दिल इन पर ॥१०२॥

आसिक मासूक दो अंग, दोऊ इस्कें होत एक । तो आसिक मासूक के दिल को, क्यों ना कहे गुझ विवेक ॥१०३॥

तो मोमिनों दिल अपना, जीवते अर्स केहेलाया । जो इस्क मासूक के दिल का, ऊपर सरूपै देखें पाया ॥१०४॥

जो कछुए चीज अर्स में, सो सूरत सब इस्क । सो लाड़ लज्जत सुख लेत हैं, सब रूहें हादी हक ॥१०५॥

इस्क सुख अर्स बिना, कहूं पैदा दुनी में नाहें । तो हकें नाम धराया आसिक, जो इस्क आप के मांहें ॥१०६॥

या तो इस्क हादी मिने, जा को हकें कह्या मासूक । हक का सुकन सुन आसिक, हाए हाए होत नहीं टूक टूक ॥१०७॥

सुकजीएँ भी यों कह्या, प्रेम चौदे भवन में नाहें । ब्रह्मसृष्ट ब्रह्म निसबती, प्रेम जो है तिन मांहें ॥१०८॥

और इस्क माहें रूहन, हकें अर्स कह्यो जा को दिल । हकें दिल दे रूहों दिल लिया, यों एक हुए हिल मिल ॥१०९॥

ना तो हक आदमी के दिल को, अर्स कहें क्यों कर । पर ए आसिक मासूक की वाहेदत, बिना आसिक न कोई कादर ॥११०॥

ए जाहेर लिख्या फुरमान में, रूहें उतरी लाहूत से । अहेल अल्ला तो कहे, जो इस्क है इनों में ॥१११॥

इस्क है वाहेदत में, कहूं पाइए न दूजे ठौर । दूजे ठौर तो पाइए, जो होवे कोई और ॥११२॥

इस्क निसानी हक की, सो पाइए सांच के मांहें । सांच अर्स आगूं वाहेदत के, ए झूठ जरा भी नाहें ॥११३॥

ए झूठा फरेब कछुए नहीं, जामें आए अहमद मोमिन । एह निसानी इस्क की, जाके असल अर्स में तन ॥११४॥

इस्क नाम अर्स से, खेल में ल्याए महंमद । ए क्या जानें नसल आदम, जो खाकीबुत सब रद ॥११५॥

ए जाने अरवाहें अर्स की, जिनकी इस्क बिलात । ए क्या जाने पैदा कुंन की, हक आसिक मासूक की बात ॥११६॥

अर्स इस्क हक हादी रूहें, याकी दुनी न जाने कोए । इस्क अर्स सो जानहीं, जो कायम वतनी होए ॥११७॥

दुनियां चौदे तबकों, किन निरने करी न सूरत हक । तिन हक के दिल में पैठ के, करूं जाहेर हक इस्क ॥११८॥

तो अर्स हुआ दिल मोमिन, जो जाहेर किया गुझ ए । हक हादी गुझ मोमिन, कोई और न कादर इनके ॥११९॥

तो पाया खिताब अर्स का, ना तो दिल आदमी अर्स क्यों होए । ए हक हादी मोमिन बातून, और बूझे जो होवे कोए ॥१२०॥

मुखारबिंद मेहेबूब का, सुख देत हक सूरत । जुगल किसोर सोभा लिए, दोऊ बैठे एक तखत ॥१२१॥

दोऊ सरूप अति उज्जल, कई जोत खूबियों में खूब । इस्क कला सब पूरन, रस इस्क भरे मेहेबूब ॥१२२॥

नैन श्रवन मुख नासिका, चारों अंग गेहेरे गंभीर । अर्स आकास सिंध तेज का, ताए चारों नेहेरें चलियां चीर ॥१२३॥

एक मुख के सुख में कई सुख, और कई सुख मांहें नैन । सुख केते कहूं नैन अंग के, मुख गिनती न आवे बैन ॥१२४॥

श्रवन अन्दर सुख क्यों कहूं, जो सुख सागर आराम । क्यों निकसे रूह इन से, ए अंग सुख स्यामा स्याम ॥१२५॥

अंग रूह अर्स की नासिका, ए बल जानत रूह को कोए । चौदे तबक सुन्य फोड़ के, इत लेत अर्स खुसबोए ॥१२६॥

ऐसा बल रूह अर्स के, तो बल हक होसी किन विध । ए बेवरा जानें पाक मोमिन, जिन हक अर्स दिल सुध ॥१२७॥

सुख कहूं मीठी जुबान के, के सुख कहूं लाल अधुर । के सुख कहूं रस भरे वचन, जो बोलत मांहें मधुर ॥१२८॥

दोऊ माहों माहें जब बोलहीं, तब मीठे कैसे लगत । कोई रूह जानें अर्स की, जित हक हुकम जाग्रत ॥१२९॥

जानों के जोबन चढ़ता, ऐसे नित देखत नौतन । गुन पख अंग इंद्रियां, बढ़ता नूर रोसन ॥१३०॥

जानों के पल पल चढ़ता, तेज जोत रस रंग । पूरन सरूप एही देखहीं, इस्क सूरत के संग ॥१३१॥

बन्ध बन्ध सब इस्क के, और इस्कै अंगों अंग । गुन पख सब इस्क के, सोई इस्क बोलें रस रंग ॥१३२॥

सब इंद्रियां इस्क की, इस्क तत्व रस धात । पिंड प्रकृत सब इस्क के, इस्क भीगे अंग गात ॥१३३॥

बात विचार सब इस्क के, इस्कै गान इलम । अंग क्यों कहूं इन जिमिएं, एता भी केहेत हुकम ॥१३४॥

सब चीजें इत इस्क की, इस्कै अर्स बिसात । रूहें हादी अंग इस्क के, इस्क सूरत हक जात ॥१३५॥

सेहेज सुभाव सब इस्क के, इस्कै की वाहेदत । हक सरूप सब इस्क के, इस्कै की खिलवत ॥१३६॥

मोहोल मन्दिर सब इस्क के, ऊपर तले इस्क । दसों दिस सब इस्क, इस्क उठक या बैठक ॥१३७॥

यों अर्स सारा इस्क का, और इस्क रूहों निसबत । इस्क बिना जरा नहीं, सब हक इस्क न्यामत ॥१३८॥

नेक कही हक इस्क की, पर इस्क बड़ा विस्तार । इनको बरनन न होवहीं, न आवे मांहें सुमार ॥१३९॥

सुनो मोमिनों इस्क की, नेक और भी देऊं खबर । अर्स आसिक मासूक की, ज्यों औरों भी आवे नजर ॥१४०॥

रब्द हुआ इस्क का, हक हादी की खिलवत मांहें । इत कम ज्यादा है नहीं, अर्स इस्क बेवरा नाहें ॥१४१॥

ए बेवरा तित होवहीं, जित बिछोहा होए । सो तो वाहेदत में है नहीं, होए बिछोहा मांहें दोए ॥१४२॥

हकें चाह्या करों बेवरा, देखाऊं रूहों को । इस्क न पाइए बिना जुदागी, सो क्यों होवे वाहेदत मों ॥१४३॥

ताथें दई नेक फरामोसी, रूहों को मांहें अर्स । हाँसी करने इस्क की, देखें कौन कम कौन सरस ॥१४४॥

ए झूठा खेल देखाइया, ए जो चौदे तबक । हम जानें आए खेल बीच में, जित तरफ न पाइए हक ॥१४५॥

इत इस्क कहां पाइए, आग पानी पत्थर पूजत । ए खेल देख्या एक निमख का, जानों हो गई कई मुद्दत ॥१४६॥

झूठ हम देख्या नहीं, झूठ रहे न हमारी नजर । पट आड़े खेल देखाइया, सो देने इस्क खबर ॥१४७॥

ऐसा खेल देखाइया, जानें हम आए मांहें इन । इस्क हम में जरा नहीं, सुध हक न आप वतन ॥१४८॥

इन इस्कें हमारे ऐसा किया, ए जो झूठे चौदे तबक । तिन सबों कायम किए, ऐसे हमारे इस्क ॥१४९॥

जलाए दिए सब इस्कें, हो गई सब अगिन । एक जरा कोई न बच्या, बीच आसमान धरन ॥१५०॥

हम जानें इस्क ना हम पे, हम पर हँससी नूरजमाल । हमारे इस्कें ब्रह्मांड का, किया जो ऐसा हाल ॥१५१॥

इस वास्ते खेल देखाइया, वास्ते बेवरे इस्क के । कोई आया न गया हम में, बैठे अर्स में देखें ए ॥१५२॥

कहे महामत हुकमें देखाइया, ऐसी कर हिकमत । हम देख्या इस्क बेवरा, बैठे बीच खिलवत ॥१५३॥

॥ प्रकरण ॥२०॥ चौपाई ॥१२१७॥

इसी सन्दर्भ में देखें-