सिनगार - प्रकरण २६ | Singaar prakaran 26
कलस का कलस
बसरी मलकी और हकी, कही महंमद तीन सूरत । कारज सारे सिध किए, अव्वल बीच आखिरत ॥१॥
ए तीनों मिल किया जहूर, अव्वल आखिर रोसन । हक बैठे इन इलम में, तो दिल अर्स हुआ मोमिन ॥२॥
ए जुबां मैं हक की, और बोलत है हुकम । हक अर्स बरनन तो हुआ, जो वाहेदत बका खसम ॥३॥
गैब खिलवत जाहेर तो हुई, जो हकें कराई ए । ए खबर नहीं नूर को, करी लदुन्निएँ जाहेर जे ॥४॥
बरनन किया अर्स का, सो सब हिसाब अर्सैं के । गिनती सो भी अर्स की, ए बातें मोमिन समझेंगे ॥५॥
या पहाड़ या तिनका, सो सब चीज बिध आतम । सब देत देखाई जाहेर, ज्यों देखिए मांहें चसम ॥६॥
और भी खूबी रूह नैन की, चीज दसों दिसा की सब देखत । पाताल या आसमान की, रूह नजरों सब आवत ॥७॥
रूह का एही लछन, बाहेर अन्दर नहीं दोए । तन दिल दोऊ एकै, रूह कहियत हैं सोए ॥८॥
दूर नजीक भी अर्स के, सो भी पाइए अर्स सहूर । नैन चरन अंग तीनों हीं, एक यादै में हजूर ॥९॥
चाल मिलाप या दीदार, ए तीनों रूह के नेक । जब हीं याद जो आवहीं, तब हीं होए मांहें एक ॥१०॥
यातो जिमी के दूर लग, या नजीक आगूं नजर । दूर नजीक सब याद में, ए दोऊ बराबर ॥११॥
अर्स दिल मोमिन तो कह्या, जो हक सों रूह निसबत । ना तो अर्स दिल आदमी का, क्यों कह्या जाए ख्वाब में इत ॥१२॥
रूह तन की असल अर्स में, अर्स ख्वाब नहीं तफावत । तो कह्या सेहेरग से नजीक, हक अर्स दुनी बीच इत ॥१३॥
दिल मोमिन अर्स तन बीच में, उन दिल बीच ए दिल । केहेने को ए दिल है, है अर्सै दिल असल ॥१४॥
तो हक नजीक कह्या रूहन को, और नूर नजीक फरिस्तन । और आम खलक देखन को, जो कहे जुलमत से तन ॥१५॥
ए तीनों गिरो कही जाहेर, पर ए बीच मारफत राह । ए कलाम अल्ला में बेवरा, योंही कह्या रूह अल्लाह ॥१६॥
पर आम खलक ना समझैं, जाकी पैदास कही जुलमत । इलम लदुन्नी से जानत, रूह मोमिन बीच वाहेदत ॥१७॥
इलम नुकते की साहेदी, हक सूरत अर्स मारफत । सो सब बातें फुरमान में, खोले हकी सूरत हकीकत ॥१८॥
बसरी मलकी और हकी, जो कही महंमद तीन सूरत । दो देवे हक की साहेदी, फरदा रोज कयामत ॥१९॥
नबी नबुवत कुरान माजजा, ए दोऊ साबित होवें इन से । कुरान न खुले बिना खिताब, ना तो लिख्या सब इनमें ॥२०॥
इन साहेदिएँ सब मिलसी, हिंदू या मुसलमीन । मुआ दज्जाल सब का कुफर, यों सब पाक हुए एक दीन ॥२१॥
और भी साहेदी फुरमान में, तबक चौदे जरा नाहें । खेल नाम धरया सब केहेने को, ए जरा नहीं अर्स मांहें ॥२२॥
और ठौर न काहूं अर्स बिना, अर्स न कहूं इंतहाए । जो आप कछुए है नहीं, तिन क्यों अर्स नजरों आए ॥२३॥
ए अर्स देखें रूह मोमिन, जो उतरे नूर बिलन्द से । नाहीं क्यों देखे है को, ए तो जाहेर लिख्या किताबों में ॥२४॥
बंझापूत फूल आकास, और ससिक सिंग । कह्या वेद कतेब में, भंग न कछू अभंग ॥२५॥
यों असल खेल की है नहीं, ए तो दिल में देखाई देत । किया हुकमें महंमद रूहों देखने, तो भिस्त में इनों को लेत ॥२६॥
हक हुकमें सब बेवरा किया, वास्ते हादी रूहन । जो सहूर कीजे मिल महामती, तो लज्जत लीजे अर्स तन ॥२७॥
॥ प्रकरण ॥२६॥ चौपाई ॥१९६६॥
