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सिनगार - प्रकरण २३ | Singaar prakaran 23

मोमिन दुनी का बेवरा

अरवा आसिक जो अर्स की, ताके हिरदे हक सूरत । निमख न न्यारी हो सके, मेहेबूब की मूरत ॥१॥

और न पावे पैठने, इत बका बीच खिलवत । बका अर्स अजीम में, कौन आवे बिना निसबत ॥२॥

और तो कोई है नहीं, बिना एक हक जात । जात मांहें हक वाहेदत, हक हादी गिरो केहेलात ॥३॥

वस्तर भूखन पेहेर के, मेरे दिल में बैठे आए । हकें सोई किया अर्स अपना, रूह टूक टूक होए बल जाए ॥४॥

दई बड़ाई मेरे दिल को, हक बैठे अर्स कर । अपनी अंगना जो अर्स की, रूह क्यों न खोले नजर ॥५॥

दम न छोड़े मासूक को, मेरी रूह की एह निसबत । क्यों बातें याद दिए न आवहीं, जो करियां बीच खिलवत ॥६॥

जाको अनुभव होए इन सुख को, ताए अलबत आवे याद । अर्स की रूहों को इस्क का, क्यों भूले रस मीठा स्वाद ॥७॥

रूह केहेलाए छोड़े क्यों अपना, क्यों याद दिए जाय भूल । हकें याही वास्ते, भेज्या अपना नूरी रसूल ॥८॥

हम अरवाहें जो अर्स की, तिन सब अंगों इस्क । सो क्यों जावे हम से, जो आड़ा होए न हुकम हक ॥९॥

ए निसबत नूरजमाल से, जो रूह को पोहोंचे रंचक । तो लाड़ अर्स अजीम के, क्यों भूलें मुतलक ॥१०॥

पर हुआ हाथ हुकम के, जो हुकम देवे याद । हुकमें पेहेचान होवहीं, हुकमें आवे स्वाद ॥११॥

कबूल करी हम हाँसी को, और अपनी मानी भूल । सब सुध पाई कुंजी से, और फुरमान रसूल ॥१२॥

अब हुई पेहेचान हुकम की, एक जरा न रही सक । बोझ हम सिर ना रह्या, हक इलमें देखाया मुतलक ॥१३॥

अब भूल हमारी जरा नहीं, और हक कर थके हांसी । बात आई सिर हुकम के, अब काहे बिलखे रूह खासी ॥१४॥

देखना था सो सब देख्या, हक इस्क और पातसाई । और हाँसी रूहों इस्क पर, सब देखी जो देखाई ॥१५॥

क्यों न होए हुकम को हुकम, जो पेहेले किया इप्तदाए । हुई उमेद सब की पूरन, अब क्यों न दीजे रूहें जगाए ॥१६॥

लाड़ हमारे अर्स के, हम से न छूटें खिन । अक्स हमारे के अक्स, क्यों लगे दाग तिन ॥१७॥

अब जो दिन राखो खेल में, सो याही के कारन । इस्क दे बोलाओगे, ऐसा हुकमें देखें मोमिन ॥१८॥

एक तिनका हमारे अर्स का, उड़ावे चौदे तबक । तो क्यों न उड़े रूह अक्सें, बल इलम लिए हक ॥१९॥

जो कदी कहोगे रूहें इत न हुती, ए तो हुकमें किया यों । तो नाम हमारे धर के, हुकम करे यों क्यों ॥२०॥

जो कदी हम आइयां नहीं, तो नाम तो हमारे धरे । और तिन में हुकम हक का, हक तासों ऐसी क्यों करे ॥२१॥

अब तो सब ही करोगे, टालने हमारे दाग । तुम रखियां ऐसा जान के, ना तो क्यों रहें पीछे हम जाग ॥२२॥

हुकम पर ले डारोगे, तेहेकीक कराओगे दिल । दाग अक्सों क्यों मिटे, जो हमारे नामों किए सब मिल ॥२३॥

जो कदी ए दाग धोए डारोगे, मन वाचा कर करमन । अक्स हमारे नाम के, कदी रूहें बातें तो करसी वतन ॥२४॥

इन बात की हाँसियां, अक्स नाम भी क्यों सहे । हक विरहा बात सुन के, झूठी देह पकड़ क्यों रहे ॥२५॥

सो मैं गाया याद कर कर, कबूं पाया न विरहा रस । नाम सहे ना हुकम सहे, ना कछू सहे अक्स ॥२६॥

और हाँसी सब सोहेली, पर ए हाँसी सही न जाए । अक्स भी ना सेहे सकें, जब इलमें दिए पढ़ाए ॥२७॥

ना रह्या इस्क अपना, ना रह्या वतन सों । हक सों भी ना रह्या, तो कहा कहूं हुकम कों ॥२८॥

तुम हीं आप देखाइया, पेहेचान तुम इलम । तुम हीं दई हिंमत, तुम हीं पकड़ाए कदम ॥२९॥

तुम हीं इस्क देत हो, तुम हीं दिया जोस । सोहोबत भी तुम ही दई, तुम हीं ल्‍यावत मांहें होस ॥३०॥

तुम हीं उतर आए अर्स से, इत तुम हीं कियो मिलाप । तुम हीं दई सुध अर्स की, ज्यों अर्स में हो आप ॥३१॥

तुम हीं देखाई निसबत, तुम हीं देखाई खिलवत । तुम हीं देखाया सुख अखण्ड, तुम हीं देखाई वाहेदत ॥३२॥

खेल भी तुम देखाईया, दई फरामोसी भी तुम । तुम हीं जगावत जुगतें, कोई नहीं तुम बिना खसम ॥३३॥

काहूं तरफ न देखाई अपनी, यों रहे चौदे तबक सें दूर । सो सेहेरग से नजीक तुम हीं, हमको लिए कदमों हजूर ॥३४॥

मैं भी इत हों नहीं, ए भी कहावत तुम । जब दूजे कर बैठाओगे, तब खसम को कहेंगे हम ॥३५॥

दूजे तो हम हैं नहीं, ए बोले बेवरा वाहेदत का । ज्यों खेलावत त्यों खेलत, ना तो क्या जाने बात बका ॥३६॥

ना तो नींद उड़े तन सुपना, ए रेहेवे क्यों कर । देखो अचरज अदभुत, धड़ बोले सिर बिगर ॥३७॥

धड़ दो एक सुकन कहे, तित अचरज बड़ा होए । ए तन बिन बोले रूह अर्स की, कहे बानी बिना हिसाबें सोए ॥३८॥

सो भी बानी नहीं फना मिने, अर्स बका खोल्या द्वार । जो अब लग किने न खोलिया, कई हुए पैगंमर अवतार ॥३९॥

अर्स रूहें पेहेचान जाहेर, इनों कौल फैल हाल पार । सोई जानें पार वतनी, जा को बातून रूहसों विचार ॥४०॥

सो पट बका खोलिया, और बोले न बका बिन । इनों पीठ दई चौदे तबकों, करें जाहेर अर्स रोसन ॥४१॥

चौदे तबक की दुनी में, बका तरफ न पाई किन । सो सबों ने देखिया, किया जाहेर बका हक दिन ॥४२॥

बेवरा किया फुरमान में, और हदीसें महंमद । जिने खुली हकीकत मारफत, सोई जाने बातून सब्द ॥४३॥

महंमद सिखापन ए दई, जो उतरीं अरवाहें सिरदार । हक बका सिर लीजियो, छोड़ो दुनियां कर मुरदार ॥४४॥

महंमद कहें ए मोमिनों, ए अर्स अरवाहों रीत । हक बका ल्‍यो दिल में, छोड़ो दुनियां कर पलीत ॥४५॥

अर्स रूहें मोमिनों, लई महंमद हिदायत । चौदे तबक को पीठ दे, आए मांहें हक खिलवत ॥४६॥

कहें महंमद अर्स रूहें, तुम मछली हौज कौसर । जो जीव दुनी मुरदार के, सो रहें ना तिन बिगर ॥४७॥

अर्स अल्ला दिल मोमिन, और दुनी दिल सैतान । दे साहेदी महंमद हदीसें, और हक फुरमान ॥४८॥

कहे कुरान दूजा कछुए नहीं, एक हक न्यामत वाहेदत । और हराम सब जानियो, जो कछू दुनी लज्जत ॥४९॥

दुनी दोजख दरिया मछली, पातसाह सैतान दिल पर । हराम खात है अबलीस, तिन तले दुनी का घर ॥५०॥

ओलिया लिल्ला दोस्त, मोमिन बीच खिलवत । ए अरवाहें अर्स की, इनों दिल में हक सूरत ॥५१॥

तो अर्स कह्या दिल मोमिन, सो कायम हक वतन । रूहें कही दरगाह की, जित असल मोमिनों तन ॥५२॥

आदम नसल हवा बिना, ज्यों मछली जल बिन । यों असल न छूटे अपनी, कही जुलमत दुनी वतन ॥५३॥

मोमिन अर्स बका बिना, रेहे ना सके एक पल । जो हौज कौसर की मछली, तिन हैयाती वह जल ॥५४॥

मोमिन और दुनी के, कह्या जाहेर बड़ा फरक । करे दुनी आहार फना मिने, अर्स मोमिन बका हक ॥५५॥

आए मोमिन नूर बिलंद से, और दुनियां कही जुलमत । यों जाहेर लिख्या फुरमान में, किन पाई न तफावत ॥५६॥

ए तो जाहेर कुरान पुकारहीं, और महंमद हदीस । ए बेवरा क्या जानहीं, जिन नसलें लिख्या अबलीस ॥५७॥

जो मोमिन होते इन दुनी के, तो करते दुनी की बात । चलते चाल इन दुनी की, जो होते इन की जात ॥५८॥

जो यारी होती मोमिन दुनी सों, तो दुनी को न करते मुरदार । रूहें इनसे जुदी तो हुई, जो हम नाहीं इन के यार ॥५९॥

दुनी चलन इन जिमी का, चलना हमारा आसमान । मोमिन दुनी बड़ी तफावत, ए जानें मोमिन विध सुभान ॥६०॥

हादी मिल्या बोहोतों को, कोई ले न सक्या हादी चाल । चलना हादी का सोई चले, जो होवे इन मिसाल ॥६१॥

चलना हादी के पीछल, रखना कदम पर कदम । आदमी चले न चाल रूह की, इत दुनी मार न सके दम ॥६२॥

आदमी छोड़ वजूद को, ले न सके रूह की चाल । दुनियां बंदी हवाए की, मोमिन बंदे नूरजमाल ॥६३॥

रूहें आइयां बीच दुनी के, धरे नासूती वजूद । रूहें चाल न छोड़ें अपनी, जो कदी आइयां बीच नाबूद ॥६४॥

दुनी रूहें एही तफावत, चाल एक दूजे की लई न जाए । रूह मोमिन पर ईमान के, दुनी पर बिन क्यों उड़ाए ॥६५॥

करना दीदार हक का, एही मोमिनों ताम । पानी पीवना दोस्ती हक की, इनों एही सुख आराम ॥६६॥

मोमिन तब लग बंदगी, जो लों आया नहीं इस्क । इस्क आए पीछे बंदगी, ए जानें मासूक या आसिक ॥६७॥

आसिक की एही बंदगी, जाहेर न जाने कोए । और आसिक भी न बूझहीं, एक होत दोऊ से सोए ॥६८॥

ए जाहेर है तफावत, जो कर देखो सहूर । दुनियां सहूर भी ना कर सके, क्या करे बिना जहूर ॥६९॥

मोमिन खाना अर्स में, हुआ दुनी जिमी में आहार । दुनी रोजगार नासूती, जो मोमिनों करी मुरदार ॥७०॥

मोमिन उतरे नूर बिलंद से, कही दुनी आई जुलमत । जो देखो वेद कतेब को, तो जाहेर है तफावत ॥७१॥

मोमिन लिखे आसमानी, दुनियां जिमी की कही । ना तो वजूद दोऊ आदमी, ए तफावत क्यों भई ॥७२॥

कहे पर इस्क ईमान के, सो मोमिन छोड़ें न पल । सो दुनी को है नहीं, उत पाँउं न सके चल ॥७३॥

हकें फुरमाया चौदे तबक, है चरकीन का चरकीन । सो छोड़ें एक मोमिन, जिनमें इस्क आकीन ॥७४॥

सो दुनी को है नहीं, जासों उड़ पोहोंचे पार । ईमान इस्क जो होवहीं, तो क्यों रहें बीच मुरदार ॥७५॥

ऊपर तले अर्स ना कह्या, अर्स कह्या मोमिन कलूब । ए जानें रूहें अर्स की, जिन का हक मेहेबूब ॥७६॥

दुनी दिल मजाजी कह्या, मोमिन हकीकी दिल । बिना तरफ दुनी क्यों पावहीं, जो अर्सें रहे हिल मिल ॥७७॥

वेद कतेब पढ़ पढ़ गए, किन पाई न हक तरफ । खबर अर्स बका की, कोई बोल्या न एक हरफ ॥७८॥

इंतहाए नहीं अर्स भोम का, सब चीजों नहीं सुमार । ऊपर तले मांहें बाहेर, दसों दिसा नहीं पार ॥७९॥

तो भी दुनियां अर्स देखे नहीं, यों देखावत कतेब वेद । पावे न लाम इलम बिना, कोई इन विध का है भेद ॥८०॥

सुध दई महंमद ने, अर्स पाइए मोमिन बीच दिल । जिनपे इलम हक का, दिल अर्स रहे हिल मिल ॥८१॥

दुनी जाने मोमिन दुनी से, ए नहीं बीच इन खलक । एता भी ना समझै, पुकारत कलाम हक ॥८२॥

कहे मोमिन उतरे अर्स से, इनों दिल में हक सूरत । ए अर्स में अर्स इन दिल में, यों हिल मिल बीच खिलवत ॥८३॥

खुली मुसाफ हकीकत, तिन इतहीं हक वाहेदत । अर्स बरकत सब इतहीं, इतहीं हक निसबत ॥८४॥

इतहीं न्यामत मोमिनों, सब खुली जो इसारत । इतहीं मेला रूहों असल, इतहीं रूहों कयामत ॥८५॥

ए बारीक बातें रूह मोमिनों, सो समझें रूह मोमिन । सो आदमी कहे हैवान, जो इस्क इमान बिन ॥८६॥

दुनी जाने तन मोमिन, बैठे हैं हम मांहें । बोलत हैं बानी बका, ए रूहें तन दुनी में नाहें ॥८७॥

रूहें तन मांहें अर्स बका, और अर्स में बैठे बोलत । तो नजीक कहे सेहेरग से, देखो मोमिनों हक हिकमत ॥८८॥

इनों तन असल अर्स में, इनों दिल में जो आवत । सोई इनों के अक्स में, सुकन सोई निकसत ॥८९॥

मोमिन तन असल से, अर्स मता कछू न छिपत । तो बका सूरज फुरमान में, कह्या फजर होसी इत ॥९०॥

ए बारीक बातें अर्स की, जो गुजरीं मांहें वाहेदत । हक हादी और मोमिन, सो जाहेर हुई खिलवत ॥९१॥

तो दुनियां होसी हैयाती, ले मोमिनों बका बरकत । ए बात दुनी क्यों बूझहीं, ओ जात हक निसबत ॥९२॥

ए हक मता रूह मोमिन, इनों ताले लिखी न्यामत । सो क्यों कर दुनियां समझै, कही असल जाकी जुलमत ॥९३॥

आब हैयाती बका मिने, झूठी जिमी आवे क्यों कर । दिल आवे अर्स मोमिन के, और न कोई कादर ॥९४॥

ए मोहोरे जो खेल के, झूठे खाकी नाबूद । आब हैयाती पीय के, क्यों होसी बका बूद ॥९५॥

ए मोहोरे पैदा जो खेल के, हक मोमिनों देखावत । याही बराबर अक्स, मोमिनों के बका बोलत ॥९६॥

जो तन अर्स में मोमिनों, सो मता अक्सों पोहोंचावत । सो अक्सों से बीच दुनी के, मोमिन मेहेर करत ॥९७॥

आब हैयाती इन विध, अर्स से रूहें ल्यावत । ए बरकत रूह अल्लाह की, यों अर्स मता आया इत ॥९८॥

और बरकत महंमद की, साहेदी देत फुरमान । तिन साहेदी से ईमान, पोहोंच्या सकल जहान ॥९९॥

ए इलम जानें रूहें अर्स की, और न काहूं खबर । खेल मोहोरे तो कछू हैं नहीं, एक जरे भी बराबर ॥१००॥

ए खाकीबुत सब नाबूद, इनको कायम किए मोमिन । आब हैयाती अर्स की, पिलाए के सबन ॥१०१॥

ऐसा मता मोमिन, अर्स सेती ल्यावत । बुतखाकी सरभर रूहों की, समझे बिना करत ॥१०२॥

अर्स इलम हुआ जाहेर, जब सब हुए रोसन । तब अंधेरी और उजाला, जुदे हुए रात दिन ॥१०३॥

अर्स तो दूर है नहीं, कहें दोऊ कतेब वेद । अर्स में रूहें दुनी फना जिमी, ए इलम लदुन्नी जानें भेद ॥१०४॥

पर ए सुध दुनी में है नहीं, तो क्या जाने कित अर्स । क्यों हक क्यों हादी रूहें, क्यों दिल मोमिन अरस-परस ॥१०५॥

बका जिमी जल तेज वाए, और बका आसमान । आपन बैठे वाही अर्स में, पर नजरों देखें जहान ॥१०६॥

जहान तो कछू है नहीं, है अर्स बका हक । हक इलम ले देखिए, तो होइए अर्स माफक ॥१०७॥

नाबूद कही जो दुनियां, तिनकी नजर भी नाबूद । अर्स रूहें हक इलमें, ए आसिकै देखे मेहेबूब ॥१०८॥

इत आँखें चाहिए हक इलम की, तो हक देखिए नैना बातन । नैना बातून खुलें हक इलमें, ए सहूर है बीच मोमिन ॥१०९॥

जिन बेचून बेचगून नजरों, ताए खबर न इलम हक । हक इलम देखावे मासूक, इन हाल मोमिन कहे आसिक ॥११०॥

कहे पांच तत्व ख्वाब के, तामें बुजरक केहेलाए कई लाख । पर अर्स बका हक ठौर की, कहूं जरा न पाइए साख ॥१११॥

ख्वाब पैदा बका जिमी से, पर देखे न बका को । एक जरा बका आवे जो ख्वाब में, तो सब ख्वाब उड़े तिनसों ॥११२॥

ना तो ख्वाब जिमी बका जिमी सों, एक जरा न तफावत । पर झूठ न रहे सांच नजरों, आंखें खुलतै ख्वाब उड़त ॥११३॥

ए जाहेर दुनी जो ख्वाब की, करे मोमिनों की सरभर । हक देखे जो ना टिके, ताए दूजा कहिए क्यों कर ॥११४॥

हक देखे जो खड़ा रहे, तो दूजा कह्या जाए । दम ख्वाबी दूजे क्यों कहिए, जो नींद उड़े उड़ जाए ॥११५॥

ए इलमें सुनो अर्स बारीकियां, जो सहें अर्स हक रोसन । ताए भी दूजा क्यों कहिए, कहे कुल्ल मोमिन वाहिद तन ॥११६॥

हक हादी रूहें मोमिन, ए अर्स में वाहेदत । पर ए जानें अरवाहें अर्स की, जो रूहें हक खिलवत ॥११७॥

इतहीं कजा होएसी, इतहीं होसी भिस्त । दोजख इतहीं होएसी, दुनी तले नूर नजर कयामत ॥११८॥

दम ख्वाबी देखें क्यों बका को, कर देखो सहूर । ख्वाब दुनी तब क्यों रहे, जब हुआ दिन बका जहूर ॥११९॥

दुनी मगज न जाने मुसाफ का, तो देखे अर्स को दूर । जो जानें हक इलम को, तो देखें मोमिन हक हजूर ॥१२०॥

भिस्त दोजख दोऊ जाहेर, ए लिख्या मांहें फुरमान । तिन छोड़ी दुनियां हराम कर, जिन हुई हक पेहेचान ॥१२१॥

तो तरक करी इनों दुनियां, जो अर्स दिल मोमिन । दुनी जलसी इत दोजख, जब दिन हुआ बका रोसन ॥१२२॥

हकें दिया लदुन्नी जिनको, सो बैठे अर्स में बेसक । जब कौल पोहोंच्या सरत का, तब होसी दुनी इत दोजक ॥१२३॥

अर्स नासूत दोऊ इतहीं, होसी जाहेर अपनी सरत । देखें मोमिन दुनी जलती, बीच बैठे अपनी भिस्त ॥१२४॥

काफर देखें मोमिनों भिस्त में, आप पड़े बीच दोजक । सुख मोमिनों का देख के, जलसी आग अधिक ॥१२५॥

मोमिन दुनी दोऊ आदमी, हुई तफावत क्यों कर । ए बेवरा है फुरमान में, पर कोई पावे न हादी बिगर ॥१२६॥

बीते नब्बे साल हजार पर, मुसाफ मगज न पाया किन । तो गए एते दिन रात में, हुआ जाहेर न बका दिन ॥१२७॥

मोमिन उतरे अर्स से, इनों दिल में हक सूरत । तो अर्स कह्या दिल मोमिन, खोली हक हकीकत मारफत ॥१२८॥

दुनी दिल पर अबलीस, और पैदास कही जुलमत । काम हाल इनों अंधेर में, हवा को खुदा कर पूजत ॥१२९॥

कुलफ हवा का दुनी के, दिल आंखों कानों पर । ईमान क्योंए न आए सके, लिख्या फुरमान में यों कर ॥१३०॥

कौल हाल मोमिन के नूर में, रूहअल्ला आया इनों पर । दिया इलम लदुन्नी इन को, खोलनें मुसाफ खातिर ॥१३१॥

राह तौहीद पाई इनों नें, जो राह मुस्तकीम सिरात । ए मेहेर मोमिनों पर तो भई, जो तले कदम हक जात ॥१३२॥

हुई लानत अजाजील को, सो उलट लगी सब जहान । अबलीस लिख्या दुनी नसलें, कही ए विध मांहें कुरान ॥१३३॥

देसी पैगंमर की साहेदी, गिरो अदल से उठाई जे । करी हकें हिदायत इन को, बहत्तर नारी एक नाजी ए ॥१३४॥

तन मोमिन अर्स असल, आड़ी नींद हुई फरामोस । सो नींद वजूद ले उड़या, तब मूल तन आया मांहें होस ॥१३५॥

दुनी तन जुलमत से, इन की असल न बका में । जब फरामोसी उड़ी जुलमत, तब जरा न रह्या दुनी सें ॥१३६॥

अरवाहें जो सुपन की, देखें न जाग्रत को । जो होए जाग्रत में असल, सो आवे जाग्रत मों ॥१३७॥

कही दुनियां हुई कुंन सों, सो जुलमत उड़ें उड़त । ताको भिस्त देसी हादी हुकमें, गिरो मोमिनों की बरकत ॥१३८॥

सिफत करेंगे सब कोई, दुनी भिस्त की जे । हक हादी रूहें वाहेदत, भिस्त हुई इनों वास्ते ॥१३९॥

खुदाए कर पूजेंगे, बका मिनें बेसक । पाक होसी हक इलम सों, करें बंदगी होए आसिक ॥१४०॥

मोमिन उतरे अर्स अजीम से, दुनी तिन सों करे जिद । ए अर्स से आए हक पूजत, दुनी पूजना हवा लग हद ॥१४१॥

दुनियां दिल अबलीस कह्या, हक अर्स दिल मोमिन । ए जाहेर किया बेवरा, कुरान में रोसन ॥१४२॥

अबलीस सोई बतावसी, जिन सों होसी दोजक । बोली चाली मोमिन अर्स की, जासों पाइए बका हक ॥१४३॥

बैठे बातें करें बका अर्स की, सोई भिस्त भई बैठक । दुनी बातें करे दुनी की, आखिर तित दोजक ॥१४४॥

ए बोहोत भांत है बेवरा, मोमिन और दुनियां । मोमिन नजर बका मिने, दुनी नजर बीच फना ॥१४५॥

कहे महामत अर्स अरवाहें, किया पेहेलें बेवरा फुरमान । जिन हुई हक हिदायत, सोई बातून करे बयान ॥१४६॥

॥ प्रकरण ॥२३॥ चौपाई ॥१७५२॥

इसी सन्दर्भ में देखें-