सिनगार - प्रकरण २४ | Singaar prakaran 24
हकीकत मारफत का बेवरा
सोई कहूं हकीकत मारफत, जो रखी थी गुझ रसूल । वास्ते अर्स रूहन के, जिन जावें आखिर भूल ॥१॥
फिरके बनी असराईल, हुए पीछे मूसा महत्तर । एक नाजी नारी सत्तर, कहे फुरमान यों कर ॥२॥
याही भांत ईसा के, फिरके बहत्तर कहे । एक नाजी तिन में हुआ, और नारी इकहत्तर भए ॥३॥
तेहत्तर फिरके कहे महंमद के, बहत्तर नारी एक नाजी । नारी जलसी आग में, नाजी हिदायत हक की ॥४॥
जाहेर पेहेचान है तिन की, ले चलत माएने बातन । कौल फैल चाल रूह नजर, इनों असल बका अर्स तन ॥५॥
फुरमान आया जिन पर, ए सोई जानें इसारत । ले मारफत बैठे अर्स में, बीच बका खिलवत ॥६॥
ए इलम कहे खेल उड़ जावे, बका कंकरी के देखे । तो अर्स रूहों की नजरों, ख्वाब रेहेवे क्यों ए ॥७॥
तो मोमिन तन में हुकम, फैल करे लिए रूह हुज्जत । वास्ते हादी रूहन के, ए हकें करी हिकमत ॥८॥
तो कह्या अर्स दिल मोमिन, ना मोमिन जुदे अर्स से । पर ए जानें अरवाहें अर्स की, जो करी बेसक हक इलमें ॥९॥
बसरी मलकी और हकी, तीन सूरत महंमद की जे । ए तीनों सूरत दे साहेदी, आखिर अर्स देखावें ए ॥१०॥
रूहों हक अर्स नजरों, हुकम नजर खेल मांहें । अर्स नजीक रूहों को खेल से, इत धोखा जरा नाहें ॥११॥
तो हक सेहेरग से नजीक, कोई जाने ना लदुन्नी बिन । एही लिख्या फुरमान में, यों ही रूहअल्ला कहे वचन ॥१२॥
ज्यों ज्यों होवे अर्स नजीक, खेल त्यों त्यों होवे दूर । यों करते छूट्या खेल नजरों, तो रूहें कदमै तले हजूर ॥१३॥
नजर खेल से उतरती देखिए, त्यों अर्स नजीक नजर । यों करते लैल मिटी रूहों, दिन हुआ अर्स फजर ॥१४॥
ए जो देत देखाई वजूद, रूह मोमिन बीच नासूत । ए दुनी जाने इत बोलत, ए बैठे बोलें मांहें लाहूत ॥१५॥
तो बातून गुझ लाहूत का, जाहेर सब करत । ना तो अर्स बका की रोसनी, क्यों होवे जाहेर इत ॥१६॥
अर्स बका हमेसगी, हक हादी रूहें वाहेदत । ए तीन खेल हुए जो लैल में, ऐसा हुआ न कोई कबूं कित ॥१७॥
तो खाकीबुत कायम किए, जो किया वास्ते खेल उमत । रूहों पट दे बका बुलाए के, दई चौदे तबकों भिस्त ॥१८॥
सिफत करेंगे सब कोई, दुनी भिस्त की जे । हक हादी रूहें वाहेदत, भिस्त हुई इनों वास्ते ॥१९॥
अर्स रूहें हक बिना न रहें, विरहा न सहें एक खिन । जब इलमें हुई अर्स बेसकी, रूहें रहें न बिना वतन ॥२०॥
जो कदी मोमिन तन में हुकम, तो हुकम भी रहे ना इत । क्यों ना रहे इत हुकम, हुकम हुकम बिना क्यों फिरत ॥२१॥
हुकम आया तन मोमिनों, लई अर्स रूह हुज्जत । ले इत लज्जत अर्स हक की, क्यों हुकम रेहे सकत ॥२२॥
ए हुकम सो भी मासूक का, सो क्यों जुदागी सहे । खिलवत वाहेदत सुध सुन, पल एक ना रहे ॥२३॥
ए हुकम तिन मासूक का, जो आप उलट हुआ आसिक । सो हुकम विरहा ना सहे, बिना मासूक एक पलक ॥२४॥
ए अर्स बका बातें सुन के, एक पलक न रहें अरवाहें । रूहों हुकम राखे आड़ा पट दे, हक इत लज्जत देखाया चाहें ॥२५॥
रूहों हक पे मांगी लज्जत, सो क्यों रहें देखे बिगर । कोट गुनी देखावें लज्जत, जो रूहों मांगी प्यार कर ॥२६॥
ना तो इस्क इनों का असल, सब अंगों इस्क रूहन । इस्क उड़ावे अंग लज्जत, आया इलम वास्ते इन ॥२७॥
हक को काम और कछू नहीं, देवें रूहों लाड़ लज्जत । ए तो बिगर चाहे सुख देत हैं, तो मांग्या क्यों न पावत ॥२८॥
सुख उपजें कई विध के, आगूं अर्स में बड़ा विस्तार । सो रूहें सब इत देखहीं, जो कर देखें नीके विचार ॥२९॥
सो बिगर कहे सुख देत हैं, ए तो रूहों मांग्या मिल कर । इन जिमी बैठाए सुख अर्स के, हक देत हैं उपरा ऊपर ॥३०॥
दुनी में बैठाए न्यारे दुनी से, किए ऐसी जुगत बनाए । सुख दिए दोऊ ठौर के, अर्स दुनी बीच बैठाए ॥३१॥
एक तन हमारा लाहूत में, नासूत में और तन । असल तन रूहें अर्स बीच में, तन नासूत में आया इजन ॥३२॥
अर्स तन देखें तन नासूती, तन नासूत में जो हुकम । सो सुध दई अर्स अरवाहों को, इने सेहेरग से नजीक हम ॥३३॥
दुनियां चौदे तबक में, किन पाई न बका तरफ । तिन अर्स में बैठाए हमको, जा को किन कह्यो ना एक हरफ ॥३४॥
जो जाहेर माएने देखिए, तो बीच पड़यो ब्रह्मांड । एता बिछोड़ा कर दिया, हक अर्स और इन पिंड ॥३५॥
हुआ बिछोड़ा बीच ब्रह्मांड के, एते पड़े थे हम दूर । सो हकें इलम ऐसा किया, बैठे कदमों तले हजूर ॥३६॥
हुकमें कई मता पोहोंचाईया, बीच ऐसी जुदागी में । हकें न्यामत दे अघाए, कई हांसी करियां हम सें ॥३७॥
अर्स-अजीम की कंकरी, उड़ावे चौदे तबक । तो तिन को है क्यों कहिए, जो देख ना सके हक ॥३८॥
जो हक को देखे ना उड़े, सो दूजा कहिए क्यों कर । ए बातें अर्स वाहेदत की, पाइए हक इलमें खबर ॥३९॥
हकें इलम दिया अपना, सो आया इस्क बखत । सो इस्क न देवे बढ़ने, ऐसे किए हिरदे सखत ॥४०॥
और जित आया हक इलम, अर्स दिल कह्या सोए । हक न आवें इस्क बिना, और हक बिना इस्क न होए ॥४१॥
अर्स कहिए दिल तिन का, जित है हक सहूर । इलम इस्क दोऊ हक के, दोऊ हक रोसनी नूर ॥४२॥
इस्क इलम बारीकियां, दिल जाने अर्स मोमिन । जो जागी होए रूह हुकमें, ताए लज्जत आवे अर्स तन ॥४३॥
जो जोरा करे इस्क, तन मोमिन देवे उड़ाए । दिल सखती बिना अर्स अजीम की, इत लज्जत लई न जाए ॥४४॥
इस्क नूर-जमाल बिना, और जरा न कछुए चाहे । इस्क लज्जत ना सुख दुख, देवे वाहेदत बीच डुबाए ॥४५॥
ना तो सखत दिल मोमिन के, हक करें क्यों कर । पर अर्स लज्जत बीच दुनी के, लिवाए न सखती बिगर ॥४६॥
एकै नजर मोमिन की, हक सुख दिया चाहें दोए । रूहें अर्स सुख लेवें खेल में, और खेल सुख अर्स में होए ॥४७॥
हकें दई जुदागी हमको, इस्क बेवरे को । बिना जुदागी बेवरा, पाइए ना अर्स मों ॥४८॥
होए न जुदागी अर्स में, तो क्यों पाइए बेवरा इस्क । ताथें दई नेक फरामोसी, बीच अर्स के हक ॥४९॥
हम खेल देखें बैठे अर्स में, ए जो चौदे तबक । रूह हमारी इत है नहीं, लई परदे में हक ॥५०॥
फेर दिया इलम अपना, जासों फरामोसी उड़ जाए । खेल में मता सब अर्स का, इलमें सब विध दई बताए ॥५१॥
जो रूह हमारी आवे खेल में, तो खेल रहे क्यों कर । याको उड़ावे अर्स कंकरी, झूठ क्यों रहे रूहों नजर ॥५२॥
देखत है दिल खेल को, लिए अर्स रूह हुज्जत । फुरमान आया इनों पर, और इलम आया न्यामत ॥५३॥
या विध करी जो साहेब ने, हम हुए दोऊ के दरम्यान । सुध अर्स नासूत की, दोऊ हम को देवें सुभान ॥५४॥
हुकम तन बीच नासूत, हम फरामोस अर्स तन । नासूत देखें हम नजरों, अर्सें पोहोंचे ना दृष्ट मन ॥५५॥
बोले हुकम दावा ले रूहन, बीच तन नासूत । ले सब सुध अर्स इलमें, देत दुनी में लज्जत लाहूत ॥५६॥
खिलवत निसबत वाहेदत, जेती अर्स हकीकत । ए लज्जत हुकम सिर लेवहीं, अर्स रूहें सिर ले हुज्जत ॥५७॥
यों हुकम नूरजमाल का, अर्स सुख देत रूहों इत । चुन चुन न्यामत हक की, रूहों हुकम पोहोंचावत ॥५८॥
कई सुख लें हक के खेल में, फेर हुकम पोहोंचावे खिलवत । कई अनहोंनी कर सुख दिए, हुकमें जान हक निसबत ॥५९॥
कई विध के सुख हुकमें, दोऊ तरफों आड़ा पट दे । अर्स दुनी बीच रूहों को, दिए सुख दोऊ तरफों के ॥६०॥
ए झूठ न आवे अर्स में, ना कछू रहे रूहों नजर । ताथें दोऊ काम इन विध, हकें किए हिकमत कर ॥६१॥
जेती अरवाहें अर्स की, हक सेहेरग से नजीक तिन । दे कुंजी अर्स पट खोलिया, हादिएं किए सब रोसन ॥६२॥
इलम लदुन्नी पाए के, अर्स रूहें हुई बेसक । जगाए खड़े किए अर्स में, बीच खिलवत खासी हक ॥६३॥
यो तो खड़ी रहे रूह खिलवतें, या तो देवे तवाफ । हौज जोए या अर्स में, तूं इन विध हो रहे साफ ॥६४॥
पाक पानी से न होइए, ना कोई और उपाए । होए पाक मदत तौहीद की, हकें लिख भेज्या बनाए ॥६५॥
फेर फेर हक अंग देखिए, ज्यों याद आवे निसबत । है अनुभव तो एक अंग का, जो हमेसा वाहेदत ॥६६॥
ताथें तूं चेत रूह अर्स की, ग्रहे अपने हक के अंग । रहो रात दिन सोहोबत में, हक खिलवत सेवा संग ॥६७॥
जो खावंद अर्स अजीम का, ए हक नूरजमाल । आए तले झरोखे झांकत, दीदार को नूरजलाल ॥६८॥
जाके पलथें पैदा फना, कई दुनी जिमी आसमान । सो आवत दायम दीदार को, ऐसा खावंद नूर-मकान ॥६९॥
तिन चाह्या दीदार रूहन का, जो रूहें बीच बड़ी दरगाह । ए मरातबा मोमिनों, जिन वास्ते हुकम हुआ ॥७०॥
देख देख मैं देखया, ए सब करत हक हुकम । ना तो अर्स दिल एता मता लेय के, खिन रहे न बिना कदम ॥७१॥
हकें अर्स लिख्या मेरे दिल को, क्यों रहे रूह सुन सुकन । एक दम ना रहे बिना कदम, पर रूहों ठौर बैठा हक इजन ॥७२॥
हुकम कहे सो हुकमें, अर्स बानी बोले हुकम । रूहों दिल हुकम क्यों रेहे सके, ए तो बैठी तले कदम ॥७३॥
खेल तन में हुकम ना रेहे सके, हुज्जत लिए रूहन । हुकम हमारे खसम का, क्यों देवे दाग मोमिन ॥७४॥
पर हक अर्स लज्जत तो पाइए, बैठे मांग्या खेल में जे । सो हुकमें मांग्या दे हुकम, हकें करी वास्ते हाँसी के ॥७५॥
ए बातें होसी सब अर्स में, हँस हँस पड़सी सब । ए हुकमें करी कई हिकमतें, सब वास्ते हमारे रब ॥७६॥
हक मुख हुकमें देख हीं, हुकम देखावे खेल । हुकम देवे सुख लदुन्नी, हुकम करावे इस्क केलि ॥७७॥
हुकमें जोस गलबा करे, हुकमें जोर बढ़े इस्क । हुकमें इलम रखे सुख को, हुकम प्याले पिलावे माफक ॥७८॥
हुकम बेहोस ना करे, हुकम जरा जरा दे लज्जत । हुकम पनाह करे सब रूहन, हुकमें जानी जात निसबत ॥७९॥
प्याला हुकम पिलावहीं, करें हुकम रखोपा ताए । ना तो इन प्याले की बोए से, तबहीं अरवा उड़ जाए ॥८०॥
ए प्याला कबूं किन ना पिआ, हम रूहें आइयां तीन बेर । ए प्याले पेहेले तो पिए, जो हम थे बीच अंधेर ॥८१॥
ए प्याले पिए जाए क्यों जागतें, तन तबहीं जाए चिराए । बोए भी ना सेहे सके, तो प्याला क्यों पिआ जाए ॥८२॥
हुकम जो प्याला देवहीं, सो संजमें संजमें पिलाए । पूरी मस्ती न हुकम देवहीं, जानें जिन कांच सीसा फूट जाए ॥८३॥
ना तो ए प्याला पीय के, ए कच्चा वजूद न रख्या किन । पर हुकम राखत जोरावरी, प्याला पिलावे रखे जतन ॥८४॥
हुकम मेहेर बारीकियां, ए मैं कहूं बिध किन । नजर हमारी एक बिध की, सब बिध सुध ना रूहन ॥८५॥
हुकम देवे लज्जत, प्याला जेता पिआ जाए । हर रूहों जतन करें कई बिध, जानें जिन प्याला देवे गिराए ॥८६॥
जिन जेता हजम होवहीं, ज्यों होए नहीं बेहोस । तब हीं फूटे कुप्पा कांच का, पाव प्याले के जोस ॥८७॥
सही जाए न बोए जिनकी, सो क्यों सकिए मुख लगाए । सो पैदरपे क्यों पी सके, पर हुकम करत पनाह ॥८८॥
ए अंग लगे प्याला जिनके, सब खलड़ी जाए उतर । ना तो ए प्याला हजम क्यों होवहीं, पर हक राखत पनाह नजर ॥८९॥
ए प्याला कोई न पी सके, जुबां लगते मुरदा होए । पर हक राखत हैं जीव को, ना तो याकी खैंच काढ़े खुसबोए ॥९०॥
प्याले पर प्याले पिलावहीं, ताको निस दिन रहे खुमार । देवे तवाफ निस दिन, हुकम मेहेर को नहीं सुमार ॥९१॥
बड़ा अचरज इन हुकम का, मुरदे राखत जिवाए । मौत सरबत निस दिन पीवै, सो मुरदे रखे क्यों जाए ॥९२॥
हुकम मुरदों बोलावत, और ऐसी देत अकल । करत नजीकी हक के, मुरदे कहावें अर्स दिल ॥९३॥
हुकम लाख विधों जतन करे, हर रूहों ऊपर सबन । हुकम जतन तो जानिए, जो याद आवे अर्स वतन ॥९४॥
जो पेहेले आप मुरदे हुए, तो दुनियां करी मुरदार । हक तरफ हुए जीवते, उड़ पोहोंचे नूर के पार ॥९५॥
दुनियां इस्क न ईमान, क्यों उड़या जाए बिना पर । तो दुनी कही जिमी नासूती, रूहें आसमानी जानवर ॥९६॥
ए दुनियां जो खेल की, छोड़ सूरिया आगे ना चलत । सो कायम फना क्या जानहीं, जाकी पैदास कही जुलमत ॥९७॥
महामत कहे ए मोमिनों, बका हासिल अर्स रूहन । कह्या दिल जिनों का अर्स बका, ए मोमिन असल अर्स में तन ॥९८॥
॥ प्रकरण ॥२४॥ चौपाई ॥१८५०॥
