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सिनगार - प्रकरण २२ | Singaar prakaran 22

सिनगार कलस तिन सिनगार बरनन विरहा रस

क्यों बरनों हक सूरत, अब लों कही न किन । ए झूठी देह क्यों रहे, सुनते एह बरनन ॥१॥

बरनन आसिक कर ना सके, और कोई पोहोंचे न आसिक बिन । हक जाहेर क्यों होवहीं, देखतहीं उड़े तन ॥२॥

हक देखे वजूद ना रहे, ज्यों दारू आग से उड़त । यों वाहेदत देखें दूसरा, पाव पल अंग न टिकत ॥३॥

हक इस्क आग जोरावर, इनमें मोमिन बसत । आग असल जिनों वतनी, यामें आठों जाम अलमस्त ॥४॥

जो निस दिन रहे आग में, ताए आगै के सब तन । वाको जलाए कोई ना सके, उछरे आगै के वतन ॥५॥

आग जिमी पानी आग का, आग बीज आग अंकूर । फल फूल बिरिख आग का, आग मजकूर आग सहूर ॥६॥

बिरिख मोमिन आग इस्क, और आग इस्क अर्स । सब पीवें आग इस्क रस, दिल आगै अरस-परस ॥७॥

घर मोमिन आग इस्क में, हक अगनी के पालेल । सोई इस्क आग देखावने, ल्‍याए जो मांहें खेल ॥८॥

जो पैदा हुआ आग का, सो आग में जलत नाहें । वह वजूद आग इस्क के, रहें हमेसा आग मांहें ॥९॥

सोई बात करें हक अर्स की, सहूर या बेसहूर । हुए सब विध पूरन पकव, हक अर्स दिन जहूर ॥१०॥

जो हक देखे टिकया रहे, सोई अर्स के तन । सोई करें मूल मजकूर, सोई करे बरनन ॥११॥

पर ए देख्या अचरज, जो विरहा सब्द सुनत । क्यों तन रह्या जीव बिना, हाए हाए ए सुनत न अरवा उड़त ॥१२॥

आसिक अरवा कहावहीं, तिन मुख विरहा ना निकसत । जब दिल विरहा जानिया, तब आह अंग चीर चलत ॥१३॥

ए हाँसी कराई हुकमें, इस्क दिया उड़ाए । मुरदा ज्यों इस्क बिना, गावत विरहा लड़ाए ॥१४॥

कबूं अर्स रूहें ऐसी ना करें, जैसी हमसे हुई इन बेर । अर्स रूहों को विरहा रसें, हुए बेसक न लैयां घेर ॥१५॥

चरन तली की जो लींकें, सो एक लीक न होए बरनन । तो मुख से चरन क्यों बरनवूं, जो नूरजमाल का तन ॥१६॥

इन चरनों विध क्यों कहूं, नाजुक निपट नरम । ए बरनन करतें इन जुबां, हाए हाए उड़त न अंग बेसरम ॥१७॥

चरन केहेती हों मुखथें, जो निरखती थी निस दिन । सो समया याद न आवहीं, क्यों न लगे कलेजे अगिन ॥१८॥

चरन अंगूठे चित्त दे, नैनों नखन देखती जोत । नजरों निमख न छोड़ती, हाए हाए सो अब लोहू भी ना रोत ॥१९॥

नैनों अंगुरियां देखती, कोमलता हाथ लगाए । सो मेरे नैन नाम धराए के, हाए हाए जल बल क्यों न जाए ॥२०॥

चरन तली रेखा देखती, मेरी आंखों नीके कर । ए कटाव किनार पर कांगरी, हाए हाए नैना जले न नाम धर ॥२१॥

रंग लाल कहूं के उज्जल, के देख खूबियाँ होत खुसाल । सो देखन वाले नाम धराए के, हाए हाए ओ जले न मांहें क्यों झाल ॥२२॥

नाजुक सलूकी मीठी लगे, नैना देखत ना तृपिताए । हाए हाए ए अनुभव दिल क्यों भूलै, ए हुकमें भी क्यों पकराए ॥२३॥

नाम जो लेते विरह को, मेरी रसना गई ना टूट । सो विरहा नैनों देख के, हाए हाए गैयां न आंखां फूट ॥२४॥

हक बानी कानों सुनती, कानों सुन के करती मैं बात । सो अवसर हिरदे याद कर, हाए हाए नूर कानों का उड़ न जात ॥२५॥

क्यों कहूं चरन के भूखन, अर्स जड़ सबे चेतन । सोभा सुन्दर सब दिल चाही, बोल बोए नरम रोसन ॥२६॥

क्या वस्तर क्या भूखन, असल अंग के नूर । हाए हाए रूह मेरी क्यों रही, करते एह मजकूर ॥२७॥

रंग रेसम हेम जवेर, ना तेज जोत सब्द लगत । एही अचरज अरवाहें अर्स की, ए सुनते क्यों ना उड़त ॥२८॥

याही भांत इजार की, भांत भूखन की सब । रूप करें कई दिल चाहें, जैसा रूह चाहे जब ॥२९॥

इजार बंध याही रस का, भांत भांत झलकत । देख लटकते फुंदन, हाए हाए अरवा क्यों न कढ़त ॥३०॥

चरन से कमर लग, भूखन या वस्तर । हेम जवेर या रेसम, सब एकै रस बराबर ॥३१॥

दिल चाही नरम सोभित, दिल चाही जोत खुसबोए । जिन खिन जैसा दिल चाहे, सब विध दे सुख सोए ॥३२॥

कई रंग हैं इजार में, उठत जामें में झांईं । अरवा क्यों सखत हुई, दिल देख उड़त क्यों नाहीं ॥३३॥

आसमान जिमी के बीच में, भरी जोत उठें कई रंग । घट बढ़ काहूं है नहीं, करें दिल चाही कई जंग ॥३४॥

ए सब विध दिल देखत, करे जुबां अकल बरनन । तो भी अरवा ना उड़ी, कोई सखत अंतस्करन ॥३५॥

दिल सखत बिना इन सरूप की, इत लज्जत लई न जाए । ए हुकम करत सब हिकमतें, हक इत ए सुख दिया चाहें ॥३६॥

ए रूह के नैनों देखिए, नाजुक कमर निपट । अति देखी सुन्दर चढ़ती, कही जाए न सोभा कटि ॥३७॥

कटि कमर सलूकी देख के, नैना क्यों रहे अंग को लाग । ए बातें दिल से विचारते, हाए हाए लगी न दिल को आग ॥३८॥

ए गौर रंग लाल उज्जल, छाती कई विध देत तरंग । नाहीं निमूना जोत जवेर, जो दीजे अर्स के नंग ॥३९॥

हैड़ा हक का देख कर, मेरा जीव रह्या अंग मांहें । हाए हाए मुरदा दिल मेरा क्यों हुआ, ए देख चलया नाहें ॥४०॥

हक हैड़ा देख कर, मेरे हैड़े रेहेत क्यों दम । मांग्या सुख इत देवे को, सो राखत मासूक हुकम ॥४१॥

हाथ पांउं मेरे क्यों रहे, देख हक हाथ पांउं । हाए हाए ए जुलम क्यों सह्या, क्यों भूले अवसर दाउ ॥४२॥

चकलाई दोऊ खभन की, अंग उतरता सलूक । देख कमर कटि पतली, हाए हाए दिल होत ना टूक टूक ॥४३॥

मैं देख्या अंग जामें बिना, नाजुक जोत नरम । ए केहेनी में न आवही, ए अंग होए न मांस चरम ॥४४॥

जामे दावन बांहें चोली, सिंध सागर रल्या मानो खीर । जोत भरी जिमी आसमान, मानो चलसी ऊपर चीर ॥४५॥

चीन मोहोरी बगल या बीच, गिरवान कोतकी नकस । सब जामा जानों के भूखन, ठौर एक दूजे पे सरस ॥४६॥

जब जैसा दिल चाहत, तिन खिन तैसा देखत । वस्तर भूखन हक अंग के, केहेनी में न आवत ॥४७॥

ए वस्तर भूखन भांत और हैं, अर्स अंग का नूर । जो सोभा देत इन अंग को, सो क्यों आवे मांहें सहूर ॥४८॥

और क्या चीज ऐसी अर्स में, जो सोभा देवे सरूप को । हक सरभर कछू न आवहीं, रूह देखे विचार दिल मों ॥४९॥

ए निपट बात बारीक है, अर्स रूहें करना विचार । और कोई होवे तो करे, बात अलेखे अपार ॥५०॥

सोभा हक के अंग की, सो अंग ही की सोभा अंग । ऐसी चीज कोई है नहीं, जो सोभे इन अंग संग ॥५१॥

कहूं पटुके की सलूकी, के ए भूखन कहूं कमर । ए छब फब दिल देख के, न जानों रूह रेहेत क्यों कर ॥५२॥

ए कहे जांए न वस्तर भूखन, ए चीज दुनियां के । जो सोभा देत हक अंग को, ताए क्यों नाम धरिए ए ॥५३॥

हक के अंग का नूर जो, ए रूहों अर्स में सुध होत । इत सब्द न कोई पोहोंचहीं, जो कोट रोसन कहूं जोत ॥५४॥

नख अंगुरियां अंगूठे, कोई दिया न निमूना जाए । जोत क्यों कहूं इन मुख, रहे अंबर जिमी भराए ॥५५॥

पतली अंगुरियां उज्जल, सोभा क्यों कहूं मुंदरियों मुख । ए देखे रूह मोमिन, सोई जानें ए सुख ॥५६॥

लीकें हथेली उज्जल, सलूकी पोहोंचों ऊपर । ए बेवरा केहेते अकल, हाए हाए अरवा रेहेत क्यों कर ॥५७॥

पोहोंची काड़ों कड़े झलकत, हेम जवेर कई रंग रस । दिल चाह्या रूप रंग ल्यावहीं, जो देखिए सोई सरस ॥५८॥

मोहोरी चूड़ी बांहें बाजू बंध, सोभा बारीक कई बरनन । नाम लेत इन चीज का, हाए हाए अरवा उड़त ना मोमिन ॥५९॥

हक हुकम राखत जोरावरी, बात आई ऊपर हुकम । ना तो रहे ना सुन वचन, पर ज्यों जानें त्यों करें खसम ॥६०॥

सोभा लेत हैड़े खभे, कर हेत सुनत श्रवन । विचार किए जीवरा उड़े, या उड़े देख भूखन ॥६१॥

गौर हरवटी अति सुन्दर, या देख के लांक सलूक । लाल अधुर देख ना गया, लोहू मेरे अंग का सूक ॥६२॥

मुख चौक छबि सलूकियां, सुन्दर अति सरूप । गाल लाल अति उज्जल, सुखदायक सोभा अनूप ॥६३॥

निलवट तिलक नासिका, रंग पल में अनेक देखाए । दंत बीड़ी मुख मोरत, हाए हाए जीवरा उड़ न जाए ॥६४॥

रंग नासिका की मैं क्यों कहूं, गुन सलूक अदभूत । सुन्य ब्रह्मांड को फोड़ के, अर्स बास लेत बीच नासूत ॥६५॥

नैन सैन जो करत हैं, सामी रूह मोमिन । ए सैन दिल लेय के, हाए हाए चिराए न गया ए तन ॥६६॥

ए नैना नूरजमाल के, देख सलोंने सलूक । ए सुन नैन बिछोड़ा मोमिन, हाए हाए हो न गए भूक भूक ॥६७॥

अंबर धरा के बीच में, केस लवने नूर झलकत । ए सोभा मुख क्यों कहूं, कानों मोती लाल लटकत ॥६८॥

कानन मोती केहेत हों, पल में बदलत भूखन । आसिक देखे कई भांतों, सुख देवें दिल रोसन ॥६९॥

कानों कड़ी गठौरी-मुरकी, जुगत जिनस नहीं पार । नाम नंग रंग रसायन क्यों कहूं, रूप खिन में बदलें बेसुमार ॥७०॥

उज्जल निलाट लाल तिलक, क्यों कहूं सोभा असल । सुन्दर सलूकी सरूप की, मांहें आवत ना अकल ॥७१॥

पाग कही सिर हक के, और कह्या सिर मुकट । हाए हाए जीवरा क्यों रह्या, खुलते हिरदे ए पट ॥७२॥

कलंगी दुगदुगी तो कहूं, जो पगरी होए और रस । वस्तर भूखन या अंग तीनों, हर एक पे एक सरस ॥७३॥

ताथें रस तो सब एक है, तामें अनेक रंग । कलंगी दुगदुगी ठौर अपने, करत माहों मांहें जंग ॥७४॥

मोमिन असल सूरत अर्स में, अबलों न जाहेर कित । खोज खोज कई बुजरक गए, सो अर्स रूहें ल्याई हकीकत ॥७५॥

नूर खूबी कही केसन की, हक सरूप की इत । हाए हाए मेरा अंग मुरदा ना हुआ, केहेते बका निसबत ॥७६॥

नख सिख लों बरनन किया, और गाया लड़ाए लड़ाए । मोमिन चाहिए विरहा सुनते, तबहीं अरवा उड़ जाए ॥७७॥

जो परआतम पोहोंचे नहीं, सो क्यों पोहोंचे हक अंग को । आसिक और मासूक, कैसी तफावत इनमों ॥७८॥

नाजुक सोभा हक की, जो रूह के आवे नजर । तो अबहीं तो को अर्स की, होए जाए फजर ॥७९॥

ज्यों सूरत दिल देखत, त्यों रूह जो देखे सूरत । बेर नहीं रूह लज्जत, तेरे अंग जात निसबत ॥८०॥

फरक नहीं दिल रूह के, ए तो दोऊ रहे हिल मिल । अर्स में जो रूह है, तो हकें कह्या अर्स दिल ॥८१॥

तेरा दिल लग्या ज्यों सूरत को, त्यों जो सूरतें रूह लगे । तो अबहीं ले रूह लज्जत, एक पलक में जगे ॥८२॥

रूह तो तेरी दिल बीच में, तो कह्या दिल अर्स । सेहेरग से नजीक तो कह्या, जो रूह दिल अरस-परस ॥८३॥

सूरत केहेते हक की, आगूं रूह मोमिन । हाए हाए रूह मुरग ना उड़या, बरनन करते अर्स तन ॥८४॥

आगूं अरवाहें अर्स की, करी बातें हक जुबान । हाए हाए तन मेरा क्यों रह्या, करते खिलवत बयान ॥८५॥

रूहें रहें अर्स दरगाह में, जो दरगाह नूर-जमाल । ए किया बयान खिलवत का, हाए हाए रूह रही किन हाल ॥८६॥

फेर फेर मेहेबूब देखिए, लगे मीठड़ा मुख मासूक । अंग गौर जोत अंबर लों, छब देख दिल होत न भूक भूक ॥८७॥

रूप रंग अंग छबि सलूकी, कहे वस्तर भूखन । ए केहेते अरवा ना उड़ी, हाए हाए कैसी हुज्जत मोमिन ॥८८॥

पांउं लीक केहेते अरवा उड़े, क्यों बरनवी हक सूरत । बंध बंध छूट ना गए, हाए हाए कैसी अर्स हुज्जत ॥८९॥

कह्या गौर मुख मासूक का, और निलवट असल तिलक । हाए हाए ए बयान करते क्यों जिए, हम में रही नहीं रंचक ॥९०॥

बरनन किया श्रवन का, जाके ताबे दिल हुकम । मासूक अंग बरनवते, हाए हाए मोमिन रहे क्यों हम ॥९१॥

कहे गौर गलस्थल हक के, कई छब नाजुक कोमलता । हाए हाए रूह इत क्यों रही, मुख देख मासूक बका ॥९२॥

बड़ी रूहें देख्या हक को, हकें देख्या सामी भर नैन । हाए हाए बात करते जीव क्यों रह्या, एह देख नैन की सैन ॥९३॥

भौंह स्याह नैन अनियां कही, और कह्या जोड़ गौर अंग । हाए हाए ए तन हुकमें क्यों रख्या, हुआ कतल न होते जंग ॥९४॥

देखी निरमलता दंतन की, न आवे मिसाल लाल मानिक । ज्यों देखत बीच चसमों, त्यों देखी जाए जुबां मुतलक ॥९५॥

कबूं हीरा कबूं मानिक, इन रंग सोभा कई लेत । दोऊ निरमल ऐनक ज्यों, परे होए सो देखाई देत ॥९६॥

लालक इन अधुर की, हक कबूं दिलों देखावत । बंध बंध जुदे होए ना पड़े, मेरा हैड़ा निपट सखत ॥९७॥

हक मुख सलूकी क्यों कहूं, छबि सोभित गौर गाल । बरनन करते ए सूरत, हाए हाए लगी न हैड़े भाल ॥९८॥

मैं कही जो मुख मांड़नी, और कह्या मुख सलूक । ए केहेते सलूकी मेरा अंग, हाए हाए हो न गया टूक टूक ॥९९॥

कही गौर हरवटी हक की, लांक पर लाल अधुर । कही दंत जुबां बीड़ी मुख, हाए हाए रूह क्यों रही सुन मधुर ॥१००॥

लाल अधुर कहे मासूक के, सो दिलें भी देखी लालक । ए देख लोहू मेरा क्यों रह्या, सूक न गया मांहें पलक ॥१०१॥

कंठ खभे बंध बंध का, नख सिख किया बरनन । हाए हाए जीवरा मेरा क्यों रह्या, टूटया न अन्तस्करन ॥१०२॥

बरनन किया बका हक का, मैं हुकम लिया दिल ल्याए । केहेते हैड़े की सलूकी, हाए हाए मेरी छाती न गई चिराए ॥१०३॥

हकें अर्स किया दिल मोमिन, ए मता आया हक दिल से । हकें दिल दिया किया लिख्या, हाए हाए मोमिन डूब न मुए इनमें ॥१०४॥

हार कहे हैड़े पर, जोत भरी जिमी आसमान । हाए हाए ए मुरदा जल ना गया, नूर एता होते सुभान ॥१०५॥

कटि पेट पांसे कहे हक के, ले दिल के बीच नजर । हाए हाए ख्वाबी तन क्यों रह्या, ए दिल को लेकर ॥१०६॥

कांध पीठ लीक सलूकी, कही इलमें दिल दे । हाए हाए हुकमें ए तन क्यों रख्या, जो हुकम बैठा हुज्जत रूह ले ॥१०७॥

अर्स जवेर की क्यों कहूं, देखे बाजू बंध के नंग । जिमी से आसमान लग, हाए हाए जीव कतल न हुआ देख जंग ॥१०८॥

हक हाथों की बरनन करी, मच्छे कोनी कलाई काड़े । ए सुन जीव क्यों रेहेत है, ले ख्वाब झूठे भांडे ॥१०९॥

पोहोंचे लीकें हथेलियां, छबि अंगुरियां नख तेज । देखो अचरज मुख केहेते, हो न गया रेजा रेज ॥११०॥

रंग सलूकी भूखन, देख काड़े हाथों के । ए जोत ले जीव ना उड़या, हाए हाए बड़ा अचम्भा ए ॥१११॥

कई रंग इजार मासूक की, दावन में झांई लेत । छेड़े पटुके दावन पर, हाए हाए दिल अजूं न घाव देत ॥११२॥

चरन कमल मासूक के, चित्त में चुभें जिन । ए छबि सलूकी भूखन, क्यों कर छोड़ें मोमिन ॥११३॥

ए चरन आवें जिन दिल में, सो दिल अर्स मुतलक । कई मुतलक बातें अर्स की, दिल सब विध हुआ बेसक ॥११४॥

क्यों कहूं खूबी चरन की, और खूबी भूखन । अदभुत सोभा हक की, क्यों न होए अर्स तन ॥११५॥

चकलाई इन चरन की, भूखन छबि अनूपम । दिल ताही के आवसी, जा को मुतलक मेहेर खसम ॥११६॥

जो होवे अरवा अर्स की, सो इन कदम तले बसत । सराब चढ़े दिल आवत, सो रूह निस दिन रहे अलमस्त ॥११७॥

निमख न छोड़े चरन को, मोमिन रूह जो कोए । निस दिन रहे खुमार में, आवत है चरन बोए ॥११८॥

मासूक के चरनों का, किया बेवरा बरनन । जीव उड़या चाहिए केहेते लीक, हाए हाए क्यों रहे मोमिन तन ॥११९॥

हाथ पांउं मुख हैयड़ा, वस्तर भूखन हक सूरत । ए ले ले अर्स बारीकियां, हाए हाए रूह क्यों न जागत ॥१२०॥

जो जोत कहूं अंग नंग की, देऊं निमूना नरम पसम । ए तो अर्स पत्थर या जानवर, सो क्यों पोहोंचे परआतम ॥१२१॥

जो परआतम पोहोंचे नहीं, सो क्यों पोहोंचे हक अंग को । खेलौने और खावंद, बड़ो तफावत इन मों ॥१२२॥

जित आद अन्त न पाइए, तित तेहेकीक होए क्यों कर । इत सब्द फना का क्या कहे, जित पाइए न अव्वल आखिर ॥१२३॥

ए निरने करना अर्स का, तिन में भी हक जात । इत नूर अकल भी क्या करे, जित लदुन्नी गोते खात ॥१२४॥

जवेर पैदा जिमीय से, सो भी नहीं कह्या अर्स में । चौदे तबक उड़ावे अर्स कंकरी, इत भी बोलना नहीं ताथें ॥१२५॥

जित चीज नई पैदा नहीं, ना कबूं पुरानी होए । तित सब्द जुबां जो बोलिए, सो ठौर न रही कोए ॥१२६॥

जो कहूं हक दिल माफक, तो इत भी सब्द बंधाए । ताथें अर्स बारीकियां, सो किसी विध कही न जाए ॥१२७॥

चुप किए भी ना बने, हुकम इलम आया इत । और काम इनको नहीं, जो अर्स अरवा लई हुज्जत ॥१२८॥

इलम कह्या जो लदुन्नी, सो तो हक का मुतलक । इत मोमिन मिल पूछसी, क्यों रही रूहों को सक ॥१२९॥

जो अर्स बातें सक हमको, तो हकें क्यों कह्या अर्स कलूब । मोमिन कहे बीच वाहेदत, इन आसिकों हक मेहेबूब ॥१३०॥

मेहेबूब आसिक एक कहें, वाहेदत भी एक केहेलाए । अर्स भी दिल मोमिन कह्या, ए तो मिली तीनों विध आए ॥१३१॥

और भी कहूं सो सुनो, मोमिन अर्स से आए उतर । इलम दिया हकें अपना, अब इनों जुदे कहिए क्यों कर ॥१३२॥

फुरमान आया इनों पर, अहमद इनों सिरदार । हक बिना कछुए ना रखें, इनों दुनियां करी मुरदार ॥१३३॥

ए सब बुजरकी इनों की, क्यों जुदे कहिए वाहेदत । इने कुन्नकी दुनी क्या जानही, रूहें अर्स हक निसबत ॥१३४॥

तिन से अर्स मता क्यों छिपा रहे, जो दिल अर्स कह्या मोमिन । एक जरा न छिपे इन से, ए देखो फुरमान वचन ॥१३५॥

बका पट किने न खोलिया, अव्वल से आज दिन । हाए हाए तन न हुआ टुकड़े, करते जाहेर ए वतन ॥१३६॥

अर्स बका द्वार खोल के, करी जाहेर हक सूरत । अंग मेरा रह्या अचरजें, द्वार खोलते वाहेदत ॥१३७॥

मेरी रूहे कह्या आगे रूहन, सुन्या मैं हक के मुख इलम । ए बात केहेतें तन ना फट्या, हाए हाए ए देख्या बड़ा जुलम ॥१३८॥

यों चाहिए मोमिन को, रूह उड़े सुनते हक नाम । बेसक अर्स से होए के, क्यों खाए पिए करे आराम ॥१३९॥

हक अर्स याद आवते, रूह उड़ न पोहोंचे खिलवत । बेसक होए पीछे रहे, हाए हाए कैसी ए निसबत ॥१४०॥

क्यों न खेलावें खिलवत में, रूह अपनी रात दिन । हक इलमें अजूं जागी नहीं, कहावें अर्स अरवा तन ॥१४१॥

बैठ इन ख्वाब जिमीय में, कहे अर्स अजीम का बातन । हड्डी हड्डी जुदी होए ना पड़ी, तो कैसी रूह मोमिन ॥१४२॥

याद न जेता हक अर्स, एही मोमिनों बड़ा कुफर । हक वाहेदत इलम चीन्‍ह के, अजूं क्यों देखे दुनी नजर ॥१४३॥

सुनते नाम हक अर्स का, तबहीं अरवा उड़ जात । हाए हाए ए बल देख्या हुकम का, अजूं एही करावे बात ॥१४४॥

वस्तर और भूखन कहे, हक अंग वाहेदत के । ए केहेते बारीकियां अर्स की, हाए हाए तन उड़या न ख्वाबी ए ॥१४५॥

बेसक इलम ले दिल में, बरनन किया बेसक । हुए बेसक रूह ना उड़ी, हाए हाए पोहोंची ना खिलवत हक ॥१४६॥

कहे इलम रूहें इत हैं नहीं, है हुकम तो हक का । हुए बेसक हुकम क्यों रहे, ले हुज्जत रूह बका ॥१४७॥

बेसक हुए जो अर्स से, और बेसक हुए वाहेदत । मुतलक इलम पाए के, हाए हाए हुकम क्यों रह्या ले हुज्जत ॥१४८॥

नैन रहे नैन देख के, एही बड़ा जुलम । न जानो क्यों सुरखरू, करसी हक हुकम ॥१४९॥

ए विरहा सुन श्रवन रहे, लगी न सीखां कान । हाए हाए वजूद न गल गया, सुन विरहा हादी सुभान ॥१५०॥

संध संध टूटी नहीं, सुनते विरहा सुकन । रोम रोम इन तन के, क्यों न लगी अगिन ॥१५१॥

बातें इन विरह की, मैं गाई अंग अंग कर । अचरज इन निसबतें, अरवा ना गई जर बर ॥१५२॥

मेरे अंग सबे उड़ ना गए, सब देख हक के अंग । सेज सुरंगी हक छोड़ के, रही पकड़ मुरदे का संग ॥१५३॥

क्यों न उड़ी अकल अंग थें, जो बरनन किया अर्स हक । ए पूरी हांसी बीच अर्स के, मांहें गिरो आसिक ॥१५४॥

करी हांसी हकें हम पर, ता विधसों चले न किन । अब सो क्योंए न बनि आवहीं, जो रोऊं पछताऊं रात दिन ॥१५५॥

सोई देखी जो कछू देखाई, अब देखसी जो देखाओगे । हंसो खेलो जानों त्यों करो, बीच अर्स खिलवत के ॥१५६॥

मोमिन दिल अर्स कर के, आए बैठे दिल मांहें । खुदी रूहों इत ना रही, इत गुनाह मोमिनों सिर नाहें ॥१५७॥

फेर हिसाब कर जो देखिए, तो गुनाह रूहों आवत । ए बेवरा है कलस में, मोमिन लेसी देख तित ॥१५८॥

रूहें मोमिन इत आई नहीं, तिन वास्ते नहीं गुना । पर एता गुनाह लगत है, इनों में जेता हिस्सा अर्स का ॥१५९॥

महामत कहे मोमिनों पर, करी हाँसी हुकमें । ना तो अरवाहें इत क्यों रहें, बेसक होए हक सें ॥१६०॥

॥ प्रकरण ॥२२॥ चौपाई ॥१६०६॥

इसी सन्दर्भ में देखें-